कोई क़यामत न कोई करीना याद आता है जब दुपट्टे से तेरा मुँह छिपाना याद आता है एक लिहाफ में सिमटी न जाने कितनी रातें यक ब यक दिसम्बर का महीना याद आता है ज़ुल्फ़ की पेंचों में छिपा तेरा शफ्फाक चेहरा किसी भँवर में पेशतर सफीना याद आता है […]
यूँ तो सब अपने यहां थे कोई बेगाना नहीं दौर-ए-गर्दिश में किसी ने मुझको पहचाना नहीं ============================ थी खबर हमको बहुत दुश्वारियां हैं राहों में लाख समझाया मगर दिल ने कहा माना नहीं ============================ सुन रहे हो जिसको इतनी गौर से तुम बैठकर वो हकीकत-ए-ज़िंदगी है कोई अफसाना नहीं ============================ […]
