साक्षात्कार: कबीर पंथ प्रमुख आचार्य विवेकदास जी व डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ की बातचीत

कबीर चौरामठ मूल गादी के महंत और कबीर पंथ के वैश्विक प्रमुख संत विवेकदास आचार्य जी का इन्दौर प्रवास के दौरान लेखक व पत्रकार डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ ने साक्षात्कार लिया।
आचार्य जी विगत आधी शताब्दी से अधिक समय से लगातार कबीर व कबीरपंथ से जुड़े हैं। लगभग 70 से अधिक किताबों के लेखक हैं और विश्व भर में फैले कबीर पंथ के प्रमुख संत व गादीपति हैं।
प्रश्न- कबीर पंथ संसार के लिए क्यों आवश्यक है?
उत्तर- कबीर के बारे साहित्य, दर्शन, विचार और लोक में यह भ्रम है कि कबीर ने कोई मत या पंथ नहीं चलाया, जबकि यह ग़लत है।
कबीर ने स्वयं कहा है कि ‘कबीर पंथ में आना खाला का घर नहीं’ मतलब स्वयं कबीर साहब ख़ुद कह रहे हैं कि कबीर पंथ में शामिल होना कोई मौज-मस्ती का कार्य नहीं, यहाँ समर्पण चाहिए। तब स्पष्ट है कि कबीर ने पंथ परम्परा बनाई है। कबीर पंथ ने भक्ति आंदोलन चलाया, इसमें लगभग 300 संतों ने मिलकर कबीर साहब की वाणी और दर्शन को जन–जन तक पहुंचाने का कार्य किया है, दुनिया में भक्ति आंदोलन पूरी दुनिया का सबसे बड़ा भक्ति आंदोलन नहीं है। संसार की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है कि कबीर को जानना, समझना और अपनाना होगा। 600 सालों से कबीर का भक्ति आंदोलन जारी है, इसीलिए आज भी प्रासंगिक है।
प्रश्न- विद्यापीठ क्या है, किस तरह स्थापित करेंगे?
उत्तर- हमारे पास सारनाथ में ज़मीन है, वहाँ हम विद्यापीठ की स्थापना कर रहे हैं। उसमें से कुछ भाग पर आश्रम रहेगा शेष विद्यापीठ बनेगा। इस विद्यापीठ में कबीर के समकालीन अथवा साथी संतों की वाणी, उपदेश और परंपराओं के बारे में लोग जाने, इसलिए शोध संस्थान जैसा पीठ बनेगा। जहाँ कबीर से संबंधित साहित्य इत्यादि होगा।
यह विश्वविद्यालय स्तर का विद्यापीठ रहेगा। कबीर को सर्वमत से जोड़कर अच्छा विमर्श स्थापित होगा। कबीर के दर्शन, परम्परा को व्यापक कर लोक में पहुंचाने के उद्देश्य से विद्यापीठ तैयार होंगे।
प्रश्न- लोगों में भ्रम है कि कबीर अनपढ़ अथवा कम पढ़े–लिखे थे, यह कितना सही है?
उत्तर- यह सच कतई नहीं हो सकता, क्योंकि जो व्यक्ति कुंडलिनी जागरण के सबसे बड़े संत थे, वह कुंडलिनी जागरण की शिक्षा देते थे, जो वर्णमाला के अक्षरों पर काम करके कविताओं का सृजन कर सकता है, वह अनपढ़ तो नहीं हो सकता।
साहित्य के लोगों ने कबीर के ही दोहे ”मसि-कागद तौ छुओ नहिं, कलम गही ना हाथ’ जिसका अर्थ होता है कि ‘इस पंक्ति में कबीर दास कहना चाहते हैं कि मैंने न कभी काग़ज़ को छुआ है न कभी क़लम हाथ में लेकर कुछ लिखा है अर्थात् कबीर जैसा दिखते थे वैसा बोलते थे और उनके शिष्य लिख लेते थे। उनका प्रमुख शिष्य धर्मदास है, जिन्होंने उनकी रचनाएँ संकलित की।
पर दूसरी ओर कबीर कहते हैं ‘सब धरती काजग करू, लेखनी सब वनराए।
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए।
इसका अर्थ है ‘अगर मैं इस पूरी धरती के बराबर बड़ा काग़ज़ बनाऊँ और दुनिया के सभी वृक्षों की क़लम बना लूँ और सातों समुद्रों के बराबर स्याही बना लूँ तो भी गुरु के गुणों को लिखना संभव नहीं है। यानी कबीर लेखन-पाठन से भलीभांति परिचित रहे हैं। इसीलिए अनपढ़ तो हो नहीं सकते।
प्रश्न- साहित्य में कबीर साहब के अवदान को जन तक पहुँचाने के लिए आपके क्या प्रयास हैं?
उत्तर- कबीर पंथ सत्संग पर विश्वास करता है, हम सत्संग के माध्यम से जन–जन तक कबीर पहुंचा रहे हैं। मैं स्वयं देशभर में प्रवचन करता हूँ, प्रवचन के माध्यम से जनता को कबीर के बारे में बताया जाता है। दूसरा, मेरी स्वयं की 70-80 किताबें लिखी हुई हैं, जिसके माध्यम से कबीर पर अनुसंधान, दर्शन, कबीर का इतिहास इत्यादि प्रसारित किया जा रहा है। शोधार्थी लगातार शोध कर रहे हैं। पुस्तकालय तैयार कर रहे हैं। देशभर के साहित्यकारों की कबीर पर लिखी किताबों को संकलित कर उसका सार प्रसारित कर रहे हैं। कबीर परम्परा को साहित्य के माध्यम से फैला रहे हैं। कबीर वाणी, दंतकथाओं और जनश्रुतियों के सत्य को सामने ला रहे हैं। दंतकथाओं में यह भी फैलाया कि कबीर ब्राह्मणी के लड़के थे जबकि यह सत्य नहीं है। सैंककड़ो लोगों ने अपने-अपने अनुसार कबीर को प्रचारित किया।
प्रश्न- पंथ के विस्तार के लिए आपकी क्या परियोजना है?
उत्तर- कबीर मठ के माध्यम से, कबीर मठों के साधुओं को सक्रिय कर रहे हैं, उन साधुओं को जागृत करके सत्संग परम्परा को बड़ा रहे हैं। भक्ति आंदोलन को बढ़ा रहे हैं।
प्रश्न- कबीर साहब के बारे में कई लोग यह कहते हैं कि स्त्री के विरुद्ध कबीर साहब ने बोला है, आप इस पर क्या कहना चाहेंगे?
उत्तर- नारी के बारे में कबीर ने गुणगान किया है, नारी को संसार का जनक कहा है। कबीर ने केवल कुलक्षणा या बाज़ारु नारी का विरोध किया है। शेष अन्य दोहों में कबीर साहब ने नारी को महान बताया है।
