जंगल राज

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स्टेचू ऑफ यूनिटी के
पीछे छुपा हुआ एक मोटा सा चूहा
बार बार आता है
और भारत के नक्शे को कुतर कर चला जाता है
गांधी की तश्वीर के पीछे की छिपी
छिपकली भी अब मगरमच्छ हो गई है।
कीट पतंगे खाने वाली अब तो
पूरा आदमी खा जाती है
और तो और उसके बाद फिर इसे डकार भी नहीं आती है।
गाय के गोबर में छुपा गुबरैला भी
चुपके से  बाहर आता है
और धर्म की आग को मुंह में दबाकर
‘निबरे’ के छप्पर में घुस जाता है।
संविधान की किताब में छुपा हुआ झींगुर
उसके पन्नों को ही खा रहा है
पर उसे मारना तो दूर
उसे छूने से भी लाइब्रेरियन घबरा रहा है।
गोधन छुट्टा हैं
पर गोमूत्र भी बिकाऊ है
बांटो और राज करो वाला नुस्खा
जितना पुराना है उतना टिकाऊ है।
कुछ भेड़िये सफेद कपड़ो में
वोट मांगने आये हैं
जो भेड़ो और बकरियों के पाँव छू रहे हैं
 मेमनों को दुलरा रहे हैं।
और उन्हें शेर बना देने के के सपने दिखा रहे हैं।
चप्पा चप्पा विदूषकत्व से परिपूर्ण है
बस एक आदमी है जो हर जगह अपूर्ण है।।।
#चित्रगुप्त 
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।