जिंदगी में हर बार वक्त बदलता है
ओर वक्त के साथ साथ सब कुछ बदलता है। वह जमाना था जब वेद ,मंत्रों को पढ़ाया जाता था। फिर युग बदला तब वेदों के साथ साथ हथियार कैसे चलाना भी सिखलाया जाता था, जो युद्ध में काम आते थे, फिर शिक्षा केवल किताबों तक आ गई, जिसे पढ़ना लिखना आ गया उसे शिक्षित कहा गया। ओर आज समय आ गया है तकनीकी ज्ञान का जिसमें मोबाइल से कम्युटर से पिक्चर्स से या विडियोज़ से शिक्षा की आवश्यकता महसूस होती है। आज आप को बतलाते हुए ऐसा लग रहा है कि वाकई में जो शाला नहीं जाते वह अनपढ़ , अज्ञानी है या वह जिसे फेसबुक,विडियोज़, लेपटाप चलाते नहीं आते वह अनपढ़ सा अनुभव करते है। ओर हो रहा है एसा युग बदल रहा पीढ़ियों में फिर अंतर हर एक बालक चाहे जैसा है हाथ में उसके मोबाइल है। अरे बालक ही क्या, अनपढ़ ऐसी महिलाएं और पुरूष भी बखूबी यह सब चला रहे हैं हमें बुलाया गया, कम्प्युटर सीखने ओर पहले दिन ऐसा लगा कि पहली कक्षा में बैठे हो। कुछ नहीं आ रहा था। तब फिर धीरे धीरे कुछ कुछ समझे तो क्या समय पूरा हो गया क्या इतनी जल्दी यह सब सीख पाते नहीं बस कुछ सीखा ओर रूचि बढ़ेगी रही थी। तब विचार आया कि अब वह दिन दूर नहीं जब सब काम इनसे ही होंगे तब क्या करें फिर यहां पर नवाचार करने को मन हुआ है। कि बच्चे तो बच्चे ठहरे उन्हें मोबाइल के जरिए भी लालच में शाला बुला सकते है।या शाला में ऐसा हॉल हो जहां पिक्चर के माध्यम से भी बहुत कुछ सिखाया जा सकता है तब में पाती हूँ कि जो मैं सोच रही वह तो नवोदय क्रांति परिवार के बहुत से शिक्षक साथियों ने विशेषकर शिक्षक गोपाल कौशल ने भी ऐसा कुछ हटकर काम किया तब यह लग रहा है कि हम कुछ दिखाएं, कुछ गा कर बताएं और कुछ तत्काल लिखने को कहें तब शाला में रौनक भी रहेगी ओर बच्चो की संख्या भी बढेगी कुछ तो ऐसा करना होगा कि बच्चे तो ठीक माता पिता रूचि लेकर भेजें बच्चो को क्योंकि कुछ सुविधाएं दी गई बच्चो को कि ड्रेस देंगे, छात्रवृत्ति देंगे ,किताबें देंगे, भोजन देंगे, सब को कुछ माता-पिता नकार चुके उन्हें ही रूचि नहीं तो बच्चे में कैसे आए। अब बहुत गंभीरता से सभी शिक्षकों को ही इकट्ठा होकर इस समस्या से निपटने के लिए सोचना होगा कि सभी बच्चे शाला आए, अगर सभी आ गये तब तो मजा ही मजा , फिर उन्हें केवल उनकी नींव से जोडना है कि किस तरह यह आगे बढ जाए ,क्योंकि एक अनपढ़ भी सब्जी बेचता है पर रूपये पूरे गिनकर लेता-देता है ओर हिसाब भी बहुत पक्का तो ऐसी क्या कमजोरी है कि अनपढ़ व्यक्तियो को हिसाब किताब करते आ रहे हैं ओर पढ़े-लिखे बच्चो को नहीं , कहीं कमी है इस कमी को फिर से सुलझाना होगा, देना होगा कि ऐसा क्या करें कि बच्चे बोल ऊठे।.
#ममता बैरागी
तिरला जिला धार क्ष.प्र.
Wed May 8 , 2019
किसी कवि की इच्छा शक्ति के सहारे उसकी सर्वोत्तम कविता का किसी अखबार या पत्रिका में छप जाना, उसके लिए मानदेय मिल जाना, किसी पुरस्कार के लिए चयनित हो जाना या किसी प्रकाशक की मेज पर पहुंच कर किताब की शक्ल में पाठक दरबार की हाजरी लगा जाना भर ही […]