devendr soni
सज – धज कर दुपहिया पर
घर से निकलते हैं कुछ युवा होते लड़के
और मौसम चाहे कोई हो
छाँव से भी झुलसती हैं लड़कियां
आँख तक , मुहं पर दुपट्टा बांधे ही
घर से निकलती हैं कुछ लड़कियां ।

देखा है मैंने –
स्कूल कॉलेज या कोचिंग
के समय ,
कांधे पर बैग लटकाए
किसी बाइक के पीछे बैठ
निर्जन राहों पर मस्ताते हुए इन्हें
उन्मादित लड़कों के साथ ।

आपत्ति नहीं है मुझे
किसी की निजता से
और न ही आपत्ति है
उनके स्वभावगत
अंधे आकर्षण से ।

जानता हूँ –
उम्र का स्वाभाविक सैलाब है यह ।

पर उन परिजनों के विश्वास का
क्या होगा भविष्य ?
जिन्होंने बांध रखे है –
इन मुहं छुपाती लड़कियों
और इठलाते -इश्क फरमाते
लड़कों से , उम्मीदों के बांध !

इतर इसके गर्त में जाते
इन नासमझ लड़के -लड़कियों का
अक्सर होता है कितना बुरा हाल
देखा है इसे भी हम – सबने ।

मानता हूँ –
रोकना मुश्किल है
गर्त के इस सैलाब को
पर करना ही होगा अब यह
उन्माद भरे माहौल से
बचाने के लिए उन्हें ।

बनना पड़ेगा कठोर
अपनी संतानों के प्रति
चाहे वह हो बेटा या बेटी।

नहीं चेते यदि समय पर तो-
भोगना ही होगा , वह दुष्परिणाम
जिसकी कल्पना भी
नहीं करना चाहते हैं हम !
#देवेंन्द्र सोनी, इटारसी।

About the author

(Visited 22 times, 1 visits today)
Please follow and like us:
0
http://matrubhashaa.com/wp-content/uploads/2017/07/devendr-soni.pnghttp://matrubhashaa.com/wp-content/uploads/2017/07/devendr-soni-150x150.pngArpan JainUncategorizedकाव्यभाषाdevendra,soniसज - धज कर दुपहिया पर घर से निकलते हैं कुछ युवा होते लड़के और मौसम चाहे कोई हो छाँव से भी झुलसती हैं लड़कियां आँख तक , मुहं पर दुपट्टा बांधे ही घर से निकलती हैं कुछ लड़कियां । देखा है मैंने - स्कूल कॉलेज या कोचिंग के समय , कांधे पर बैग लटकाए किसी बाइक के पीछे...Vaicharik mahakumbh
Custom Text