न रख इतना नाज़ुक दिल

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शीrupesh jain

इश्क़ किया तो फिर न रख इतना नाज़ुक दिल

माशूक़ से मिलना नहीं आसां ये राहे मुस्तक़िल

तैयार मुसीबत को न कर सकूंगा दिल मुंतकिल

क़ुर्बान इस ग़म को तिरि ख़्वाहिश मिरि मंज़िल

 

मुक़द्दर यूँ सही महबूब तिरि उल्फ़त में बिस्मिल

तसव्वुर में तिरा छूना हक़ीक़त में हुआ दाख़िल

कोई हद नहीं बेसब्र दिल जो कभी था मुतहम्मिल

गले जो लगे अब हिजाब कैसा हो रहा मैं ग़ाफ़िल

 

तिरे आने से हैं अरमान जवाँ हसरतें हुई कामिल

हो रहा बेहाल सँभालो मुझे मिरे हमदम फ़ाज़िल

नाशाद न देखूं तुझे कभी तिरे होने से है महफ़िल

कैसे जा सकोगे दूर रखता हूँ यादों को मुत्तसिल

 

#डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।