असुरों की टोली ने फ़िर से,
कर डाला है भीषण निनाद..
इस देवभूमि पर दानवदल,
फैला बैठा जाला-जिहाद।
मानव चेतना अचेत पड़ी,
क्या फूट गई हिय की आँखें ?
लगता है जैसे खण्ड-खण्ड..
धर्मों की बटी हुईं शाखें।
सो गए आज क्या परशुराम,
खो गए कहाँ पर मेघश्याम..
धर्मों के रक्षक कहाँ गए,
बेबस अवाक हैं चारधाम।
अट्टहास करतल ध्वनियों से,
जैसे लंकेश करे फ़िर से..
महिषासुर के भय से व्याकुल,
जन-जन असहाय डरे फ़िर से।
ललकार दिया है वेदों को,
ललकारा ग्रंथ पुराणों को..
आदमखोरों ने छोड़ दिया,
माँ की छाती पर बाणों को।
वो चीखे करुण वेदना से,
“गोपाल कहाँ गोपाल कहाँ..
मेरे सपूत,मेरे प्यारे,
ओ मेरे बेटे,लाल कहाँ।
क्या बघिर हुए हो तुम बोलो,
क्या चीख नहीँ सुन पाए हो..
गीता का ग्रंथ सिखाता जो,
वह सीख नहीं गुन पाए हो।’
जागो जागो हे आर्यपुत्र,
हे वसुधा के रक्षक जागो..
जागो अशोक,हे चंद्रगुप्त,
हे अंधकार नाशक जागो।
जागो राणा,चेतक जागो,
हे राम और हेतक जागो..
जागो हे छत्रसाल जागो,
हे सम्भाजी,बाजी जागो।
जननी का शीश काट डाला,
अरिमुंडों ने पी लिया रक्त..
एकाग्र चित्त कर लो यह मन,
अब व्यवधानों में जो विभक्त॥
कुछ नीच नपुंसक चाहत रखते,
सिंहों का पुरुषत्व मिटे..
अंधियारे की भी साजिश है,
दिनकर यह अस्तित्व मिटे।
इसलिए पीढ़ियों के हित में,
घर-घर से अब कराल निकले..
इनका विनाश कर दे समूल,
ऐसा जत्था विशाल निकले।
शासन तो है दिव्यांग आज,
मत रुह टटोल दरबारों की..
अब यही विवशता कहती है,
शोणित में उठते ज्वारों की।
इन सभी भेड़ियों के मुख का,
भोला पर्दा हट जाने दो..
सीने में थर्राती कब से,
ज्वाला का मुख फट जाने दो।
केरल से लेकर कलकत्ते तक,
भीषण हाहाकार मचे..
शिवशंकर के तांडव नर्तन से,
कटा हुआ अरिमुंड नचे।
बनकर खुद कल्की कूद पड़ो,
बस शंखनाद हो युद्धों का..
अब अति हो गई कुकृत्यों की,
उपदेश चला न बुद्धों का।
यदि एक बार साहस कर लो,
वसुधा फ़िर से खिल जाएगी..
सदियों के लिए इस सृष्टि को,
अरि से निजात मिल जाएगी॥
#देवेन्द्र प्रताप सिंह ‘आग’
परिचय : युवा कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह ‘आग’ ग्राम जहानाबाद(जिला-इटावा)उत्तर प्रदेश में रहते हैं।