सूची, अनुसूची और साहित्य अकादमी के पुरस्कार !

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साहित्य अकादमी के पुरस्कार पाने की होड़ एक और संविधान की अष्टम अनुसूची में स्थान पाने की होड़ का रूप ले रही है तो दूसरी ओर कुछ बोलियाँ साहित्य अकादमी की मान्यता के आधार पर अष्टम अनुसूची में स्थान पाना चाहती हैं। इस प्रकार संघ की राजभाषा हिंदी सहित भविष्य में अन्य भारतीय भाषाओं को विघटन की ओर ले जाती दिखती हैं।

अनेक बोलियों के साहित्यकारों का कहना है कि अष्टम अनुसूची में न होने से उन बोलियों में लिखे जानेवाले श्रेष्ठ साहित्य की कोई पूछ नहीं, उन्हें कोई सम्मान नहीं मिलता। एकदम सही बात है। इसका विश्लेषण जरूरी है। यदि हम 2011 के जनगणना के आंकड़ों को भी लें तो हम पाते हैं कि हिंदी क्षेत्र की कई बोलियों को बोलने वालों की संख्या करोड़ों में है, उनमें कुछ उन्नत साहित्य भी रचा जा रहा है। लेकिन उसे पूछनेवाला कोई नहीं है। जो अष्टम अनुसूची में होगा, कैसा भी साहित्य हो, उसे पुरस्कार मिलेगा। भले ही उसके बोलने वालों की संख्या कितनी ही कम क्यों न हो, कैसा ही साहित्य हो। जो अष्टम अनुसूची में नहीं होगा उसे पुरस्कार नहीं मिलेगा, भले ही उसके बोलने वालों की संख्या बहुत ज्यादा क्यों न हो, श्रेष्ठ साहित्य ही क्यों न हो। 2011 की जनगणना के अनुसार बोडो 0.12%, मणिपुरी 0.15 %, कोकणी 0.19 %, डोंगरी 0.21%, सिंधी 0.23%, नेपाली 0.24%, कश्मीरी 0.56%, संथाली 0.61% ये सब 1% से काफी कम है। जबकि हिंदी और इसकी बोलियों सहित हिंदी भाषी 43.6 प्रतिशत उसके लिए भी एक ही पुरस्कार, बोली साहित्य की कोई पूछ नहीं। यानी अष्टम अनुसूची में आने पर पुरस्कार का रास्ता खुल जाता है। ऐसे में असंतोष तो होगा ही। अष्टम अनुसूची में आने की लड़ाई तो होगी ही, स्वभाविक है।

एक बहुत बड़े झगड़े की जड़ हैं साहित्य अकादमी के पुरस्कार। जो श्रेष्ठ साहित्य से अधिक महत्व संविधान की अष्टम अनुसूची और अपने द्वारा बनाई गई बोली-भाषाओं की सूची को देती है। आश्चर्य की बात यह कि अनेक बोलियों, उपबोलियों में निहित श्रेष्ठ साहित्य को प्रतियोगिता से बाहर रखा जाता है और चुपके से अंग्रेजी को गोद में बैठा लिया जाता है। साहित्य अकादमी को इन तमाम बिंदुओं पर गहन विचार मंथन करना चाहिए ताकि सूचियों और अनसूचियों के जाल में श्रेष्ठ साहित्य की उपेक्षा या सतही साहित्य को पुरस्कृत न किया जाए। इसके लिए साहित्य अकादमी जैसे पुरस्कारों को अष्टम अनुसूची या अन्य किसी सूची से पूरी तरह अलग कर दिया जाना चाहिए। साहित्य अकादमी जितने भी पुरस्कार देना चाहती है वह दे, किसी अनुसूची को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि श्रेष्ठ साहित्य को ध्यान में रखकर। फिर वह श्रेष्ठ साहित्य देश की किसी भी भाषा, बोली, या उप बोली में ही क्यों न हो। साहित्य का पुरस्कार श्रेष्ठता के कारण मिले, न कि किसी भाषा बोली के किसी सूची में होने के चलते। बड़ी से बड़ी भाषा बोली में यदि श्रेष्ठ साहित्य नहीं लिखा गया तो पुरस्कार नहीं मिलना चाहिए, अगर किसी छोटी से छोटी बोली या उपबोली आदि में भी श्रेष्ठ साहित्य है तो उसे सम्मान मिलना चाहिए। यही न्याय संगत है, यही होना चाहिए। संस्कृति मंत्रालय को भी इस पर विचार करना चाहिए।

डॉ. एम.एल. गुप्ता ‘आदित्य’

निदेशक, वैश्विक हिंदी सम्मेलन

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।