पानी में बताशा तैर गया

युगों के बैरी मित्र हुए,
न सगों का मन से बैर गया।
यहाँ उथले में ही डूब गए,
वहाँ पानी में बताशा तैर गया।।
युगों के बैरी मित्र हुए……
मेरा दीपक जले रात भर,
और का जलते बुझ जाए।
छलनी जिसमें छेद बहत्तर,
गैर के अवगुण बतलाए।।
खोट हैं जिनकी नीयत में,
यहाँ उन्हीं का परचम फहर गया,
यहाँ उथले में ही…..।
अपनी पीड़ा हर कोई जाने,
और का दर्द दिखावा है।
अपनी खुली तो लगे छुपाने,
गैर का झूठ छलावा है।।
खुशी गैर की हजम हुई न,
विध्वंस का खाका तैर गया…
यहाँ उथले में ही…….।
सपने रोज सजाने वाले,
खुशफहमी में रहते हैं।
रोज कमाने खाने वाले,
सदा मौज में रहते हैं।।
लेते हैं वो जब अंगड़ाई,
तो लगे जमाना ठहर गया…
यहाँ उथले में ही…….।
आपस की तकरार छोड़कर,
निर्माणों में लग जाएं।
श्रेष्ठजनों को साथ जोड़कर,
अभियानों में रम जाएं।।
विष नहीं विषग्रंथि निकालें,
तब समझें पूरा जहर गया…
फिर नहीं कहेंगे…..
यहाँ उथले में ही डूब गए,
वहाँ पानी में बताशा तैर गया।।।।
———#आर.पी.सारंग

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