मेरे पिता

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अंदर ही अंदर घुटता है।
पर ख्यासे पूरा करता है।
दिखता ऊपर से कठोर।
पर दिलसे नरम होता है।
ऐसा एक पिता होता है।।

कितना वो संघर्ष है करता।
पर उफ किसीसे नहीं करता।
लड़ता है खुद जंग हमेशा।
पर शामिल किसीको नहीं करता।
जीत पर सबको खुश करता है।
हार किसी से शेयर न करता।
ये एक पिता ही कर सकता।।

खुद रहे दुखी पर,
घरवालों को खुश रखता है।
छोटी बड़ी हर ख्यासे,
घरवालों की पूरी करता है।
फिर भी बीबी बच्चो की,
सदैव बाते वो सुनता है।
कभी रुठ जाते मां बाप,
तो कभी पत्नी रूठ जाती है।
इसलिए दोनों के बीच में,
बिना वजह वो पिसता है।
इतना सहन शील इंसान,
एक पिता ही हो सकता है।।

समझ न सके उसे कोई।
इसलिए वो अंदर ही अंदर।
स्नेह प्यार को तरसता है।
पर पिता को ये सब,
अब कहाँ पर मिलता है।।

जय जिनेन्द्र देव की
संजय जैन (मुम्बई)

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।