कविता- सुबह की पहली किरण

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सुबह की पहली किरण हर पल मुझसे
यह कहती है, तू क्यों उदास बैठी है?
ऐसे उठ और चल तेरी मंज़िल
आज ख़ुद तेरा इंतज़ार करती है।
क्यों गुमनाम अंधेरों में बैठी हो?
ऐसे आज तू उठकर
बाहर निकलने की कोशिश तो कर,
रोशनी की किरण आज ख़ुद तेरा इंतज़ार करती है।
भला क्यों नहीं होंगे तेरी ज़िंदगी से
ये ग़म के अंधेरे दूर!
जिनके मज़बूत इरादे होते हैं,
मंज़िल तो ख़ुद उनका इंतज़ार करती है।
जो हौसले और साहस के बल पर आगे बढ़ते हैं,
कहानियाँ उनकी एक दिन लिखी जाती हैं।

ममता इकलोदिया,

इन्दौर, मध्यप्रदेश

परिचय

शिक्षिका,

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