बिना नकदी नहीं चलती भाई दुनिया…

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राजेश ज्वेल

(9827020830)

यह लेख स्वतंत्र लेखन श्रेणी का लेख है। इस लेख में प्रयुक्त सामग्री, जैसे कि तथ्य, आँकड़े, विचार, चित्र आदि का, संपूर्ण उत्तरदायित्व इस लेख के लेखक / लेखकों का है, मातृभाषा.कॉम का नहीं।

क्या बिना नकदी के लेन-देन संभव है..? इसका जवाब दुनिया के किसी भी कोने की अर्थव्यवस्था में ढूंढने से भी नहीं मिलता। यह बात अलग है कि अंडमान द्विप समूह के उत्तरीय सेंटीनेल द्विप में रहने वाले आदिवासी या अमेजॉन के जंगलों में रहने वाले कबीले जरूर किसी तरह की मुद्रा का इस्तेमाल नहीं करते, तो क्या हम भी उसी युग में पहुंच जाएं..? अभी कैशलेस सोसायटी का बड़ा हल्ला मोदी सरकार द्वारा मचाया जा रहा है। अब सरकार भी बेचारी क्या करे, उसने भ्रष्टाचार और कालेधन के साथ आतंकवाद के नाम पर जनता को कतार में खड़ा कर दिया और पिछले दरवाजे से कालाधन परवारे सफेद भी होता गया। अब कतार में खड़ी जनता को कैशलेस की घुट्टी पिलाई जा रही है। दुनियाभर में जितने भी विकसित देश हैं वहां भी नोट यानि मुद्रा में बड़ा लेन-देन होता है। बिना नकदी के दुनिया की किसी भी अर्थव्यवस्था की कल्पना नहीं की जा सकती। जब राज व्यवस्थाएं थीं तब भी सीप से लेकर कौडिय़ों का इस्तेमाल विनिमय के लिए होता था, इसीलिए पैसे के साथ आज तक कौड़ी शब्द का इस्तेमाल होता है। जब कागज के साथ ये वायदा या गारंटी जुड़ गई कि उसे सोने के बदले भी विनिमय किया जा सकता है, तो वह कागज का टुकड़ा सबसे अधिक उपयोगी हो गया, जिसे हम नोट कहते हैं। पहले सरकारें अपने खजाने में रखे सोने के मूल्य के बराबर ही नोट छापती थी, लेकिन बाद में लागत और मुनाफे की अवधारणा आ गई। उदाहरण के लिए 500 रुपए का एक नोट छापने की लागत एक रुपए आती है, तो वह देश उस तरह के 499 नोट और छाप लेता है। कागज के नोट जहां लेन-देन में आसान हुए वहीं दुनियाभर में मान्य भी हो गए, चाहे वह रूबल हो या डॉलर। दुनिया घूमने वाले भी उसी करंसी यानि नकदी में लेन-देन करते हैं और एक अजनबी के साथ भी मुद्रा के रूप में ही आसानी से लेन-देन हो जाता है। कागजी नोट के इस्तेमाल में न तो आपको मोबाइल की जरूरत है, न ही इंटरनेट कनेक्शन की। दुनिया में सबसे अधिक कानून का पालन जापान में किया जाता है। वहां भी जीडीपी अनुपात की 18 प्रतिशत नकद मुद्रा चलन में रहती है, जबकि भारत में जीडीपी अनुपात का 13 प्रतिशत ही। जर्मनी में 80 फीसदी लेन-देन नकदी होता है। यहां तक कि हॉन्गकॉन्ग, रूस और दुनिया का चौधरी अमेरिका भी अपनी जीडीपी में 7.7 प्रतिशत नकदी का इस्तेमाल करता है। मजे की बात यह है कि अभी सरकार चलाने वाले जनता को उपदेश देते हुए विदेशों से कैशलेस की तुलना कर रहे हैं, लेकिन मैदानी हकीकत नहीं बताते। दुनिया के तमाम विकसित देशों की तुलना में भारत में बैंक शाखाओं से लेकर एटीएम और पीओएस मशीनें सबसे कम हैं। प्रति 10 लाख लोगों पर जहां अमेरिका में 360 बैंक शाखाएं हैं, तो ब्राजील जैसे छोटे देश में 938 और हॉन्गकॉन्ग में 217, तो अभी ऑस्ट्रेलिया, जिसने बड़ा नोट बंद किया वहां भी 269 बैंक शाखाएं हैं, जबकि भारत में मात्र 108। यही हाल एटीएम का है, अमेरिका में प्रति 10 लाख लोगों पर 1336 एटीएम है, तो रूस में सबसे ज्यादा 1537 और चीन में 450, तो भारत में मात्र 149 है। अभी पीओएस यानि स्वाइप मशीनों की बड़ी मांग चल रही है। इस मामले में भी भारत दुनिया के तमाम देशों की तुलना में फिसड्डी है। अमेरिका में 10 लाख लोगों पर सर्वाधिक 43711 पीओएस मशीनें हैं, तो भारत में सबसे कम मात्र 889 ही। इसके अलावा साइबर सुरक्षा सहित टेलीफोन, मोबाइल फोन से लेकर इंटरनेट की भारत में क्या स्थिति है यह बताने की जरूरत नहीं। जो मंत्री कॉल ड्रॉप की समस्या दूर करने में फेल रहा, उस मंत्री को आज कैशलेस पर ज्ञान बांटने का जिम्मा दिया गया है। फिलहाल तो बिना नकदी वाले भारत का ढोल पीटने वाले जिम्मेदार या तो कल्पना लोक में विचरण कर रहे हैं या उन्हें जमीनी हकीकत ही पता नहीं है… खुदा खैर करे!

(लेखक परिचय : इंदौर के सांध्य दैनिक अग्निबाण में विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत् और 30 साल से हिन्दी पत्रकारिता में संलग्न एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया पर भी लगातार सक्रिय)

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29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।