सरेआम गौ हत्या पर मौन क्यों ?

devendr aag
असुरों की टोली ने फ़िर से,
कर डाला है भीषण निनाद..
इस देवभूमि पर दानवदल,
फैला बैठा जाला-जिहाद।
मानव चेतना अचेत पड़ी,
क्या फूट गई हिय की आँखें ?
लगता है जैसे खण्ड-खण्ड..
धर्मों की बटी हुईं शाखें।
सो गए आज क्या परशुराम,
खो गए कहाँ पर मेघश्याम..
धर्मों के रक्षक कहाँ गए,
बेबस अवाक हैं चारधाम।
अट्टहास करतल ध्वनियों से,
जैसे लंकेश करे फ़िर से..
महिषासुर के भय से व्याकुल,
जन-जन असहाय डरे फ़िर से।
ललकार दिया है वेदों को,
ललकारा ग्रंथ पुराणों को..
आदमखोरों ने छोड़ दिया,
माँ की छाती पर बाणों को।
वो चीखे करुण वेदना से,
“गोपाल कहाँ गोपाल कहाँ..
मेरे सपूत,मेरे प्यारे,
ओ मेरे बेटे,लाल कहाँ।
क्या बघिर हुए हो तुम बोलो,
क्या चीख नहीँ सुन पाए हो..
गीता का ग्रंथ सिखाता जो,
वह सीख नहीं गुन पाए हो।’
जागो जागो हे आर्यपुत्र,
हे वसुधा के रक्षक जागो..
जागो अशोक,हे चंद्रगुप्त,
हे अंधकार नाशक जागो।
जागो राणा,चेतक जागो,
हे राम और हेतक जागो..
जागो हे छत्रसाल जागो,
हे सम्भाजी,बाजी जागो।
जननी का शीश काट डाला,
अरिमुंडों ने पी लिया रक्त..
एकाग्र चित्त कर लो यह मन,
अब व्यवधानों में जो विभक्त॥
कुछ नीच नपुंसक चाहत रखते,
सिंहों का पुरुषत्व मिटे..
अंधियारे की भी साजिश है,
दिनकर यह अस्तित्व मिटे।
इसलिए पीढ़ियों के हित में,
घर-घर से अब कराल निकले..
इनका विनाश कर दे समूल,
ऐसा जत्था विशाल निकले।
शासन तो है दिव्यांग आज,
मत रुह टटोल दरबारों की..
अब यही विवशता कहती है,
शोणित में उठते ज्वारों की।
इन सभी भेड़ियों के मुख का,
भोला पर्दा हट जाने दो..
सीने में थर्राती कब से,
ज्वाला का मुख फट जाने दो।
केरल से लेकर कलकत्ते तक,
भीषण हाहाकार मचे..
शिवशंकर के तांडव नर्तन से,
कटा हुआ अरिमुंड नचे।
बनकर खुद कल्की कूद पड़ो,
बस शंखनाद हो युद्धों का..
अब अति हो गई कुकृत्यों की,
उपदेश चला न बुद्धों का।
यदि एक बार साहस कर लो,
वसुधा फ़िर से खिल जाएगी..
सदियों के लिए इस सृष्टि को,
अरि से निजात मिल जाएगी॥

                                                                #देवेन्द्र प्रताप सिंह ‘आग’

परिचय : युवा कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह ‘आग’ ग्राम जहानाबाद(जिला-इटावा)उत्तर प्रदेश में रहते हैं।

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Tue Jun 6 , 2017
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।