किसी कृष्ण की तलाश करें

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nasrin ali
मनुष्य का जब जन्म होता है तो वह प्रथम तीन से जुड़ता है। पहला स्थान माँ का है। माँ का वह अभिन्न अंग है,पिता  उसके लिए सूचना है और प्रसव के
समय धाय से भी वह अज्ञात भाव से परिचित हो जाता है। इन तीनों से जुड़कर वह इस धरती पर लीला शुरू करता है। जीवन की यात्रा में चलते-चलते चाहे किसी परिस्थिति  के भंवर में डूब जाए,थककर चूर-चूर हो जाए,अपंगु हो जाए या गिरते-पड़ते मंजिल तक ही पहुंच जाए,पर समय का चक्र अबाध गति से चलता रहता है। सुबह और शाम अपने नियमित रूप से अपने नियमित समय पर न जाने कबसे आते और जाते रहे हैं। हमारा जीवन इस चक्र के साथ बंधा हुआ है। जीवन जब शुरू होता है,तो हम इस भागते  हुए समय के किसी अंश पर निशान लगाकर चल पड़ते हैं और जब जीवन समाप्त  होता है तब किसी अंश पर निशान बना देते हैं। तब कहते हैं-शांति,शांति,शांति। इन दो निशानों के बीच हम दुख-सुख  का माप-तौल करते हैं,हँसते हैं और रोते हैं। असंख्य कामनाएं कर, उनकी पूर्ति-आपूर्ति  पर प्रसन्नता और शोक प्रकट करते हैं। यही जीवम की सीमा है,यही जीवन का

क्रम है।
संबंध बनाए जाते हैं,और फिर संबंध से अधिकार पैदा होता है,पर कभी-कभी संबंध कब और कैसे बना-यह समझाना कठिन हो जाता है। परिस्थितियाँ अपने-

आप ही यूं करवटें बदलती हैं कि,गहरा से गहरा  संबंध भी पलभर में टूटकर बिखर जाता है। इसके विपरीत अनायास ही संबंध जुड़कर भी मुखरित हो उठता है कि,एक का दु:ख दूसरे का दु:ख और एक का सुख दूसरे का सुख कहने में तनिक भी दुविधा या हिचक का आभास नहीं होता।

जिंदगी के अज्ञात क्षणों में मनुष्य कभी-कभी चलते-चलते ऐसे चौराहे पर पहुंच जाता है,जहां से आगे का रास्ता कठिन ही नहीं,बल्कि असंभव-सा जान पड़ता है। वह पीछे मुड़कर देखता है,तो अतीत के सम्बन्धों से इतनी दूरी बढ़ गई होती है कि,पीछे लौटना संभव नहीं होता है। वह अंधेरी रात के समान भयानक लगने वाले समय तथा घने जंगल के समान सांय-सांय करने वाले अनजान स्थान के सीने पर अकेला खड़ा-खड़ा यह सोचने लगता है कि क्या  करूं,कहां और किधर जाऊं ?,पर कहीं से कोई आवाज नहीं आती,कोई सुझाव नहीं देता-कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ता है,और मनुष्य फिर अपने मष्तिष्क पर ज़ोर देकर स्वयं से बिलखकर पूछता है-क्या करना चाहिए ?
अनिश्चित मार्ग पर चलते समय केवल विवेक का सहारा होता है। इंसान यदि साधारणतया स्वाभाविक तौर पर हो जाने वाली गलतियों का ध्यान न  रखे,तो
संभवत  उसे अत्यधिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ सकता है। जब दिशा अंजान हो तो  ऐसा लगता है कि,मैं अज्ञात सागर में बढ़ता जा रहा हूं,और फिर जब लक्ष्य  दुर्लभ हो जाए,या ऐसा हो जिसमें कई मानव जीवन सिमटे पड़े हों,तो उत्सुकता और अनिश्चित फल के कारण ह्रदय की गति अस्वाभाविक हो उठती है। फिर भयमिश्रित शंका रह-रहकर तनहा इन्सान को दबोच लेती है।

लाख यतन करने पर भी जीवन कभी-कभी अनायास ही कष्टदायक बन जाता है और अंततः मनुष्य बुद्धिहीन हो यह सोचने लगता है,कि आखिर मैंने  ऐसी  कौन- सी गलती की कि,जिसका परिणाम मुझे यह मिला। हर पल ह्रदय में दूसरों के लिए प्यार एवं सहानाभूति रखने पर भी  विधाता कभी-कभी कदम-कदम पर ठोंकरों का अनुभव देता है,जबकि  परोपकारी और दयालु ह्रदय के लिए संसार एंव प्रकृति अपनी आंखें बिछाती आई है।
मनुष्य के उत्थान या पतन में,विकास या हास में, ऊपर उठने या गिरने में जो महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है,वह है-चौथा व्यक्ति। अर्जुन  परम भाग्यशाली थे कि,उनको चौथे विश्वस्त व्यक्ति भगवान कृष्ण मिले। उनकी अनंत कृपा  से उनके सहचर्य और पथ  प्रदर्शन  से उन्हें विजय मिली।
महारथी कर्ण के साथी थे-शल्य,जो कदम-कदम पर उसे निराश कर उसका तेजों भंग  करते रहे। कर्ण के पतन का  यही कारण था। इतिहास साक्षी है,जिन
महापुरूषों को अपने जीवन में कृष्ण जैसे साथी  मिले चाहे उनका नाम चाणक्य हो,चाहे समर्थ रामदास हो, वे ही अपनी शक्तियों को विकसित कर पाए हैं।
प्रयास अनवरत प्रयास…यही ज़िंदगी है,इसी में ज़िंदगी का लक्ष्य निहित है।
इच्छा की उत्पत्ति और प्रयास का प्रारंभ दोनों बहुधा साथ-साथ होता है। प्रयास फलीभूत हुआ और इच्छा की पूर्ति हुई कि प्रयास की गति में अवरोध आया। यही है जीवन जिसमें मनुष्य निशि-दिन भटक रहा है। इच्छाओं का जाल कितना विस्मृत है,जिसमें मनुष्य सब-कुछ भूला हुआ है। मस्तिक और  ह्रदय इच्छाओं की पूर्ति  में अनवरत रत है,फिर भी जीवन के अंत में कुछ इच्छाएं अपूर्ण रह ही जाती हैं। प्रयास के मार्ग पर चलते-चलते मनुष्य थककर पलभर के
लिए रूकता है और फिर चल पड़ता है-प्यासा-सा मंजिल की ओर। इस जीवन में विश्राम कहाँ,शांति कहाँ,संतोष कहाँ…? बस संघर्ष ही संघर्ष है-संघर्ष ही सत्य है,संघर्ष ही जीवन है,संघर्ष ही इच्छा है,संघर्ष ही
लक्ष है,संघर्ष ही आदि है,संघर्ष ही अंत है। इसी संघर्षमय जीवन में अक्सर वो शक्ति उसका मार्ग निर्देशन करती है,जिसे हम ‘भगवान’,`खुदा` या `भाग्य` के नाम से पुकारते हैं,पर वह अवसर कब आए,वह शक्तियां,भाग्य उसका हाथ कब थाम ले- इसमें गहरा मतभेद है।
साधारणतया जब मनुष्य थककर सोचने लगता है कि, वह आगे कुछ नहीं कर सकेगा,वह इस जीवन को  और आगे नहीं धकेल सकेगा और भगवान को अब सच्चे अर्थ में हम पर दया करनी चाहिए-तब हम देखते हैं कि,उस समय  `समय और भगवान` दोनों अंतरिक्ष में  खड़े तमाशा देखते रहते हैं। इंसान घबराकर आंसू  भरी आंखों से नीले अन्तरिक्ष की ओर देखता है,पर शून्य से दृष्टि टकराकर मूर्छित होकर स्वयं तक अपने-आप लौट आती है। फिर उसे भगवान या भाग्य के अस्तित्व पर शंका-सी होने लगती है। वह सोचता है-कहीं हमने उसको तो सब कुछ नहीं मान लिया,जो कुछ भी नहीं है,पर जीवन चलता है-मौन वातावरण में विचारों का तारतम्य चलता रहता है। जब कोई साथ नहीं होता,तो बीती  हुई अनुभूतियों  के आधार पर विचार लहराने लगते हैं। मनुष्य अनजाने में सोचने लगता है-कब क्या हुआ,क्यों हुआ,कैसे हुआ ? सुखद और दुखद घटनाओं और अनुभूतियों का जैसे प्रवाह फूट पड़ता है,और इंसान पलभर में विचारों के पंख पर उड़ता हुआ कहीं से कहीं पहुँच जाता है। यादें सजग हो उठती हैं,और मानव शरीर प्रभावित हो हंसने या रोने लगता है। इन ऊंचे-नीचे विचारों,शंकाओं,समस्याओं और प्रतिपल मिटती-बनती आशा-निराशा की लहरों के बीच से बहता हुआ समय के साथ धीरे-धीरे समीप आते हुए उस किनारे की ओर बढ़ता जाता है,जिसे हम मौत कहते हैं। इस प्रयासरत और संघर्षमय जीवन में माता-पिता हमारी नियती हैं। धाय अल्प काल्पनिक है,चौथा व्यक्ति हमारी तलाश है,हमारी रूचि है,हमारा

पुरूषार्थ है। आओ,करोड़ों की इस भीड़ में  हम किसी कृष्ण की तलाश करें,नहीं तो अपने भीतर किसी कृष्ण की आदर्श मूर्ति की सृजनता कर एकाकी गंतव्य पथ
पर सकारात्मकता से चल पड़ें,अभय मजबूत कदमों से।

#नसरीन अली ‘निधि’

परिचय : नसरीन अली लेखन में साहित्यिक उपनाम-निधि लिखती हैं। जन्मतिथि १० नवम्बर १९६९ और जन्म स्थान-कलकत्ता है। आपका वर्तमान निवास श्रीनगर (जम्मू और कश्मीर)स्थित हब्बा कदल है। निधि की शिक्षा बी.ए. ,डिप्लोमा रचनात्मक कला(पाक कला एवं कला कौशल) है। इनकी सम्प्रति देखें तो हिंदी कम्प्यूटर ऑपपरेटर एवं ध्वनि अभियंता (रेडियो कश्मीर-श्रीनगर) हैं। सामाजिक तौर पर सक्रियता से वादी’ज़ हिंदी शिक्षा समिति(श्रीनगर) बतौर अध्यक्ष संचालित करती हैं। साथ ही नसरीन क्लॉसेस(यूनिट,शासकीय पंजीकृत) भी चलाती हैं। लेखन आपका शौक है, इसलिए एक साहित्यिक पत्रिका की सहायक सम्पादक भी हैं। विशेष बात यह है कि,कश्मीर के अतिरिक्त भारत के विभिन्न अहिंदीतर प्रांतों में मातृभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्यरत हैं। नसरीन अली को आकाशावाणी एवं दूरदर्शन श्रीनगर से सफल हिंदी कवियित्री,उदघोषक तथा कार्यक्रम संचालक का सम्मान प्राप्त है। साथ ही अन्य संस्थानों ने भी आपको पाक कला एवं कला कौशल के लिए सम्मानित किया है। लेखन में संत कवयित्री ललद्यत साहित्य सम्मान,अपराजिता सम्मान,हिंदी सेवी सम्मान और हिन्दी प्रतिभा सम्मान भी हासिल हुआ है। आपकी नजर में लेखन का उद्धेश्य-हिन्दी साहित्य के प्रति लगाव,उसके प्रचार-प्रसार,उन्नति,विकास के प्रति हार्दिक रुचि है।

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Arpan Jain

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Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।