priyanka shah 1
संगीत में रुचि तो बचपन से ही रही थी पर तब ज्यादा उसकी महत्व पता नही था। माँ को पुराने फिल्मी गाने बजाने का शौक था और हम भी उसमें रुचिवान होते गये।
संगीत का प्रभु भक्ति के साथ भी संबंध है यह सब माँ ने बालक थे हम तभी से सिखाया था। पर साक्षात्कार तब हुआ जब मेरी संगीत में रुचि देखकर और मधुर आवाज को ध्यान में लेते हुए माँ ने मुझे संगीत क्लास में भर्ती कराया था। तब मैं बड़ी हो चुकी थी यह करीब मेरे सातवी क्लास के वेकेशन की बात है। वो क्लास सबसे अलग था, वहाँ दिखने में कोई खास प्रभाव नहीं था एक छोटा सा कमरे में एक थोड़े वृद्ध दादा सिखा रहे थे, पर उनका ज्ञान शास्त्रीय संगीत का बहुत अनोखा था। आज के भौतिक सुखों और दिखावट के जमाने कम लोगो को ही ये सुहाये। मुझे खुशी है कि मेरी माँ ने उनके ज्ञान को देखा बाहरी दिखावे को नहीं। और इसी वजह से बहुत कम विद्यार्थी ही आते थे वहाँ सीखने के लिए, सबको कहाँ शास्त्रीय संगीत भाये! जो पुराने समय मे राजा महाराजाओं के दरबार में बजते थे वैसे राग वो दादा सिखाते थे। इन दौरान कई संगीत के चमत्कारों को देखे साथ महसूस किये। और यह में दृढ़ता से कह सकती हूँ संगीत स्वस्थ्य के लिए अनोखी हीलिंग है।  मेरी शुरुआत तो भोपाली राग से हुई थी जो आगे बढ़ते हुऐ करीब 10 से 12 राग को सीख कर दुर्भाग्यवश छूट गयी थी। जब भी सिर दर्द हो मध्याह्न में राग मधुमालती गाने या सुनने से उसमे राहत मिलती है। सुबह के राग अलग, शाम के अलग रात्रि के अलग है और उस काल में उनको गाने या सुनने से कई बीमारियों से मुक्ति मिलती हुई देखी।
*राग मल्हार को बारिश का राग कहते है। वो सही तरीके से कोई संगीत वाद्यों के साथ गा ले, तो किसी भी मौसम में बारिश आयेगी ही। राग शिवरंजनी , राग मालकौंस, राग कलावती, राग भैरवी, राग यमन, राग काफी, जैसे कई राग वो दादा गुरु से सुनने तथा सीखने मिले थे।* इनमे यमन राग बहुत पसंद है मुझे। फिर क्या मुंबई शिफ्ट होना हुआ। वो कक्षाएँ छोड़ना पड़ा और यहाँ मुंबई जैसी नगरी में भी वो तरीके से शिखाने वाले कोई कक्षाएँ नहीं है।
आज के रॉक स्टार अगर शास्त्रीय संगीत के महत्त्व को और उसके आंनद को महसूस करले तो आज भी संगीत के माध्यम से अनेक लोग लाभान्वित हो सकते है। कैंसर जैसी बीमारी पर संगीत का प्रभाव है तो छोटी मोटी बीमारी सरलता से दूर हो उसमे कोई दो राय नहीं। *आज के मन पसंद फिल्मी गानों से बेशक मुझे खुशी मिलती है पर शांति और सुकुन तो सिर्फ शास्त्रीय संगीत से ही मिल पाता है।*
तभी आज भी मेरा मन वो गुरु को कई बार नमन और धन्यवाद कहता है साथ मेरी आँखें मुंबई  जैसी नगरी में उनके जैसे शिक्षक ढूंढती है।
                                          # प्रियंका शाह

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