कविता- मैं हूँ कविता

यूं ही नहीं लिख जाती,
फिर कोई कविता।।

बार-बार पढ़ना पड़ता है,
अतीत के पन्नों को,
और बार-बार पकड़ना पड़ता है,
वर्तमान की परछाइयों को,
यादों के झरोखे,
बारी-बारी से बंद और खोले जाते हैं,
तब कहीं रचती है एक नई कविता।।

कभी गोते लगाना पड़ते हैं,
कल्पनाओं के समुन्दर में,
और कभी जूझना पड़ता है,
भविष्य की आहटों से,
कभी डूबकर कभी तैरकर,
पार निकलना होता है,
तब कहीं रचती है,
एक नई कविता।।

भूत भविष्य वर्तमान,
तीनों का संगम होता है,
हर शब्द-शब्द का जोड़ होता है,
इन सब का मिलन होता है,
तब कहीं रचती है,

एक नई कविता।।

यूं ही नहीं लिख जाती,
फिर कोई कविता।।

#साधना छिरोल्या
दमोह (मध्यप्रदेश)

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