harivallabh
हम तरफदार थे रिफ़ाक़त के।
वो मआनी हुए रकाबत के।
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दर्से तहजीब क्या पढ़ायें हम,
वो परस्तार खुद लियाक़त के।
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खुद ही शहतीर कूदकर आते,
औहदेदां हैं जो क़यादत के।
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छल-फरेबों का बोलबाला है,
अब ज़माने कहाँ सदाक़त के।
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जिनसे उम्मीद थी शराफत की,
बीज बोते दिखे बगाबत के।
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सरहदें लाँघती हिमाकत अब,
कैसे रिश्ते चलें लताफ़त के।
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मोजज़ा हो, बची रहे दुनियाँ,
हाल तारी तो हैं कयामत के।
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है नहीं ख़्याल कुछ रियाया का,
दिन करीबी दिखें निज़ामत के।
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सरपरस्ती में एक मालिक ‘हरि’,
रास्ते हैं जुदा इबादत के।
                                   #हरिवल्लभ शर्मा ‘हरि’
परिचय:
नाम- हरिवल्लभ शर्मा
माता- स्व. श्रीमति मथुरादेवी शर्मा
पिता- स्व. श्री अवधलाल शर्मा 
पत्नि- श्रीमति सीमा शर्मा
जन्मतिथि- 07.06.1953
जन्म स्थान- टीकमगढ़ (म.प्र.)
शिक्षा- स्नातकोत्तर (वनस्पति शास्त्र), स्नातकोत्तर डिप्लोमा- क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस।
कार्यक्षेत्र- सेवा निवृत्त अधिकारी म.प्र. पुलिस। स्वतन्त्र रचनाकार I
लेखन विधाएं- छान्दस काव्य, गीत, गजलें, मुक्तक, मुक्त छन्द, आलेख, एवं समीक्षा।

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