चाय-पान

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मातु शारदे दीजिए, यही एक वरदान
दोहों पर मेरे करे, जग सारा अभिमान

मातु शारदे को सुमिर, दोहे रचूँ अनंत
जीवन मे साहित्य का.छाया रहे बसंत

सरस्वती से हो गया ,तब से रिश्ता खास
बुरे वक्त में जब घिरा,लक्ष्मी रही न पास

आई है ऋतु प्रेम की,आया है ऋतुराज
बन बैठी है नायिका ,सजधज कुदरत आज

जिसको देखो कर रहा, हरियाली का अंत
आँखें अपनी मूँद कर,रोये आज बसंत

पुरवाई सँग झूमती,शाखें कर शृंगार
लेती है अँगडाइयाँ ,ज्यों अलबेली नार

सर्दी-गर्मी मिल गए , बदल गया परिवेश
शीतल मंद सुगंध से, महके सभी ‘रमेश’

ज्यों पतझड़ के बाद ही,आता सदा बसंत
त्यों कष्टों के बाद ही,खुशियां मिलें अनंत

हुआ नहाना ओस में ,तेरा जब जब रात
कोहरे में लिपटी मिली,तब तब सर्द प्रभात

कन्याओं का भ्रूण में,कर देते हैं अंत
उस घर में आता नही, जल्दी कभी बसंत

बने शहर के शहर जब, कर जंगल काअंत
खिड़की में आये नजर, हमको आज बसंत

खिलने से पहले जहाँ , किया कली का अंत
वहां कली हर पेड़ की, रोये देख बसंत

फसलें दुल्हन बन गई,मन पुलकित उल्लास
आशा की लेकर किरण,आया है मधुमास

पिया गये परदेश है,आया है मधुमास
दिल की दिल मे रह गये,मेरे सब अहसास

#रमेश शर्मा , मुम्बई

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29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।