भारत की राजभाषा होने के नाते हिन्दी को संविधान की आठवीं अनुसूची से निकाल लिया जाए

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panchal

हिन्दी भारत के व्यापक क्षेत्र की भाषा है, जिसका स्थान एक क्षेत्रीय भाषा से ऊपर उठकर पूरा देश है। हिन्दी समस्त भारत में किसी न किसी रूप में बोली और समझी जाती है। जब भारत में दो विभिन्न प्रान्तों, समुदायों और भाषाओं के लोग आपस में अपनी बात करते हैं तो स्वभाविक ही है कि वे हिन्दी का ही सहारा लेते हैं। आप भारत के किसी भी नगर में जाएं, वहां आप हिन्दी में अपनी बात कह सकते हैं। सभी तीर्थों, मेलों और धर्म स्थलों पर परस्पर बोलचाल का माध्यम किसी न किसी न किसी रूप में हिन्दी ही होती है। इस प्रकार हिन्दी निश्चय ही, देश में परस्पर सम्पर्क और एकता की भाषा है। यह देश की सामासिक संस्कृति की भाषा है। इसी में देश की आत्मा निवास करती है। राष्ट्र की अस्मिता की पहचान भी इससे है। बहुत पहले 1782 में हैनरी काल ब्रुक ने कहा था – ‘जिस भाषा का व्यवहार भारत के प्रत्येक प्रांत के लोग करते हैं, जो पढ़े-लिखे तथा अनपढ़ दोनों की साधारण बोलचाल की भाषा है और जिसे प्रत्येक गांव में थोड़े बहुत पढ़े – लिखे लोग समझते हैं, उसी का नाम हिन्दी है।’

नरमदेश्वर चतुर्वेदी ने अपने ग्रन्थ ‘हिन्दी का भविष्य’ में हिन्दी की व्याख्या करते हुए ठीक ही लिखा है- ‘हिन्दी वास्तव में किसी एक ही भाषा अथवा बोली का नाम नहीं है, अपितु एक सामाजिक भाषा परम्परा की संज्ञा है, जिसका आकार-प्रकार विभिन्न उपभाषाओं और बोलियों के ताने-बाने द्वारा निर्मित हुआ है।’

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारत के अग्रिम नेताओं ने विशेष रूप से,महात्मा गांधी ने ‘राष्ट्रभाषा’ के रूप में इसकी पहचान की और इसे अपने आन्दोलन का अंग बनाया। इस प्रकार हिन्दी एक क्षेत्रीय भाषा के रूप में सीमित न होकर समस्त राष्ट्र के परस्पर संवाद की भाषा है। भारत के संविधान के अनुछेद 351 में भी हिन्दी को भारतीय भाषाओँ के शब्दों से समृद्ध कर इसे भारत की सामासिक संस्कृति की प्रतिनिधि भाषा के रूप में विकसित करने का निर्देश इस बात का प्रमाण है कि हिन्दी भारत की प्रतिनिधि भाषा के रूप में अपना कार्य करेगी| संविधान के अनुच्छेद 343 में हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, जबकि अंग्रेजी की स्थिति अस्थायी है, जिसका स्थान कालांतर में हिन्दी को लेना है।  संविधान की आठवीं अनुसूची में भारत की प्रमुख भाषाओं को भी शामिल किया गया है।  संविधान के लागू होने के समय इसकी संख्या 14 थी, जो अब बढ़कर 22 हो गई है। आगे भी इन्हें बढ़ाए जाने की मांग की जा रही है। कहना न होगा कि स्वतंत्रता संग्राम के समय राष्ट्रीय एकता की जो प्रबल भावना देशवासियों में विद्यमान थी, वह आजादी के पश्चात धीरे-धीरे कम होती चली गई, और क्षेत्रीय आकांक्षाएं और राजनीतिक स्वार्थ पनपने लगे। फलस्वरूप एकता के स्थान पर पृथकता की भावना बलवती होती गई। इसका प्रभाव भाषा पर भी पड़ा है। हिन्दी जो देश की एकता की प्रतीक है, उसकी उपभाषाओं और बोलियों को भी हिन्दी से पृथक कर आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने की आवाज उठने लगी है। हिन्दी अपने एक हजार वर्ष के इतिहास में जिन विविध भाषा रूपों के मेल-जोल से एक मानक भाषा के रूप में विकसित हुई थी, उसमें बिखराव आरंभ हो गया है।

हिन्दी के सामने इसके बिखराव की समस्या आज के संकुचित राजनीतिक स्वार्थों के कारण उत्पन्न हो रही है। मैथिली को पहले ही 8वीं अनुसूची में शामिल कर लिया गया है| अब भोजपुरी तथा राजस्थानी को शामिल किए जाने के लिए आवाजें उठ रही है। साहित्य अकादमी ने तो राजस्थानी को अपनी भाषाओं की सूची में पहले ही शामिल कर लिया है,जबकि राजस्थानी नाम की कोई एक मानक भाषा है ही नहीं। बिहार में उमेश राय ने मैथिली और भोजपुरी के साथ-साथ बिहार की बज्जिका,अंगिका और मघई को भी संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की है। आश्चर्य की बात तो यह है, कि अब ब्रजभाषा को भी हिन्दी से अलग 8वीं अनुसूची में रखने की बात की जाने लगी है । केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने हाल ही में लोक सभा में कहा है, कि न  सिर्फ गढ़वाली या कुमा़ऊॅनी को ही संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए बल्कि अन्य भाषाओं पर भी विचार किया जाएगा जिनको लेकर मांगें उठती रही हैं।

यदि उत्तरप्रदेश के विभाजन की मांग, जैसी कि कुछ लोग कर रहे हैं स्वीकार कर ली जाती है तो वहां अवधी, बुंदेली, भोजपुरी को भी संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग का उठना स्वभाविक है। छत्तीसगढ़ी के लिए भी ऐसी ही मांग की जा रही है। आज जो मांग इन बोलियों के लिए हो रही है, यह कहना कठिन नहीं कि कल ऐसी ही मांग कन्नौजी, ब्रज, पहाड़ी, गढ़वाली, कुमा़ऊॅनी, ब्रज तथा हरियाणवी के लिए भी होगी। अब आप ही सोचिए कि हिन्दी किस क्षेत्र की भाषा रह जाएगी? यह तो इन सभी उपभाषाओं तथा बोलियों का एक समष्टि रूप है। भारत की जनगणना 2001 के अनुसार हिन्दी के अन्तर्गत 49 भाषा-बोलियां आती हैं। ऐसी मांगों से तो हिन्दी का समस्त साहित्य ही खंडित होकर रह जाएगा। हिन्दी में न विद्यापति रहेगा न सूर, न तुलसी, ना जायसी, न मीरा और न चन्द्रबरदायी ही बच पाएगा। हिन्दी का विभाजन गिलक्राईस्ट के प्रयत्नों से ब्रिटिश काल में पहले ही हिन्दी और उर्दू के रूप में हो गया था। अब क्षेत्र के नाम पर भी उसके विभाजन का खतरा मंडराता नजर आ रहा है।

मैं बोलियों के विरूद्ध बिल्कुल नहीं हूं। बोलियों में ही भारतीय संस्कृति की जड़ें हैं। इन्हें लुप्त होने से बचाया जाए। हिन्दी की बोलियों का विकास अवश्य होना चाहिए किन्तु भाषा के विघटन के रूप में न होकर भाषा के सम्वर्द्धन के रूप में होना चाहिए।

संविधान की 8वीं अनुसूची में हिन्दी की उपभाषाओं और बोलियों को शामिल करने का पहला परिणाम यह होगा कि, जनगणना के समय इन भाषाओं को बोलने वालों की गणना हिन्दी से अलग हो जाएगी, और हिन्दी बोलने वालों की संख्या घटती चल जाएगी। आज जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में हिन्दी बोलने वालों का स्थान दूसरा है। यूनेस्को के प्रतिनिधि अशर डिलियन ने भी इसकी पुष्टि की है। यदि श्री नौटियाल की मानें तो यह स्थान पहला हो जाता है। इसी आधार पर हम संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकार करने की मांग कर रहे हैं किन्तु यदि हम हिन्दी के कद को इसी प्रकार छोटा करने में लगे रहे, तो जरा सोचिए हम किस मुंह से हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने का दावा कर सकेंगे।

इन बोलियों को 8वीं अनुसूची में शामिल किए जाने का दूसरा परिणाम यह होगा कि संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में भी इन बोलियों को माध्यम बनाने की अनुमति मिल जाएगी। जितनी अधिक भाषाएं परीक्षा का माध्यम होंगी उतनी ही अधिक समस्या आयोग के सामने उपस्थित होगी। 50-60 भाषाओं को आयोग की परीक्षाओं का माध्यम बनाने से ऐसी भाषाओं के छोटे क्षेत्रों के परीक्षकों को ही उतर-पुस्तिकाएं जांचने का काम दिया जाएगा, जो उच्चस्तर पर अखिल भारतीय मानदण्ड को स्थापित कर भी पाएंगे, इसमें संदेह है। फलस्वरूप अखिल भारतीय सेवाओं में प्रतिभावान लोक सेवक नहीं आ पाएंगे और प्रशासन का स्तर गिर जाएगा।

मेरा व्यक्तिगत सुझाव है कि भारत की राजभाषा और देश की राष्ट्रभाषा होने के  नाते, हिन्दी को 8वीं अनुसूची से निकाल लिया जाए और उसे सही अर्थों में भारत की राजभाषा के रूप में विकसित होने का अवसर दिया जाए। जहां तक संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के माध्यम का प्रश्न है, फिलहाल हिन्दी और अंग्रेजी के अतिरिक्त, देश की उन क्षेत्रीय भाषओं को परीक्षा का माध्यम बनाया जाए, जो प्रशासनिक स्तर पर किसी राज्य की राजभाषा के रूप में व्यवहार में आ रही हैं और भारत की अन्य भाषाओं को 8वीं अनुसूची में शामिल कर लोगों की भावनाओं का समुचित सम्मान किया जाए।

                                                                           #डा० परमानन्द पांचाल

 

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संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।