खुशी हो या गम नशा का सेवन क्यों 

aashutosh kumar
पर्व-त्योहारों या गम को दूर करने के लिए अथवा विभिन्न सामाजिक पार्टीयों में विशेषकर फब पार्टीयों में नशीली पदार्थो जैसे शराब सिगरेट आदि का प्रचलन बढ़ रहा है और इसे बुराई के तौर पर देखने की प्रवृत्ति प्रायः कमजोर हुई है।नतीजा, युवा वर्ग इस ओर ज्यादा आकर्षित हुए हैं जो एक सभ्य समाज के निर्माण के लिए बेहद चिंतनीय है।आर्थिक और शारीरिक नुकसान के साथ-साथ घर का सामाजिक-आर्थिक तानाबाना भी बिखर जाता है निश्चिय हीं नशीली पदार्थ का   सेवन शरीर और आत्मा, दोनों को  नाश करती है।जिससे मानवता का हनन होना लाजिमी है।
     ऐसी पार्टीयों में नशा नही करने वालो की आवाज मुश्किल से सुनाई देती है। हालत यहां तक पहुंच गई है कि जो इन समारोहों में नशा की बात नहीं करते हैं उन्हें नीची निगाह से देखा जाता है और उन्हें  दूसरी अथवा नीचले या देहाती समझकर घृणित निगाह से देखा जाने लगा या विवश किया जाने लगा है।आखिर इस निजी और अच्छे आचरण को भी नशा के शौकीन लोग भावनाओं और मौलिकता को भेदभाव की बलि चढा देते  है सभी के लिए समान भावना अब भरोसेमंद नहीं रही।अब खानदान, मान- मर्यादा या बड़ो का आदर,साधु-संतो का सत्कार जैसी भावनाएँ का ह्रास लगातार चरम पर है। समाज के वरिष्ठ लोग खुल कर निराशा जाहिर करते हैं और युवाओं को समझाने की कोशिश करते है लेकिन वो भी भैंस के आगे बीन बजाने के समान है उल्टे बुजुर्ग लोग ही उपेक्षाओं के शिकार हो जाते हैं।
       नशीली पदार्थो या शराब का सेवन राक्षसी और तामसी प्रवृत्ति का माना जाता है प्रचीन काल में यह राक्षसों का  पेय था क्योंकि राक्षस लोग ज्यादा भोजन और उपद्रव करते थे इसलिए उन्हें मदिरा पिलाकर मता दिया जाता था ताकि वे ज्यादा सोयें और कम क्रूरता बरतें कम खायें क्योंकि उतना खाना मिलना दुर्लभ था।जिसका उदाहरण हमें रावण के भाई कुम्हकरण की कहानियों से मिलता है।कहने का तात्पर्य क्या इस तरह शराब या अन्य नशीले पदार्थ का प्रचलन हमारे युवाओ को खोखला और राक्षसी प्रवृत्ति की ओर नही ले जा रहा?क्या समाज में बढती क्रूरता नशा तो नही?ऐसे संवेदनशील मसले पर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों सामाजिक संगठनो के प्रभावी पहल की आवश्यकता आखिर इन खोखले होते मानसिकता पर कब होगा? यह तथ्य चिंतापरक है। हालांकि देश के कुछ राज्यों में इसके रोकथाम के लिए सख्त कानून बनाया गया है जिसका असर विशेषकर बिहार में देखने को मिल रहा है जहाँ शराब का चलन कुछ हद तक कन्ट्रोल में है ऐसे प्रभावी कदम की आवश्यकता शायद देश के सभी राज्यो को भी है।एक आदमी को कभी भी हटाया जा सकता है, लेकिन एक व्यवस्था  को हटाना कठिन होता है धीरे धीरे नशा का सेवन व्यवस्था में तब्दील होती जा रही है।
आज का युवा वर्ग नशा को नैतिक जिम्मेदारी समझने लगा है शराब सिगरेट तम्बाकू गुटखा जर्दा ड्रग्स गाजा भांग जितने भी नशीली वसूतुएँ है सभी के सभी जानलेवा है यह न तो कभी किसी को खुशी दे सकता है और न कभी गम बाँट सकता है।फिर ऐसे पदार्थो का इस्तेमाल क्यों?आज हम गरीबी भूखमरी कुपोषण के साथ कई ऐसी जटिल बीमारियों से लड़ रहे है रोज नई नीतियां बन रही है जबकि अरबो -खरबो रूपये रोज पानी की तरह इनसब नशीली पदार्थो के इस्तेमाल पर बहा दिए जाते है ।हालांकि इन सब चीजो के नियंत्रण के लिए कानून है नशामुक्ति केन्द्र भी है लेकिन भटके हुए युवाओ की तादाद भी कम नही जिनके रोजमर्रा के रूटीन में यह शामिल हो चुका है।कई घर और कई लोग नित ही जानलेवा रोगों के शिकार भी हो रहे है।जितने भी अस्पताल है शायद ही कोई ऐसा हो जिनमें ऐसे मरीज ना पहुँचते हो जो नशे की वजह से जिन्दगी और मौत के बीच उलझकर न रहे हो।एक ऐसा पदार्थ जो धीरे-धीरे अंदर ही अंदर खोखला कर जाता जबतक पता चलता देर हो जाती है और पूरे परिवार की गाढी कमाई के साथ जीवन को भी निगल जाती है।रह जाता है सिर्फ अफसोस।मानव के चरित्र,  गुण जीवन,सुख, आर्दश,नैतिकता, व्यवहार संस्कार और सरलता का विनाशक है नशा।जितनी दूर इससे रहेगे उतना बेहतर जीवन जी सकेंगे।

“आशुतोष”

नाम।                   –  आशुतोष कुमार
साहित्यक उपनाम –  आशुतोष
जन्मतिथि             –  30/101973
वर्तमान पता          – 113/77बी  
                              शास्त्रीनगर 
                              पटना  23 बिहार                  
कार्यक्षेत्र               –  जाॅब
शिक्षा                   –  ऑनर्स अर्थशास्त्र
मोबाइलव्हाट्स एप – 9852842667
प्रकाशन                 – नगण्य
सम्मान।                – नगण्य
अन्य उलब्धि          – कभ्प्यूटर आपरेटर
                                टीवी टेक्नीशियन
लेखन का उद्द्श्य   – सामाजिक जागृति

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।