*क्या कलाकारों का अपमान हुआ ?*

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vaidik
ऐसा पहली बार हुआ कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों को लेकर काफी बदमजगी फैल गई। राष्ट्रपति, सूचना मंत्री और फिल्म कलाकारों- तीनों के आचरण विवाद के विषय बन गए। ये 137 पुरस्कार ऐसे फिल्मी कलाकारों को दिए जाने थे, जिनकी फिल्में लीक से हटकर हैं। वे बाॅक्स आफिस हिट करनेवाली नहीं लेकिन कला की दृष्टि से उच्च कोटि की होती हैं। इस बार राष्ट्रपति भवन ने कहा कि राष्ट्रपतिजी एक घंटे से ज्यादा नहीं रुकेंगे। वे किसी समारोह के लिए इससे ज्यादा समय नहीं दे पाएंगे। अतः सिर्फ 11 कलाकारों को वे पुरस्कार देंगे। कुछ समय उनके स्वागत में खर्च होगा और वे भाषण दिए बिना तो जा भी नहीं सकते। राष्ट्रपति क्या, हर आदमी अपने समय का मालिक होता है। सूचना मंत्रालय को यह पता चलते ही उसे राष्ट्रपति का आगमन स्थगित कर देना चाहिए था। फिर कोई विवाद ही पैदा नहीं होता लेकिन 65 साल से चली आ रही परंपरा को वह कैसे तोड़ देता ? जिन 60-65 कलाकारों ने इस समारोह का बहिष्कार किया, उनका कहना है कि यदि उन्हें यह बात पहले ही बता दी जाती तो वे दिल्ली आते ही नहीं। हो सकता है कि राष्ट्रपति को पहले से यह पता ही नहीं रहा हो कि उन्हें 137 कलाकारों को पुरस्कार बांटने हैं। वैसे रामनाथ कोविंद बड़े शिष्ट और भले आदमी हैं लेकिन वे अपने बनाए नियम स्वयं कैसे तोड़ सकते हैं ? यदि एक कलाकार को सम्मानित करने में दो मिनिट भी लगते तो पूरे समारोह में 3-4 घंटे लग जाते। अब यदि 11 पुरस्कार राष्ट्रपति ने दे दिए और 60 सूचना मंत्री ने दे दिए तो भी उससे फर्क क्या पड़ना है ? श्रेष्ठतम कलाकार का सम्मान पानेवाले रिद्धि सेन ने क्या पते की बात कही है। उनका कहना है कि पांच साल बाद किसे याद रहेगा कि यह पुरस्कार किसने दिया था ? लोग उसे याद रखेंगे, जिसको पुरस्कार मिला है। इस कथन में इतिहास का बहुत बड़ा रहस्य छिपा हुआ है। वह यह कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तो सिर्फ ओहदे हैं, पद हैं, कुर्सियां हैं। इन पर कोई भी आ बैठता है। जरुरी नहीं कि पुरस्कृत कलाकारों की तरह वे प्रतिभाशाली हों, चमत्कारी हो, महारथी हों। इसीलिए इन पदों पर बैठनेवाले ज्यादातर लोगों की स्थायी जगह इतिहास के कूड़ेदान में होती है। मुझे नहीं लगता कि इन 137 कलाकारों में से 10 कलाकार भी ऐसे होंगे, जो देश के सभी राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों के नाम भी गिना सकें। इसीलिए राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार मिलने या न मिलने को इतना बड़ा मुद्दा बनाना मुझे कुछ जंचा नहीं। ये प्रतिभाशाली कलाकार अपने आप को किसी कुर्सीधारी नेता से कम समझें, यही बताता है कि उनमें आत्म-विश्वास की कमी है।
   #डॉ. वेदप्रताप वैदिक
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Arpan Jain

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।