सच्चे रिश्ते

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अपने बचपन की बातें
आज याद कर रहा हूँ।
कितना सच्चा दिल हमारा
तब हुआ करता था।
बनाकर कागज की नाव,
छोड़ा करते थे पानी में।
बनाकर कागज के रॉकेट,
हवा में उड़ाया करते थे।
और दिल की बातें हम
किसी से भी कह देते थे।
और बच्चों की मांग को
सभी पूरा कर देते थे।।

न कोई भय न कोई डर,
हमें बचपन में लगता था।
मोहल्ले के सभी लोगों से
जो लाड प्यार मिलता था।
इसलिए आज भी उन्हें
में सम्मान देता हूँ।
और उन्हें अपने परिवार का
हिस्सा ही समझता हूँ।।

जो बचपन की यादों से
अपना मुँह मोड़ता है।
और उन सभी रिश्तों को
समय के साथ भूलता है।
उससे बड़ा अभागा और
कोई हो नहीं सकता।
जो अपने स्वर्णयुग को
कलयुग में भूल रहा है।।

सगे रिश्तो से बढ़कर
होते मोहल्ले के रिश्ते।
तभी तो सुख दुख में
सदा ही खड़े हो जाते है।
और अपनों से बढ़कर
निभाते सभी रिश्ते।
इसलिए मातपिता जैसे
वो सभी लोग होते है।
और हमें ये लोग अपने
परिवार का हिस्सा लगते है।।

जय जिनेन्द्र देव
संजय जैन (मुम्बई)

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।