हिंदी अखबारों की भ्रष्ट भाषा

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आजकल मैं मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के कई शहरों और गांवों में घूम रहा हूं। जहां भी रहता हूं,सारे अखबार मंगवाता हूं। मराठी के अखबारों में बहुत कम ऐसे हैं, जो अपनी भाषा में अंग्रेजी का प्रयोग धड़ल्ले से करते हों। उनके वाक्यों में कहीं-कहीं अंग्रेजी के शब्द आते जरुर हैं लेकिन वे ऐसे शब्द हैं,जो या तो अत्यंत लोकप्रिय हो गए हैं या फिर उनका अनुवाद करना ही कठिन है लेकिन हिंदी के बड़े-बड़े अखबार(जो कृपा करके मेरे लेख भी छापते हैं)को पढ़ते हुए मैं हैरत में पड़ जाता हूं। उनकी कई खबरों में ऐसे वाक्य ढूंढना मुश्किल हो जाता है,जो आसानी से समझ में आ जाएं। इनमें अंग्रेजी के ऐसे शब्द चिपका दिए जाते हैं, जिनका अर्थ समझना ही आम पाठकों के लिए मुश्किल होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि मेज पर बैठे पत्रकार अपनी भाषा को भ्रष्ट करने पर उतारु हैं। उनकी चाहत भी यही है कि सरल भाषा लिखी जाए लेकिन वे जल्दबाजी में उलटा काम कर बैठते हैं। कौन शब्दकोश देखे,कौन किसी वरिष्ठ से पूछे,कौन आपस में चर्चा करे। इसके अलावा अखबारों के सम्पादकों और मालिकों की ओर से भी कोई आपत्ति नहीं होती। अखबार बिक रहा है,इसी से वे संतुष्ट हैं। इन्हीं अखबारों के सम्पादकीयों और लेखों में सरल और शुद्ध हिंदी देखकर मेरा मन प्रसन्न हो जाता है। यदि ये लोग थोड़ा ध्यान दे दें तो हमारे हिंदी के अखबार काफी बेहतर हो सकते हैं। उनका प्रभाव भी बढ़ेगा और पाठक-संख्या भी। मैं पोंगापंथी शुद्धतावादी बिल्कुल नहीं हूं। हिंदी में हम अन्य देशी और विदेशी भाषाओं के जितने भी शब्द हजम कर सकें,जरुर करना चाहिए लेकिन हमारे अखबारों और टीवी चैनल तो अंग्रेजी शब्दों की बदहजमी से परेशान है। मैंने अब से पचास साल पहले जब अफगान विदेश नीति पर अपनी पीएच.डी. का शोधग्रंथ हिंदी में लिखा था तब कई जर्मन, फ्रांसीसी,फारसी और रुसी शब्दों का हिंदीकरण कर दिया था। इसी प्रकार नवभारत टाइम्स और ‘पीटीआई-भाषा’ का सम्पादक रहते हुए मैंने असंख्य देशी और विदेशी भाषाओं के शब्दों का हिंदीकरण किया,जिसे सैकड़ों हिंदी अखबारों ने सहर्ष अपनाया। अंग्रेजी के भ्रष्ट उच्चारणों से कई देशी और विदेशी नामों को पहली बार मुक्ति मिली। हिंदी पत्रकारिता का रुप ही बदल गया। हिंदी संस्कृत की बेटी है और उर्दू समेत सभी भारतीय भाषाओं की बहन है। उसके शब्द-सामर्थ्य का क्या कहना ? उसके सामने बेचारी अटपटे व्याकरण और ऊटपटांग उच्चारण वाली अंग्रेजी कैसे टिक सकती है ? संस्कृत की एक धातु में हजारों नए शब्द बनते हैं और उसकी धातुएं २००० हैं। पत्रकार भाई लोग अपनी इस छिपी हुई ताकत को समझें और थोड़ी मेहनत करें तो हिंदी को भ्रष्ट होने से बचा सकते हैं।
                                    #डॉ. वेदप्रताप वैदिक
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।