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भारतीय संस्कृति सदैव सहिष्णुता के साथ सदभावना/
समरसता/दया ,प्रेम के मार्ग का अनुसरण करते हुए प्रकृति और जीव जन्तुओं सभी को संरक्षण प्रदान करती है । सूर्य ,चन्द्र ,जल ,वायु  ,पृथ्वी ,पशु ,पक्षी ,वन सम्पदा, वृक्ष सभी को देवतुल्य मानकर श्रद्धा से सब का सम्मान करती है ।या इस प्रकार कहे कि हिन्दू सस्कृति संस्कारों में मानव का स्थान सबके बाद आता है ।
गऊ, गंगा , गीता ,हमारी हिन्दू संस्कृति के पोषक है।कोई भी मंगल कार्य के लिये गाय के गोवर का लेपन , गंगाजल के पश्चात ही शुद्धता का प्रतीक है।यहां तक की दूव घास तक शुभ कार्य में महत्व पूर्ण है। पैरों के नीचे आने बाली दूव घास भी शुभकार्यों  मे पूजनीय है ।
दान , ध्यान ,यज्ञ मनकी शान्ति ,परिवार,समाज और
राष्ट् के कल्याण की भावना के लिये किया जाता है । होम यज्ञ की आहूतियों से वायुमंडल  शुद्ध होता है । शास्त्रों में
जन कल्याण के लिये हवन यज्ञ को अति महत्व पूर्ण बताया गया है “।अतिथि देवो भव ” हमारी संस्कृति सदभावना/समरसता/का भाव प्रसारित करता है।दीन हीन की सेवा /दान पुण्य से आत्मिक सुख शान्ति और संतोष प्राप्त होता है।हमें अपनी अर्जित आय का कुछ अंश दीन दुखियों में दान के रूप में अवश्य त्याग करना चाहिये। ऐसा शास्त्रों में कहा गया है ।
प्रश्न महत्वपूर्ण है स्वर्ग क्या है ?क्या स्वर्ग किसी ने देखा है? क्या इस नश्वर संसार में भौतिक सुखों की सम्पन्नता अथवा भोगविलास को ही स्वर्गिक आनन्द कहा जाता है? क्या अर्थ से सभी सुखों को अर्जित किया जा सकता है ? कदापि नही यदि ऐसा सम्भव होता तो संसार के सभी धनाड्य सम्पन्नता के साथ साथ सुखी जीवन व्यतीत करते । परन्तु ऐसा सम्भव नही है ।अर्थ के विस्तार से भौतिक सुख सुविथाओं विलासता में तो वृद्धि हो सकती है । परन्तु मानसिक सुख प्राप्त नही किया जा सकता । मानसिक सुख तो सदाचरण,सदभाव,समरता,
सादगी,संयम ,शिष्टाचार  ,प्रेम ,जनभलाई ,परोपकार से ही प्राप्त हो सकता है ।तो स्वर्ग क्या है?जब आप स्वेच्छा ,श्रद्धा  ,निष्ठा हृदयभाव से बिना किसी प्रतिफल की कामना के प्रसन्नता से परोपकार का कार्य करते है ।उससे जो आप को आत्मसंतोष ,सुख की अनुभूति होती है वही स्वर्ग है ।
नरक क्या है?जब आपका कुत्सित,निकृष्ट चिंतन स्वार्थमय होकर अहंकारी हो जाता है और निर्बल दुर्बल
पर अत्याचार करने के लिये निरंकुश हो बीभत्सता के साथ उसका दमन करता है । स्वार्थवश किया गया एक
ऐसा पाप जो स्वंय का चित्त भी आत्मग्लानि से भर देता है और अन्तरमुखी होकर जीवनभर आत्मग्लानी में जीता है। कभी स्वंय भी सुख चैन से नही रह पाता नरक ही तो है ।
स्वर्ग/नर्क किसी ने नही देखा। परन्तु कर्मो के आधार पर
मानव लोक में नैतिक आचरण का अनुसरण करने पर जो सुख संतोष की अनुभूति होती है वही स्वर्ग है ।इसके विपरीत दुष्कर्मों के कारण चित्त का सदैव असहज रहना ही नर्क है।

         #हरप्रसाद पुष्पक

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