इस ज़मी पे इक मैं हीं क्यूँ हूँ इतनी तन्हा.सी प्यार के हसी मंज़र से मुझे भी मिलाया होता चलते रहे बेसुध जानी अंजानी राहों पर हम ठहर जाते गर मंजिलें पता मैंने भी पाया होता निगाहें हटती नहीं फ़लक की ओर जो उठी .. काश ख़ुदा ने मेरे हक़ […]
काव्यभाषा
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