साथी चाहिए…

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कटती नहीं उम्र,
अब तेरे बिना।
मुझको किसीसे मानो,
प्यार हो गया।
जिंदगी की गाड़ी अकेले,
अब चलती नहीं।
एक साथी की जरूरत,
मुझे अब आ पड़ी।।

मिलना मिलाना जिंदगी का,
दस्तूर है लोगों।
खिल जाता है दिल जब कोई,
अपना मिलता है यहां।
जिंदगी के इस सफर में,
मिलकर चलो सभी।
यूंही जिंदगी हंसते,
हुए गुजर जायेगी।।

मतलबी लोगो से थोड़ा,
बच के तुम चलो।
कब धोका दे देंगे,
पता चलेगा भी नहीं।
इसलिए अपनेपन की,
परिभाषा तुम सीखो।
फिर उसके अनुसार ही,
अपनो को तुम चुनो।।

जीवन तुम्हारा सही में
संभाल जाएगा।
हर मुश्किल की घड़ी में
तुम्हें दिख जाएगा।
कौन किसके साथ खड़े है,
मुश्किल की घड़ी में।
सब कुछ तुझे
समाने नजर आएगा।।

अच्छे बुरे लोग,
तुझे दिख जाएंगे।
संसार का चक्र,
तुम्हें दिख जायेगा।
जिंदगी को जीना
आसान काम नहीं।
मिल जुलकर जीओगें तो,
इसमें आंनद बहुत आएगा।।

जय जिनेन्द्र देव की
संजय जैन (मुंबई)

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।