दलदल

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सुडौल शरीर , गोरा रंग और तीखे नैन नक्श की अनामिका जब सज – संवर कर निकलती , तो लोग उसे एकटक निहारते रह जाते । अनामिका थी ही ऐसी कि लोग उसे देखकर आहें भरा करते । अनामिका के पति काम के सिलसिले में प्राय: बाढ़ से बाहर ही रहते थे और जब तब ही अपने घर आया करते थे । इसी मौके का फायदा उठाने चाहते थे मोहल्ले के मनचले । मनचले उसे गंदी निगाहों से घूरते रहते थे और मौके मिलने की ताक लगे रहते। पर अनामिका मनचलों की गंदी निगाहो से बेखबर अपनी उदासी और एकाकीपन को दूर करने के लिए प्राय: किताबों में खो जाती या फिर घूमने निकल जाया करती थी ।

आज रात अनामिका को नींद नहीं आ रही थी । बिस्तर पर पड़े – पड़े उसे अपने पति आलोक की याद सताने लगी । आलोक के साथ बिताये पल उसे और अधिक बेचैन कर रहे थे । वह आलोक के यादों को जितना भूलने का प्रयास करती , वह उतना ही याद आ रहा था । उसके यादों को भूलाने के लिए अंधेरी रात में ही पार्क की ओर चल पड़ी ।
वह अभी कुछ ही दूर गयी होगी कि एक गाड़ी उसके करीब आकर रूकी । इस सुनसान रात में अपने पास गाड़ी रूकते देख वह घबरा गयी । फिर साहसकर एक ओर खड़ी हो गयी ।
गाड़ी दरवाजा खुला । उसमें से एक युवक बाहर निकला – ” अरे अनामिका , तुम अकेली इस सुनसान रात में घूम रही हो । तुम्हें डर नहीं लगता । “
अनामिका काफी रूखे स्वर में बोली – ” मैं आपको न तो जानती हूं और पहचानती हूं । फिर एक अकेली औरत का रास्ता रोकने का आखिर मतलब क्या है ?“
” अरे तुमने मुझे पहचान नहीं । मैं कमल हूं । मैं तुम्हारे पड़ोस में ही रहता हूं । “ कमल मुस्कुराकर बोला ।
” तो क्या ? मैं आपको नहीं पहचानती । भविष्य में इस प्रकार बीच रास्ते में मुझे रोकने का प्रयास मत करियेगा । हट जाइए मेरे रास्ते से ! “ अनामिका निर्भीक होकर बोली ।
कमल उसे समझाते हुए बोला – ” देखो अनामिका , समय खराब है । तुम्हारी जैसी हसीन औरत को इस प्रकार अकेले सुनसान रात में घूमना नहीं चाहिए । तुम तो गुलाब की खिलती कली हो । मैं पिछले कई दिनों से तुम्हें अकेले घूमते देख रहा हूं , इस प्रकार रात में अकेले घूमना खतरे से खाली नहीं । सच कहूं तो मैं तुमसे प्यार करने लगा हूं । “
इतना सुनते ही अनामिका क्रोधित स्वर में बोली – ” आपको यह सब बोलते हुए शर्म आनी चाहिए । मैं किसी की पत्नी हूं । किसकी अमानत हूं । आपने मुझे क्या समझ रखा है ? क्या आपके घर में मां – बहन नहीं है , जो बीच सड़क पर चल रही एक औरत से यह सब कह रहे हैं ? हटइए मेरे रास्ते से । “
कमल गिड़गिड़ाते हुए बोला – ” अनामिका , मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं । सारे जहां की खुशियां मैं तुम्हारे कदमों में लाकर डाल दूंगा । बस एक बार मेरा हाथ थाम लो । आलोक क्या तुम्हारे अरमानों को पूरा कर पाएगा ? वह तो तुम्हारी जैसी खूबसूरत पत्नी को यहां छोड़कर दर की दर ठोकरें खा रहा है । और तुम यहां घुट – घुट कर जीने को विवश हो । मैं तुम्हारी जिंदगी में खुशियों की बाहर ला दूंगा । बस एक बार …..“
” क्या बकवास किये जा रहो हो । क्या तुमने मुझे काॅल गर्ल समझ रखा है कि मैं पैसों पर बिक जाउंगी । मैं एक भारतीय नारी हूं , जो अपने पति के अलावा किसी और से पे्रम नहीं करती । विवाहिता स्त्री हूं । पर पुरूष के बारे में सोचना भी पाप समझती हूं । तुम जैसे रईसजादे के लिए ही तो काॅल गर्ल और कोठे खुले हैं । जाओ वहां जाकर अपने जिस्म की भूख मिटाओ । मैं आलोक की हूं और आलोक की ही रहूंगी । तुम मेरी नजरों से हट जाओ , वरना मैं शोर मचा दूंगी । “ इतना कहकर अनामिका तेज कदमों से अपने घर की ओर चल पड़ी ।
रास्ते में चलते हुए वह सोच रही थी कि इस अमीर के औलाद को दो – चार थप्पड़ क्यों न जड़ दी ? वह अपने आपको समझता है क्या ?
घर आते ही वह सीधे आईने के सामने खड़ी हो गयी । वह अपने आपको निहारने लगी और अपने बालोें के जूड़े से पिन निकालकर सिर को एक हल्का – सा झटका दिया , तो बालों का गुच्छा बिखर कर उसके संगमरमरी पीठ पर बिखर गया । इस प्रकार बिखरे बालों को देखकर आलोक कहता था – ” अनामिका , तुम्हारे खुले बाल तुम्हारी खूबसूरती में चार चांद लगा देते हैं । सच पूछो तो अनामिका तुम्हें छोड़कर जाने का मन नहीं करता । लगता है सारा दिन तुम्हें यूं ही बैठा देखता रहूं । मैं भी वहां तुम्हारे बिना बेचैन रहता हूं । सारी रात करवटें बदलता रहता हूं । पेट की आग बुझाने के लिए तो काम करना ही पड़ेगा । और मेरा काम है ही ऐसा कि तुम्हें अकेला छोड़कर जाना पड़ता है । ऐसा कौन पति होगा , जो इतनी खूबसूरत पत्नी को छोड़ कर जाना चाहेगा । लेकिन अनामिका , मुझे तुम पर पूरा भरोसा है । तुम मेरा विश्वास मत तोड़ना , अन्यथा मैं जीते जी मर जाऊंगा । “
वह बिस्तर पर पड़ी थी । उसके मन में तरह – तरह के ख्याल आ रहे थे । उसका मन कर रहा था कि वह अभी आलोक को फोन कर कमल के गंदी हरकतों के बारे में बता दें । लेकिन अगले पल ही उसके विचार बदल गये । वह भी कहेगा कि आखिर सुनसान रात में अकेली घूमने क्यों जाती हो ? और वह भी मुझ पर शक न करने लगे । यही सोचकर वह बिस्तर पर करवटें बदलने लगी । वह सोने की कोशिश कर रही थी , पर नींद तो उसकी आंखों से कोसों दूर चली गयी थी ।
वह कमल की कहीं बातों को भूलकर आलोक की यादों में खो गयी । वह सोचती है – ” जिंदगी में कैसा विरोधाभास आ गया है । वह हमेशा से महत्वाकांक्षिणी रही है , पर आलोक सदैव अपनी स्थिति से संतुष्ट रहा है । “
फिर वह कमल के बारे में सोचने लगी कि कैसा समय आ गया है कि आजकल के नौजवान पतन के दलदल में फंसते जा रहे हैं । आखिर हमारी सम्यता – संस्कृति क्यों विलुप्त होती जा रही है ? आज के नौजवान अपनी हवस की भूख मिटाने के लिए किसी की पत्नी तक को बिकाऊं समझने लगते हैं । वे अपनी शारीरिक भूख मिटाने के लिए किसी के बसे बसाये घर को उजाड़ने के लिए तैयार रहते हैं । आखिर इस सबके लिए जिम्मेवार कौन है ? आज के महंगाई के इस दौर में कुछ महिलाएं अपने परिवार की भूख मिटाने के लिए मजबूरी में अपने जिस्म का सौदा करती हैं , तो कुछ आधुनिकता की होड़ में अपने फैशन के लिए इन रईसजादों के हाथों की कठपुतली बन जाती है । इस प्रकार की महिलाओं ने इनके मनोबल को बढ़ा दिया है । वे रईसजादों के चक्कर में पड़कर अपना बसा – बसाया घर उजाड़ देती है या फिर अपनी जिंदगी तबाह कर डालती है । “
कमल दिखने में तो बहुत खूबसूरत है , पर भीतर से एकदम शैतान । वह पिछले कई दिनों से अनामिका को अपने जाल में फंसाने के फिराक में लगा था । लेकिन अनामिका उसके झांसे में नहीं आ रही थी।
वह स्नान कर बरामदे में बैठी सोच रही थी – ” उसकी एक सहेली थी सुनीता । उसका पति बाहर नौकरी करता था । वह अपने सास – ससुर के साथ रहती थी । सुनीता भी हमेशा घर से बाहर ही रहती थी । वह शौकीन मिजाज की थी । उसका आधुनिक रहन – सहन उसे गलत रास्ते की ओर ढकेल दिया । बड़े – बड़े होटलों में उसका आना – जाना था । देर रात घर लौटती थी । उसकी इस हरकत से परिवार वाले काफी परेशान थे । परिवारों वालों ने काफी समझाया । पर वह कहती – ” आप लोग बेवजह मुझ पर शक कर रहे हैं । सारा दिन अकेली बैठी घर में बोर होती रहती हूं । इस बोरियत से बचने के लिए अपनी सहेली के पास चली जाती हूं , न कि किसी होटल में ऐय्याशी करने । “
अनामिका ने भी उसे कई बार उसे समझाने का प्रयास किया था – ” सुनीता , देर रात तक घर से बाहर रहना ठीक बात नहीं । तुम अपनी शारीरिक भूख और पैसों की हवस मिटाने के लिए गलत रास्ते पर चल पड़ी हो । मात्र क्षणिक सुख और दिखावटी रहन – सहन के लिए तुम अपनी गृहस्थी में मत आग लगाओ । “
इस पर सुनीता कहती – ” अनामिका , मेरा पति जितना कमाता है उससे , तो मेरा भी खर्च पूरा नहीं होता । उसकी कमाई से किसी प्रकार दाल – रोटी चलती है । मेरा शौक कैसे पूरा होगा । फिर वह हमेशा बाहर ही रहता है । मैं सारी रात करवटें बदलती रहती हूं । मेरे तन – बदन में भी प्रेम की अग्नि की ज्वाला धधकती रहती है । यदि मेरा पति मेरे शरीर की अग्नि को शांत नहीं कर सकता , तो कोई दूसरा मर्द मेरे शरीर की अग्नि को शांत कर देता है , तो इसमें बुराई क्या है ? यदि मैं उसे अपना जिस्म सौपती हूं , तो वह मुझे बहुत कुछ देता है । फिर मैं रात में बिस्तर पर पड़ी तड़पती तो नहीं रहती । क्या उसे भूख नहीं लगती होगी ? क्या वह अपनी भूख नहीं मिटाता होगा ? यदि मैं अपनी भूख मिटाती हूं , तो इसमें गलत क्या ? तू ही बता ! कभी तुम भी पराये मर्द का सुख भोगकर देखो । पराये मर्द का सुख तुम समझ नहीं सकती । “
अनामिका सब समझती थी । लेकिन वह एक सभ्य और इज्जतदार घराने की बेटी और बहू थी ।
एक दिन सुनीता के पति ने उसे किसी पराये मर्द के साथ रंगरलियां मनाते देख लिया । वह बिना उससे कुछ कहे अपने परिवार के साथ शहर छोड़कर चला गया । आज सुनीता की जिंदगी नरक में तब्दील हो चुकी थी । वह अपनी दौलत और हवस की भूख के चक्कर में आज कहीं की नहीं रही । जो मर्द उसे अपनी बांहों में भर लिया करते थे , आज वही उसे देखकर अपनी नजरें चुरा रहे थे । कारण अब वह उनकी नजरों में बूढ़ी हो चुकी थी । आज उसे कोई देखना भी पसंद नहीं करता । आज वह घुट – घुटकर जीने को विवश थी ।
आज फिर वह शाम को घूमने की योजना बना ली थी । लेकिन आज उसके विचारों में अंतर आ गया था । उसके मन में एक अजीब – सी उथल – पुथल मची हुई थी । वह रास्ते में चलते हुए सोच रही थी कि यदि आज कमल ने फिर वही प्रश्न दोहराया , तो वह क्या जबाव देगी ? बड़े – बड़े शहरों में तो यह सब होता ही रहता है । सुनीता उससे हमेशा कहती थी कि अनामिका , तुम एक ठंडी औरत हो और तुम इतने दिनों अपने पति के बगैर कैसे रह लेती हो । क्या तुम्हारा मन नहीं मचलता ?
आज उसने भी निर्णय कर लिया था कि वह पराये मर्द का सुख भोगेगी । यही सोचकर वह विकास नगर की ओर तेज कदमों से बढ़ने लगी । जहां कमल पहले से ही अनामिका की प्रतीक्षा में खड़ा था । तभी उसके महकते शरीर में एक ऐेेेेेेेेेेेेेेेेेेेसी सिरहन दौड़ गयी , जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी ।
तभी कमल उसके करीब आकर बोला – ” अनामिका , मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं । तुम्हारे दीदार के लिए तुम्हारे घर के पास भटकता रहता हूं । मेरे इस आग्रह को मत ठुकराओ । बस ! एक बार मेरी बाहों में समा जाओ । मैं तुम्हारे कदमों में दुनिया की सारी खुशियां डाल दूंगा । “
अनामिका को आज न जाने क्या हो गया था ? उसने मौन स्वीकृति प्रदान कर दी । कमल अनामिका के हाथ को पकड़ें गाड़ी की ओर बढ़ने लगा । कमल को लगा कि आज उसकी मन की मुराद पूरी होने वाली है । आखिर चिड़िया उसके जाल में फंस ही गयी ।
तभी अनामिका की अंतरात्मा ने उसे धिक्कारा । क्या वह भी सुनीता के बताये हुए गलत कदम पर चलकर अपनी जिंदगी तबाह कर डालेगी ? वह मन ही मन सोचने लगी – ” वह जो करने जा रही है , क्या वह उचित है ? क्या एक पतिव्रता नारी के लिए यह उचित है ? यदि आलोक को यह सब पता चल गया , तो क्या वह अनामिका को माफ करेगा ? यह सब जानकर आलोक के दिल पर क्या गुजरेगी ? कहीं क्षणिक सुख पाने के चक्कर में अपनी गृहस्थी में आग तो लगाने नहीं जा रही है । और फिर जब उसके मां – बाप को यह बात पता चलेगी , तो क्या वह अपना मुंह दिखाने लायक रहेंगी ? “ यह सब सोचकर अनामिका एकदम से कांप गयी । उसके बढ़ते कदम रूक गये । वह अपना हाथ कमल के हाथों से छुड़ाकर वापस मुड़ने लगी ।
कमल बोला – ” क्या हुआ अनामिका ! तुम वापस क्यों मुड़ रही हो ? “
अनामिका बोली – ” मैं तुम्हारी बातों में आने वाली नहीं हूं । हमारी सभ्यता – संस्कृति इस बात इजाजत नहीं देती । मैं एक पतिव्रता नारी हूं और अपने पति के साथ गद्दारी नहीं कर सकती । इस दलदल में फंसकर मैं अपनी जिंदगी तबाह नहीं कर सकती हूं । “
कमल अनामिका को अपने चुंगल में से निकलते देख उसे जबरन गाड़ी की ओर खींचने लगा । अपने साथ जबरदस्ती होते देख अनामिका चिल्लाने लगी । तभी संयोग से पुलिस की गश्ती दल उधर से गुजर रहा था । शोर – शराबा सुनकर पुलिस की जीप वहां आकर रूक गयी ।
पुलिस को देखते ही कमल वहां से भागने लगा । पुलिस के जवानों ने उसे दौड़कर पकड़ लिया और उसे दरोगा जी के पास ले गये। दरोगा जी ने उसे देखते ही पहचान लिया और बोले – ” अरे , यह तो लड़कियों का सप्लायर कमल है । यह भोली – भाली लड़कियों को अपने जाल में फंसाकर काॅल गर्ल का काम करवाता है । यह अब तक न जाने कितनी भोली – भाली लड़कियों को अपने जाल में फांसकर इस दलदल में ढकेल चुका है । इस पर तो कई युवतियों को गायब करने का आरोप है । “
दरोगा जी अनामिका की ओर देखते हुए बोले – ” आप तो किसी सभ्य घर की लगती है , फिर इस सुनसान रात में अकेली क्यों घूम रही थी ? अच्छा हुआ हम लोग सही समय पर आ गये । वरना यह हरामाजादा आपके साथ न जाने क्या करता ? आप जैसी पढ़ी – लिखी लड़की को इस प्रकार अकेले रात में नहीं घूमना चाहिए और फिर इस कमीने के चक्कर में कैसे फंस गयी । “
” यह पिछले कई दिनों से मेरे पीछे पड़ा था और आज मौका मिलते ही मेरे साथ जबरदस्ती करने लगा । यदि आप लोग समय पर न आते तो यह कमीना मेरी इज्जत पर हाथ डाल ही देता । मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहती । “ अनामिका रूआंसे स्वर में बोली ।
” अब आप आराम से घर जाइये । मैं इस हरामजादे को अच्छी तरह सबक सिखाता हूं । साला अब जेल की कोठरी में चक्की पिसेगा । लेकिन हां , आप भी इस प्रकार अकेली सुनसान रात में घूमने न निकले । समय खराब है । “ और दरोगा जी उसे धकेलते हुए जीप में बैठा दिया ।
रास्ते में चलते हुए अनामिका सोच रही थी – ” आज ईश्वर ने उसे इस दलदल में फंसने से बचा लिया । वरना वह अपने परिवार और समाज को मुंह दिखाने लायक नहीं रहती । मात्र क्षणिक सुख के लिए उसका हंसता – खेलता परिवार बिखर जाता । और वह भी नारकीय जीवन जीने को मजबूर हो जाती । “ और वह तेज कदमों से अपने घर की ओर चली जा रही थी ।
पुष्पेश कुमार पुष्प
बाढ़ बिहार )

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संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।