कहो पर सुनो मत

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लिखे वो लेखक
पढ़े वो पाठक।
जो पढ़े मंच से
वो होता है कवि।
जो सुनता वो
श्रोता होता है।
यही व्यवस्था है
हमारे भारत की।
लिखने वाला कुछ भी
लिख देता है।
पढ़ने वाला कुछ भी
पढ़ लेता है।
और कुछ का कुछ
अर्थ लगा लेता है।
पर सवाल जवाब का
मौका किसे मिलता है?
यही हालात आजकल
हमारे महान देश का है।
न कोई सुनता है
न कोई कुछ कहता है।
अपनी अपनी ढपली
हर कोई बजता रहता है।
और अपनी धुन में
वो मस्त रहता है।
इसलिए अब हिंदुस्तान में
संवाद खत्म हो गया है।
और भारत को विश्वस्तर पर पीछे कर दिया है।
जिसका सबसे ज्यादा असर,
हिंदी साहित्य पर पड़ा है।
और भारत की संस्कृति
व इतिहास लुप्त हो रहा है।
मंदिर मस्जिद गुरूद्वरा तक भी
अब धर्म नही बचा है।
और इंसानियत का मानो
जनाजा निकल चुका है।।

जय जिनेन्द्रा देव की
संजय जैन (मुम्बई)

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Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।