लघुकथा- अम्मा

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सबके चेहरों पर चिंता के बादल मंडरा रहे हैं। अम्मा की तबीयत है कि सुधरने की बजाय और बिगड़ती ही जा रही है।कैसी कुम्हला गयीं हैं अम्मा।अब उनका दुख देखा नहीं जाता उनकी कराह से मन दुखी हो रहा है।
“अम्मा! अम्मा!” गुलमोहर की डाल पर बैठी चींचीं ने पुकारा ।
“बोलो बिटिया क्या बात है?”दर्द से कराहते हुए अम्मा बोली।
“अम्मा समझ में नहीं आ रहा कि क्या करें कि तुम्हारी तबीयत ठीक हो जाये। सरिता जिज्जी की भी हालत ठीक नहीं है।”
“क्या हुआ सरिता को ?”
“सूख कर लकीर बन गयीं हैं जिज्जी।”
“अम्मा हैं तो हम भी बहुत परेशान। हमारे पास तो रहने के लिए घर नहीं, जैसे -तैसे अपना घर बना भी लिया तो वह टूट गया।”
“हाँ अम्मा! चारों ओर त्राहि-त्राहि मची हुई है।हर सुबह नये दिन के लिए ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ और
आने वाले कल मैं रहूँगा या नहीं मैं नहीं जानता।”
गुलमोहर के स्वर में वेदना झलक पड़ी।
“क्या करें बच्चों! अपना जाया ही ऐसा निकल जाये तो क्या किया जा सकता है।कपूत कहीं का।अपने सुवारथ में ऐसा डूबा है कि और कुछ इसे दिखाई नहीं देता।देखो अपनी माँ से ही इसने मुँह मोड़ लिया है।”हताशा और निराशा के साथ अम्मा एक आह भरते हुए बोलीं।
“यह कैसी आवाजें हैं?”चींचीं ज़रा देखो तो।
चींचीं गुलमोहर की पुंगी पर जा बैठी और गर्दन नचा-नचा कर यहां-वहां देखने लगी।
“अरे अम्मा ये तो स्कूली बच्चे हैं। हाथों में तख्तियां लिए नारे लगा रहे हैं।”चींचीं दूर देखते हुए बोली।
“सुनो वो पास आ गये हैं। ध्यान से सुनते हैं वो क्या कह रहे हैं।कहीं और कोई संकट तो नहीं मंडरा रहा हमारे सिर।”अम्मा का क्लांत चेहरा कुछ खिंच सा गया।
“धरती हमारी माता है इसको हमें बचाना हैं।वृक्ष हम लगाएँगे अपनी माता को संवारेंगे…”
बच्चे समवेत स्वर में बोलते हुए आगे बढ़ रहे थे।
बच्चों की आवाज़ सुन अम्मा का चेहरे पर एक सुकून छा गया।
“मेरे बच्चों! हाँ मैं तुम्हारी माँ हूँ। इसीलिए तुम्हारी चिंता में घुली जा रही हूँ।मत भूलना मैं हूँ तो तुम हो बच्चों।हम सब हैं।”अम्मा ने अपने कमज़ोर हाथ उठा आशीष देते हुए बोलीं।

यशोधरा भटनागर,

देवास, मध्यप्रदेश

matruadmin

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