Read Time3 Minute, 12 Second
आओ बातें करें हम
सारे सुधीजन ,
बीते दिनों की
कहानी कहें हम ,
राजा और रानी की
सात भाइयों की ,
खरगोश, कछुए की
लंबी दौड़ की ,
चूहे और शेर के
छोटे-से वादे की ,
प्यासे कौवे की
गजब चतुराई ,
मगर और बंदर के
मीठे कलेजे की ,
हुआँ – हुआँ करते
नीले सियार की ,
सोने के अंडे की
बंदर के बटवारे की
और उसकी नकल की ,
आओ बातें करें हम॥
पंच परमेश्वर के
अलगू और जुम्मन की ,
दादी के चिमटे की
हार या जीत की ,
हींग वाले खान की
या फिर गोदान की ,
आओ बातें करें हम॥
चल रे मटके टम्मक टू
नानी तेरी मोरनी की ,
या चंदा मामा दूर के
मोटू और पतलू की ,
या कार्टून कोना ढब्बू की ,
चँदृगुप्त चाणक्य की
या चँद्रकाता तिलस्म की ,
मालगुडी डेज और
मधुशाला बच्चन की ,
पुष्प की अभिलाषा हो
या कदंब का पेड़ हो ,
चंदन चाचा के बाडे़ में
या खूब लडी़ मर्दानी हो ,
आल्हा और उदल की
वीर राणा सांगा की ,
घास की रोटी हो
या ममता की कसौटी पर
कसी पन्ना धाय हो ,
आओ बातें करें हम॥
गीता ,महाभारत की
रामायण , पुराणों की ,
या बाइबिल और कुरान की ,
हिमालय के शिखर की
जाडे़ और धूप की ,
वर्षा की मस्त फुहारों की
पेड़ों और फलों की ,
माँ और मिट्टी की
सोंधी-सोंधी महक की ,
कल-कल बहती गंगा
और निर्झर झरनों की ,
आओ बातें करें हम॥
लाल ,बाल ,पाल की
या सुभाष आजाद की ,
थोडी़-सी भगत की
थोडी़ खुदीराम की ,
लता की आवाज की
कल्पना उड़ान की ,
उषा की छलांग की
सचिन के बल्ले की
साक्षी के बाजू की ,
ध्यानचंद की हांकी और
आनंद के मोहरों की ,
क्रिकेट और कबड्डी में
भारत की जीत की ,
आओ बातें करें हम॥
अपने मन की
तुम्हारे मन की ,
आस्था के चरम की
और थोड़े धरम की ,
बेटियों के सार की
मित्र-परिवार की ,
अहम छोडे़ भाव की
योग-व्यायाम की
हास्य-मुस्कान की ,
तिरंगे के जयघोष की
और हिन्दुस्तान की ,
आओ बातें करें हम।
आओ बातें करें हम॥
#कार्तिकेय त्रिपाठी
परिचय : कार्तिकेय त्रिपाठी इंदौर(म.प्र.) में गांधीनगर में बसे हुए हैं।१९६५ में जन्मे कार्तिकेय जी कई वर्षों से पत्र-पत्रिकाओं में काव्य लेखन,खेल लेख,व्यंग्य सहित लघुकथा लिखते रहे हैं। रचनाओं के प्रकाशन सहित कविताओं का आकाशवाणी पर प्रसारण भी हुआ है। आपकी संप्रति शास.विद्यालय में शिक्षक पद पर है।
Post Views:
669
Wed Aug 23 , 2017
मानते रहे वसुंधरा कुटुम्ब के समान, आदिकाल से तभी लगे रहे सुधार में। भारतीयता करे विकास विश्व में अतीव, ध्यान दें सभी इसी सुलक्ष्य के प्रसार में। युद्ध को चुना नहीं चुना पवित्र प्रेम पंथ, भावना विनाश की न आ सकी विचार में। किन्तु मारना उन्हें रहा सदैव आर्य धर्म, […]