हिन्दी की आवश्यकता क्यों?

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कविकुल के गौरव और पूर्व प्रधानमंत्री पं. अटल बिहारी वाजपेयी जी ने लिखा है कि ‘भारत केवल एक भूमि का टुकड़ा नहीं बल्कि जीता–जागता राष्ट्रपुरुष है’ अर्थात् स्पष्ट तौर पर भारत के भारत होने का कारण यहाँ की संस्कृति,यहाँ के संस्कार और यहाँ की विरासत है। भारत की ताक़त, भारत की सांस्कृतिक अखंडता और लोगों की श्रद्धा है। यहाँ ’जियो और जीने दो’ के सिद्धांत के साथ अहिंसा के महत्त्व को दर्शाने वाले महावीर हैं तो क्रांति के स्वर भी मुखर कर महाभारत के माध्यम से ग़लत का प्रतिकार करना भी दिखाया है। एक तरफ़ बहन के लिए लड़ने वाले भाई दिखे तो दूसरी ओर राम-सा चरित्र दिखाया, जिसमें कुशल राजा के साथ-साथ पिता की आज्ञा के पालन के लिए बिना शर्त कार्य करने के संस्कार भी सिखाए हैं, यहाँ देश के लिए लड़ने वाले गाँधी भी हैं तो यहाँ समाज के लिए समर्पित बुद्ध को भी समझाया जाता है। इन सब के जीवित होने का कारण हमारे दादा-दादी या नाना-नानी के किस्से सुनना और कहानियों से संस्कार सिंचन है। और सबसे महत्त्वपूर्ण बात कि इन संस्कारों की पाठशाला का ककहरा भी स्वभाषा से ही शुरू होता है। स्पष्ट है कि हमें जो संस्कार मिले हैं, उनका कारण घर के वटवृक्ष, घर के बुज़ुर्ग ही होते हैं, किन्तु आज़ादी के बाद से लगता है कि भारत के संस्कार सिंचन का बरगद कमज़ोर होता जा रहा है। भारत के संस्कार और मानवता कमज़ोर पौधे की तरह होते जा रहे हैं। इन सबके जड़ में स्वभाषा की अवहेलना छुपी हुई है।
भाषा किसी भी राष्ट्र का नैतिक और अघोषित प्रतिनिधित्व करती है, किसी भी राष्ट्र के बारे में जानना है, समझना है, वहाँ के संस्कारों को समझना, वहाँ की संस्कृति को पहचानना है तो वहाँ की भाषा को जानना होगा। बिना संस्कार के संस्कृति का जन्म संभव नहीं होता, संस्कारों से ही संस्कृति बनती है, संस्कार सिंचन के लिए सबसे सशक्त माध्यम भाषा ही है, उसी तरह, भाषा उस संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है। जैसे इंग्लैंड में अंग्रेज़ी, अरब में अरबी वैसे ही हिन्दुस्तान में हिन्दी को राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा माना जाता है। अब यदि हिन्दी की अवधारणा को समझें तो हिन्दू ग्रंथों की एक कथा से इसे समझा जा सकता है, उस पौराणिक कथा के अनुसार जब देवी महादुर्गा का जन्म महिषासुर का वध करने के लिए हुआ, तब सृष्टि के समस्त देवताओं ने अपनी शक्तियों के रूप में अपने शस्त्र महादुर्गा को दिए, उसके बाद सर्वशक्तिशाली महादुर्गा का जन्म हुआ। और उसके बाद शक्तिशाली असुर महिषासुर के आतंक को महादुर्गा ने समाप्त किया। इसी तरह, हिन्दी भाषा भी है, इस भाषा ने भारत में प्रचलित लगभग सभी बोलियों से शब्द और शक्ति लेकर सर्वोत्कृष्ट सृजन दिया है। वैसे तो हिन्दी का उद्भव संस्कृत के साथ प्राकृत और खड़ी बोली के उत्कृष्ट परिणाम से हुआ है और इसी के साथ, हिन्दी भारत के अधिकांश भू–भाग पर प्रचलित और कामकाजी भाषा बन गई।
हिन्दी भाषा का इतिहास लगभग एक हज़ार वर्ष पुराना माना गया है। सामान्यतः प्राकृत की अन्तिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिन्दी का आविर्भाव स्वीकार किया जाता है। मतलब पहले हम भारतीयों के संस्कारों के सिंचन की भाषा संस्कृत होती थी, कालान्तर में हिन्दी बनने लगी।
भाषा का अपना एक अपना महत्त्व है, जिसके कारण संवाद का प्रारम्भ होता है और संवाद का पहला क़ायदा है कि जिन दो व्यक्तियों के बीच संवाद होना है, उनकी भाषा का एक होना भी आवश्यक है। जैसे, यदि आदमी और कौवे की भाषा अलग–अलग नहीं होती तो शायद भारत के कौवे भी गीता और क़ुरान पढ़ रहे होते। इसलिए संवाद स्थापित करने की पहली शर्त दोनों की भाषा का एक होना है। भाषा से संस्कार ज़िंदा होते हैं, संस्कारो का परिष्कृत स्वरूप ही संस्कृति का परिचय है, रहन-सहन के अतिरिक्त संवाद आवश्यक तत्व है। देश में एक भाषा की आवश्यकता क्यों है? इसका महत्त्वपूर्ण तर्क इस बात से साबित होता है कि जैसे यदि आप पंजाबी भाषी हैं और आप भारत के एक हिस्से दक्षिण में जाते हैं, और वहाँ की भाषा तमिल, तेलुगू, मलयाली या कन्नड़ है, और आप न तो द्रविड़ भाषाओं को जानते हैं, न ही वे पंजाबी। ऐसी स्थिति में न आप संवाद कर पायेंगे, न ही वो। और संवाद न होने की दशा में समय और कार्य व्यर्थ हो जाएगा। अब ऐसी ही स्थिति में देश के आंतरिक भू–भागों पर भी अलग-अलग भाषाओं के होने से समरूपता दृष्टिगोचर नहीं होती। इसलिए कम से कम भारत की एक प्रतिनिधित्व भाषा होनी चाहिए, जिसका देश की अन्य भाषाओं के साथ समन्वय भी हो और वो सम्पूर्ण राष्ट्र में अनिवार्य हो। अब दूसरी महत्त्वपूर्ण बात कि अब इस एक भाषा का चुनाव कैसे हो? इसके लिए इस तर्क को समझना होगा कि किस भाषा का प्रभुत्व जनसंख्याबल के अनुसार अधिक है।
उत्तर भारत के भक्तिकाल के प्रमुख भ‍क्त कवि सूरदास, तुलसीदास तथा मीराबाई के भजन सामान्य जनता द्वारा बड़े शौक़ से गाए जाते हैं। इसकी सरलता के कारण ही कई लोगों को कंठस्थ भी हैं। इसका प्रमुख कारण हिन्दी भाषा की सरलता, सुगमता तथा स्पष्टता है। संतों-महात्माओं द्वारा प्रवचन भी हिन्दी में ही दिए जाते हैं क्योंकि अधिक से अधिक लोग इसे समझ पाते हैं। उदाहरण के रूप में, दक्षिण-भारत के प्रमुख संत वल्लभाचार्य, विट्‍ठल रामानुज तथा रामानंद आदि ने हिन्दी का प्रयोग किया है। उसी प्रकार, महाराष्ट्र के संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर आदि, गुजरात प्रांत के नरसी मेहता, राजस्थान के दादू दयाल तथा पंजाब के गुरु नानक आदि संतों ने अपने धर्म तथा संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए एकमात्र सशक्त माध्यम हिन्दी को बनाया। हमारा फ़िल्म उद्योग तथा संगीत हिन्दी भाषा के आधार पर ही टिका हुआ है।
भारत पर प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से 200 से 250 वर्षों तक अंग्रेज़ों का शासन रहा, अल्पावधि तक फ़्रांसीसियों एवं डच आक्रान्ताओं का प्रभाव भी रहा। भारत के कुछ भूभाग केरल, गोवा (मालाबार का इलाका आदि ) पर तो पुर्तगालियों का 400-450 वर्षों तक शासन रहा।
भारत पर 7वीं–8वीं शताब्दी से आक्रमण प्रारंभ हो गए थे। मोहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनवी, तैमूर लंग, अहमद शाह अफ़दाली, बाबर एवं उसके कई वंशज आक्रांताओं का भी शासनकाल अथवा प्रभावयुक्त कालखंड कोई बहुत अच्छा समय नहीं रहा भारत के लिए, सांस्कृतिक एवं सभ्यता की दृष्टि से।
भिन्न–भिन्न आक्रांताओं के शासनकाल में भारत में सांस्कृतिक एवं सभ्यता की दृष्टि से कुछ परिवर्तन हुए। कुछ परिवर्तन तो तात्कालिक थे, जो समय के साथ ठीक हो गए, लेकिन कुछ स्थाई हो गए। जब तक भारत पर आक्रांताओं का शासन था, तब तक हम पर परतंत्रता थी। सन् 1946 की तथाकथित सत्ता के हस्तांतरण के उपरांत शारीरिक परतंत्रता तो एक प्रकार से समाप्त हो गई किंतु मानसिक परतंत्रता से अब भी हम जूझ रहे हैं। यह अपनी सभ्यता एवं संस्कृति के लिए जुझारूपन हमारे रक्त में है, जो कभी समाप्त नहीं हो सकता। इसी के कारण हमारी वर्तमान संस्कृति में अधकचरापन आ गया है “न पूरी ताक़त से विदेशी हो पाए, न पूरी ताक़त से भारतीय हो पाए, हम बीच के हो गए, खिचड़ी हो गए”।
एक सबसे बड़ा विकार स्थानीय भाषा एवं बोली के पतन के रूप में आया। हम असम में, बंगाल में, गुजरात में, महाराष्ट्र में रहते हैं, वहीं की बोली बोलते हैं, लिखते हैं, समझते हैं परंतु सब सरकारी कार्य हेतु अंग्रेज़ी ओढ़नी पड़ती है। यह विदेशीपन, अंग्रेज़ीपन के कारण और भी भयावह स्थिति का तब निर्माण होता है, जब नन्हे–नन्हे बालको को कान उमेठ-उमेठ कर अंग्रेज़ी रटाई जाती है। सरकार के आँकड़ो के अनुसार जब प्राथमिक स्तर पर 18 करोड़ भारतीय छात्र विद्यालय में प्रथम कक्षा में प्रवेश लेते हैं तो अंतिम कक्षा, जैसे उच्च शिक्षा जैसे अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग), चिकित्सा (मेडिकल), संचालन (मैनेजमेंट) आदि तक पहुँचते-2 तो 17 करोड़ छात्र/छात्राएँ अनुतीर्ण हो जाते हैं, केवल 1 करोड़ उत्तीर्ण हो पाते हैं। भारत सरकार ने समय–समय पर शिक्षा पर क्षोध एवं अनुसंधान के लिए मुख्यतः तीन आयोग बनाए: दौ.सि. कोठारी (दौलत सिंह कोठारी), आचार्य राममूर्ति एवं एक और… सभी का यही मत था कि यदि भारत में अंग्रेज़ी माध्यम की शिक्षा व्यवस्था न हो अपितु शिक्षा स्थानीय एवं मातृभाषा में हो तो यह जो 18 करोड़ छात्र हैं, सब के सब उत्तीर्ण हो सकते हैं, उच्चतम स्तर तक |
विचार करके देखें, शिक्षा मातृभाषा में नहीं होने का कितना अधिक दुष्परिणाम उन 17 करोड़ विद्यार्थियों को भोगना पड़ता है, इनमें से आधे से अधिक तो शुरुआत में ही बाहर हो जाते, कोई पांचवीं में तो कोई सातवीं में, कुछ 8-8.5 करोड़ विद्यार्थी इस व्यवस्था के कारण सदैव के लिए बाहर हो जाते हैं। यह कैसी दुर्व्यवस्था है, जो प्रतिवर्ष 17 करोड़ का जीवन अंधकारमय बना देती है! अगर आप प्रतिशत में देखें तो 95% सदैव के लिए बाहर हो रहे हैं। यह सब विदेशी भाषा को ओढ़ने के प्रयास के कारण, बात मात्र विद्यार्थियों के अनुत्तीर्ण होने की नहीं अपितु व्यवस्था की भी है।
दुर्भाग्य की पराकाष्ठा तो देखिये कि जब कोई रोगी चिकित्सक के पास जाता है तो वह चिकित्सक उसे पर्ची पर दवाई लिख के देता है, मरीज़ उसे पढ़ नहीं सकता वरन कोई विशेषज्ञ ही पढ़ सकता है। कितना बड़ा दुर्भाग्य है उस रोगी का कि जो दवा उसको दी जा रही है, जो वह अपने शरीर में डाल रहा है, उसे स्वयं न पढ़ सकता, न जान सकता कि वह दवा क्या है? उसका दुष्परिणाम क्या हो सकता है उसके शारीर पर? यदि वह ज़ोर देकर जानना भी चाहे तो डॉक्टर उसे अंग्रेज़ी भाषा में बोल देगा, लिख देगा, उसे समझने हेतु किसी और विशेषज्ञ के पास जाना होगा।
क्यों बंगाल में, असम में, गुजरात में, महाराष्ट्र में, हिन्दीभाषी राज्यों आदि में दवाइयों का नाम क्रमशः बंगला, असमिया, गुजराती, मराठी व हिन्दी में नहीं है। यह बिल्कुल संभव एवं व्यावहारिक है। संविधान जिन 22-23 भाषाओं को मान्यता देता है, उनमें क्यों नहीं? राष्ट्रीय भाषा हिन्दी (हम मानते हैं) में क्यों नहीं, जिसे समझने वाले 80 से 85 करोड़ हैं? और तो और, सरकार ने नियम बना रखा है दवाइयों के नाम लिखें अंग्रेज़ी में, चिरभोग (प्रिस्क्रिप्शन) लिखें अंग्रेजी में, छापें अंग्रेज़ी में आदि। जिस भाषा (अंग्रेज़ी) को कठिनाई से 1 से 2 प्रतिशत लोग जानते हैं।
ऐसा ही सत्यानाश हमने न्याय व्यवस्था का कर रखा है, उदाहरण के लिए मान लीजिए मैं असम का व्यक्ति हूँ। मुझे कुछ न्याय संबंधित परेशानी है तो पहले असमिया में वकील को समझाओ, वकील भाषांतर करे अंग्रेज़ी में, उसके उपरांत वह जज को समझाए। जज विचार कर अंग्रेज़ी में वकील को समाधान सुनाये, वकील अंग्रेज़ी का भाषांतर करे असमिया में, उसके उपरांत मुझे समझाये… अरे भाई! क्या सत्यानाश कर रखा है? इन सब में कितना समय एवं शक्ति नष्ट हो रही है। अगर यह भाषा की परतंत्रता नहीं होती तो मैं सीधे अपनी दुविधा, परेशानी न्यायाधीश को असमिया में बता देता और वह उसका समाधान कर मुझे बता देता | किसी तीसरे व्यक्ति (न्यायज्ञ) की आवश्यकता ही नहीं पड़ती भाषांतर के लिए।
राष्ट्र के सर्वोच्च न्याय मंदिर ने एक आदेश पारित दिया है कि न्यायालय में निकलने वाले समस्त न्यायदृष्टान्त व न्यायिक फ़ैसलों की प्रथम प्रति हिन्दी में होगी, परन्तु 90 प्रतिशत इसी आदेश की अवहेलना न्यायमंदिर में होकर सभी निर्णय की प्रतियाँ अंग्रेज़ी में दी जाती हैं और यदि प्रति हिन्दी में माँगी जाए तो अतिरिक्त शुल्क जमा करवाया जाता है। और जब फ़ैसला अंग्रेज़ी में मिलता है तो आमजन उसे सहज रूप से नहीं समझ सकता, इसका भी कतिपय लोगों द्वारा फ़ायदा उठाया जाता है। इन सबके पीछे एक कारण यह भी रहा कि हमारी सरकारों ने हिन्दी को संपर्क भाषा के रूप में स्थापित करने की मंशा ही नहीं जताई, अन्यथा अन्य भारतीय भाषाओं और हिन्दी के बीच सबसे पहले समन्वय स्थापित किया जाता और हिन्दी को थोपा नहीं जाता बल्कि उन स्वभाषाओं के साथ स्थापित किया जाता।
कमोबेश हिन्दी की वर्तमान स्थिति को देखकर सत्ता से आशा ही की जा सकती है कि वे देश की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए, संस्कार सिंचन के तारतम्य में हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित कर, इसे अनिवार्य शिक्षा में शामिल करे। इन्हीं सब तर्कों के संप्रेषण व आरोहण के बाद ही हिन्दी को राष्ट्रभाषा का सूर्य मिलेगा और देश की सबसे बड़ी ताक़त उसकी वैदिक संस्कृति व पुरातात्विक महत्त्व के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम जीवित रहेगा।
हर भारतवंशी को स्वभाषा का महत्त्व समझा कर देश की एक केंद्रीय संपर्क भाषा के लिए तैयार करना होगा क्योंकि विश्व पटल पर भारत की कोई भी राष्ट्रभाषा नहीं है। हर भारतीय को चाहना होगा एक संपर्क भाषा वरना दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर रोटी खा जाएगा, मतलब साफ़ है कि यदि हमारी भारतीय भाषाओं के बीच ही लड़ाई चलती रही तो स्वाभाविक तौर पर अंग्रेज़ी उस स्थान को भरेगी और आने वाले समय में एक अदने से देश में बोली जाने वाली भाषा, जिसे विश्व में भी कुल 7 प्रतिशत से ज़्यादा लोग नहीं बोलते, भारत की राष्ट्रभाषा बन जाएगी।
भारत का भाल और इसका अभिमान भारत की भाषा के साथ संस्कृति से है, बिना भाषा के राष्ट्र का अस्तित्व खतरे में है। हमारा संकल्प होना चाहिए कि हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने के साथ ही अनिवार्य शिक्षा में शामिल करवाया जाए। तब ही संस्कार बचेंगे और भारत विश्वगुरु बन पाएगा। हिन्दी भाषा को भारत के जन-जन की भाषा बनाना होगा, तभी सामूहिक रूप से हिन्दी की स्वीकार्यता होगी।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
राष्ट्रीय अध्यक्ष- मातृभाषा उन्नयन संस्थान, भारत
09893877455/ 09406653005

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संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।