दो परवाने चंदन और बेचैन

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suresh sourabh

कभी वे सिर पर मैला ढोेने वालो की टोकरियो को दहन करके शासन से उनके लिए रोजगार की मॉग करते हैं , तो कभी सेप्टिक टैंक में मरने वाले मजलूमों की आवाज को आन्दोलन का रूप देते हैं। जी हॉ लखीमपुर जिले के ये दो परवाने चंदन लाल वाल्मीकि और कवि श्याम किशोर बैचेन हैं जो दलितो शोषितो की दबी आवाजों को बुलंद कर रहे हैं । सबसे बड़ी संतोषजनक बात यह है कि इनके कार्यक्रमों में सामाज के सभी वर्ग बढ-चढ कर सहयोग करतें हैं चाहे पत्रकार नंद कुमार मिश्रा, विकास सहाय हो या सौजन्या प्रमुख डॉ उमा कटियार सभी इन अंधड़ आंधी तूफानो से बढ़ते चंदन और बेचैन का समर्थन करतें हैं । दोनों से जब मैं पूछता हूं दलितो वंचितो के समाज के लिए कब तक लड़ेगे वे कहते हैं- जिंदगी भर चाहे इसके लिए मरना ही क्यों न पडे़। संतोष ये है दोनों लोकतांत्रिक तरीके से समाज के उत्थान के लिए लड़ रहे हैं।

#सुरेश सौरभ
निर्मल नगर लखीमपुर खीरी

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।