पहाड़ की यात्रा से हिंदी प्रेम तक।

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बात 2007 मार्च महीने की है। मैं उस वक्त स्नातक प्रथम वर्ष का छात्र था। मेरी नौकरी उत्तर प्रदेश, के जनपद बलरामपुर में लगी। पहाड़ी पृष्ठभूमि का होने के कारण भोलेपन को खुद मानो पहाड़ों ने ही मुझे सिखा दिया हो।उम्र महज 18 वर्ष प्राइमरी स्कूल में, शिक्षा ग्रहण करते समय ही अध्यापक व अध्यापिका खुद पहाड़ी (मंडयाली) भाषा में बातचीत करते थे। हमें भी कक्षा के सभी विद्यार्थियों में आपसी बातचीत करते समय मंडयाली भाषा में ही बात करने की आदत सी हो गई थी।
अध्यापन कार्य मंडयाली भाषा में और पठन-पाठन का सारा कार्य हिंदी भाषा में ही होता था। लेकिन बोलचाल में मंडयाली भाषा प्रयोग की जाती थी। हिंदी भाषा में बात करने में मुझे असहजता महसूस होती थी। नई नौकरी के लिए 12 मार्च 2007 को हमें जिला मंडी से बस के माध्यम से अंबाला रेलवे स्टेशन तक पहुंचना था।पहाड़ से निकलकर मैं अन्य राज्य में पहली बार जाने व रेल कैसी होती है। यह जानकर,मन ही मन प्रफुल्लित और रोमांचित हो रहा था। मेरे रिश्तेदारी में लगते भाई को मेरे परिवार बालों ने रेल की यात्रा द्वारा गंतव्य स्थान तक छोड़ने की जिम्मेदारी सौंपी थी।
बस से यात्रा प्रारंभ होकर अंबाला रेलवे स्टेशन के पास खत्म हुई ।रेलवे स्टेशन में प्रवेश के साथ प्रथम बार रेल और पटरी को नजदीक देखकर मैं बहुत ही रोमांचित हुआ। कुली सिर पर भारी भरकम सामान रेल के डिब्बों में चढ़ा रहे थे। मैं यह सब स्टेशन पर अपनी रेल पहुंचने के इंतजार तक देखता रहा। समय कब गुजर गया पता ही नहीं चला। मुझे छोड़ने जा रहे भाई जी ने बताया कि रेल आ गई है।मैं रेल में प्रथम बार बैठा और यादों में कहीं खो सा गया कि, जैसे पहाड़ों में आड़ी तिरछी सड़कों में बस यात्रा करने से अच्छे अच्छों का मन चकरा जाता है ।बस जब मोड काटती है तो कई यात्रियों को उल्टी की शिकायत हो जाती है। मैंने भी सोचा कि कहीं रेल में मुझे भी इस तरह महसूस न हो ।मैं यात्रियों की आपसी बातचीत सुन रहा था। बगल वाली सीट में बैठे एक यात्री ने कहा कि यह बोगी यात्रियों की भीड़ से बहुत ज्यादा भरी रहती थी। लेकिन आज इतने यात्री नहीं है। मैं बोगी शब्द पहली बार सुन रहा था। और हिंदी भाषा में रेल को लौह पथ गामिनी कहते हुए सुनकर बड़ा ही आश्चर्य हो रहा था। हिंदी भाषा में इस तरह के शब्द सुनने को मिलेंगे मैं बहुत ही हैरान था। जैसे हम गोंडा रेलवे स्टेशन पर पहुंचे वहां उतरने के बाद हमें नहाने धोने के लिए बाथरूम जाना था। अपने सामान को जमा करवाने हम स्टेशन मास्टर के पास पूछने के लिए गए। उन्होंने सामान को माल गोदाम में जमा करने के लिए बताया। तीसरा नया हिंदी शब्द माल गोदाम भी सीखने को मिला इस तरह शाम तक हम बलरामपुर जिला में पहुंचे।वहां बहुत से राज्यों के लड़के नौकरी को उपस्थित हुए थे ।

उन सब लड़कों में अधिकतर उत्तर प्रदेश राज्य, बिहार,और मध्य प्रदेश, से थे। उन्हें आपस में शुद्ध हिंदी में बातचीत करते समय देखता और बड़ी ही उत्सुकता के साथ उन्हें सुनता भी था।
जब उन्होंने मुझसे परिचय किया तो मैं हिंदी में ज़बाब देते समय बहुत सोच विचार करने के पश्चात ही बोल पाता था। बहुत दिनों तक अपनी मंडयाली भाषा की लय उन हिंदी शब्दों से निकलती थी। तभी मैंने ठान लिया था।कि हिंदी को मुझे अपने मन में बसाना है। मैं उन हिंदी भाषी लड़कों के मध्य बैठकर बातचीत किया करता था। धीरे-धीरे मैंने हिंदी में धाराप्रवाह बोलना शुरू कर दिया इस प्रकार एक साल के नौकरी के प्रशिक्षण उपरांत मैंने हिंदी की दो अखबार नियमित पढ़ना शुरू कर दी। मैं अखबार के भीतर संपादकीय पढ़ना ज्यादा पसंद किया करता था। इन अखबारों से ही शुद्ध हिंदी शब्दों को सीखकर मैंने उन्हें अपने मन ,विचार में आत्मसात किया। धीरे धीरे मैंने हिंदी भाषा में इतनी अधिक पकड़ मजबूत बना ली कि मुझे खुद सुखद अनुभूति होती थी जब कोई पूछता कि आप तो हिमाचल से नहीं हो आप तो लगते हैं बिहार या उत्तर प्रदेश से हो। वे सब मुझ पर व्यंग्य करते हुए मुझे बिहारी जी कहने लगे थे।
मुझे हिंदी में तुमको, आप, मैं,को हम बोलने में अच्छा महसूस होता। इस तरह से मैं आज कम से कम हर रोज दो अखबार और पत्रिकाएं पढ़ता हूं ।हिंदी के प्रति लगाव से मुझे एक अच्छे संचार कौशल की प्राप्ति हुई।

ठाकुर तारा
हिमाचल प्रदेश

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।