बंदा सिंह बहादुर (बलिदान दिवस 9 जून)

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कश्मीर के पुंछ में एक राजपूत परिवार में इस बालक का जन्म होता है बालक लक्ष्मण दास बचपन में बहुत चपल और उद्दंड थे, अपने मित्रों के साथ बहुत शरारत करते। युवावस्था की कुछ घटनाओं के कारण लक्ष्मण दास का मन सांसारिक संबंधों और परंपराओं से विलग हो गया था उनके मन के इस अवचेतन प्रवाह को एक संत ने सही दिशा दी। जानकी दास जी के सानिध्य में रहकर लक्ष्मण दास साधना की दीक्षा लेने लगे। गुरु जानकीदास ने ही इनका नाम माधवदास रखा इनके पश्चात एक अन्य संत रामदास को माधवदास ने गुरु माना उनके तपोबल व तंत्र क्रियाओं से माधवदास बहुत प्रभावित थे। गुरु से दीक्षा लेकर माधवदास भी योग साधना में शक्ति अर्जित करने में लग गए। परन्तु इन्हें अब तक आत्मिक शांति नही मिली थी। माधवदास उसी की खोज में थे। गोदावरी के तट पर नांदेड़ में जाकर इन्होंने अपना आश्रम बनाया तथा वहीं पर योग साधना करने लगे। इनकी क्रियाओं के वशीभूत कई लोग इनके शिष्य भी बने। तंत्र क्रिया से डरकर आस पास के सभी ग्रामीण इनका सम्मान करते थे। यदा-कदा समस्या लेकर आने वाले ग्रामीणों की दुविधा व रोग का निवारण माधवदास करने लगे थे। जब गुरु गोविंद सिंह जी नांदेड़ प्रवास पर पहुंचे तब क्षेत्र के ही उनके शिष्यों ने एक बार माधवदास से मिलने का आग्रह किया। माधव दास के विषय में सुनकर गुरु गोविंद सिंह नांदेड़ में स्थित उनके आश्रम में पहुंचे। उस समय माधवदास आश्रम में नहीं थे। आश्रम में आकर गुरु गोविंद सिंह माधव दास के ही आसन पर विराजे। यह देखकर उनके शिष्यों ने गुरु जी पर अपनी सारी क्रिया प्रयोग कर ली किन्तु कोई प्रभाव नही हुआ। जब माधव दास आश्रम में आए तब यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए की एक असामान्य सा दिखने वाला व्यक्ति उनके आसन पर बैठा है माधव दास ने भी अपनी पूरी शक्ति से गुरु गोविंद सिंह जी की परीक्षा ली, किंतु गुरु गोविंद सिंह स्वयं मंत्र शक्ति से संपन्न थे, धर्म रक्षक थे। इसलिए माधव दास की क्रियाओं का उन पर कोई प्रभाव नहीं हुआ। यह देख कर माधव दास गुरु गोविंद सिंह जी के प्रति समर्पित भाव से प्रस्तुत हुए और उनकी दिव्यता को जानकर स्वयं को शिष्य रूप में स्वीकार करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि “मुझे अपना बंदा स्वीकार करें।” तब गुरु गोविंद सिंह जी ने माधवदास को कहा कि वैराग्य तुम्हारा भाग्य नहीं है तुम राजपूत कुल के योद्धा हो युद्ध तुम्हारा कर्म है शस्त्र ही तुम्हारे साधन। इसलिए हे वीर पुरुष ! राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए युद्ध के लिए सज्ज हो जाओ। गुरु गोविंद सिंह जी द्वारा बताए गए 5 वचनों और उनके द्वारा दिए गए 3 बाण से उन्होंने माधवदास को सज्ज किया और यह कहा कि जब तक तुम इन वचनों पर चलते हुए राष्ट्र धर्म की रक्षा करोगे तब तक यह तीन बाण तुम्हें हर युद्ध में विजय दिलाते रहेंगे। गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने सरदारों के साथ माधवदास को पंजाब जाकर धर्म रक्षा करने का निर्देश दिया, उस समय मुगलों के आक्रमण से पंजाब त्रस्त था। गुरु गोविंद सिंह जी का बंदा होने के कारण माधवदास का बंदा बहादुर नाम प्रचलित हुआ आगे जाकर बंदा बहादुर गुरु गोविंद सिंह जी के वीर सेनापति बने, जिन्होंने ग्रुप पुत्रों के बलिदान का बदला सरहिंद के सेनापति वजीर खां से लिया, सरहिंद पर कब्जा किया और सूबेदार वजीर खां को मारकर गुरु पुत्रों को श्रद्धांजलि दी। युद्ध में शौर्य और पराक्रम का परिचय देते हुए बंदा बहादुर मुगलों के लिए साक्षात महाकाल का दूसरा नाम बन गए थे, मुगल और तुर्कों में बंदा बहादुर के नाम सुनकर कोई सेनापति उनके समक्ष युद्ध करने को तैयार नहीं होता था। परंतु कई वर्षों के संघर्ष के बाद सन 1716 में मुगल सेना ने बंदा सिंह बहादुर को एक किले में घेर लिया था कई दिनों के घेराव के पश्चात युद्ध करने के बाद भी बंदा सिंह बहादुर बंदी बना लिए गए। क्रूर यंत्रणाओं के साथ पिंजरे में कैद करके उन्हें और 700 सिक्खों को दिल्ली ले जाया गया, उनके सामने ही उनके 7 वर्ष के पुत्र को प्रस्तुत किया गया। उनके पुत्र को इस्लाम स्वीकारने का हुक्म दिया गया बंदा सिंह बहादुर की तरह उनका पुत्र भी गुरुओं के पराक्रम और शौर्य से संस्कारी था उसने अपने प्राण देना स्वीकार किया परंतु धर्म नहीं बदला। बंदा सिंह बहादुर के सामने ही उनके पुत्र को मार दिया गया, मुगल सैनिकों ने उस बालक के दिल को निकालकर बंदा सिंह के मुंह मे ठूसने का घिनोना काम किया। गर्म सलाखों से बंदा सिंह बहादुर की चमड़ी निकाली गई, अंत में वही गर्म सलाखें उनकी आंखों में घुसा दी जाती है, घोर यंत्रणाओं के बाद भी जब बंदा सिंह बहादुर इस्लाम स्वीकार नही करता तो जल्लाद एक ही वार में उनका सर धड़ से अलग कर देता है। हमें गर्व होना चाहिए वीर बंदा सिंह जैसे वीरों पर जिन्होंने यातनाएं स्वीकार की, बेटे की म्रत्यु स्वीकार की, शीश कटने पर भी इस्लाम स्वीकार नही किया। इन्ही बलिदानों के कारण आप और हम हिन्दू के रूप में धर्म का पालन कर पा रहे है, बंदा सिंह बहादुर जैसे पराक्रमी वीर पुरुषों के कारण ही सनातन धर्म आज तक बचा हुआ है, आज 9 जून वीर बंदा सिंह बहादुर का बलिदान दिवस है।

मंगलेश सोनी
मनावर (मध्यप्रदेश)

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।