अमर भाई-बहना का प्यार..

satish
रहें सलामत सबके भैया,सबको दुआ हजार।
सजे कलाई हाथ सभी के राखी के त्यौहार॥
अमर भाई-बहना का प्यार…।
धूप दीप रोली चंदन की थाली लिए खड़ी बहना।
बाँधेगी निज प्यार कलाई छोटी और बड़ी बहना॥
एक अनोखे बँधन का है, यह पावन त्यौहार…
अमर भाई-बहना का प्यार…॥
रेशे-रेशे में धागे के प्यार गूंथकर लाई है।
भाई की खुशहाली का संसार गूंथकर लाई है॥
भाई हो खुशहाल दुआ करती है बारम्बार …
अमर भाई-बहना का प्यार…॥
बाँध कलाई पर राखी,भाई को तिलक लगाएगी।
युग-युग रहे सलामत भैया,बहना मंगल गाएगी॥
एक-एक पल में देगी आशीष हजार हजार…
अमर भाई-बहना का प्यार…॥
पैसा-गहना-कपड़े का उपहार नहीं चाहे बहना।
कोठी-बँगला या फिर कोई कार नहीं चाहे बहना॥
राखी के बदले चाहे बस रिश्तों का संसार…
अमर भाई-बहना का प्यार…
                                                                    #सतीश बंसल
परिचय : सतीश बंसल देहरादून (उत्तराखंड) से हैं। आपकी जन्म तिथि २ सितम्बर १९६८ है।प्रकाशित पुस्तकों में ‘गुनगुनाने लगीं खामोशियाँ (कविता संग्रह)’,’कवि नहीं हूँ मैं(क.सं.)’,’चलो गुनगुनाएं (गीत संग्रह)’ तथा ‘संस्कार के दीप( दोहा संग्रह)’आदि हैं। विभिन्न विधाओं में ७ पुस्तकें प्रकाशन प्रक्रिया में हैं। आपको साहित्य सागर सम्मान २०१६ सहारनपुर तथा रचनाकार सम्मान २०१५ आदि मिले हैं। देहरादून के पंडितवाडी में रहने वाले श्री बंसल की शिक्षा स्नातक है। निजी संस्थान में आप प्रबंधक के रुप में कार्यरत हैं।

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आईना

Tue Aug 8 , 2017
धुँधली शक्ल का दोष,आईने पर लगा दिया, आईने को तोड़कर उसने,धूल में मिला दिया। सोचा नहीं वह बेजान,खामोश शीशा है, टूटकर भी आईने ने,संभलना सिखा दिया। कहता रहा तू आईने को,मेरा गुलाम है, तेरे गुरुर को उसने,मिट्टी में मिला दिया॥                     […]

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