abhijat
उस रात में किसी के घर की बगिया में रात की रानी की कलि खिलने वाली थी , रात का पहला पहर था श्वेत चांदनी मानो यशराज फिल्म्स के हीरोइन के दुप्पटे की तरह बगिया पर लहलहा रही थी । धीमी धीमी हवा कलि की एक एक कर पंखुड़ियाँ खोलने में मानो उसकी मदद कर रही थी । बगिया के बाकि पौधों पर इतनी रौनक नहीं थी ऐसा लग रहा था जैसे दिन भर की मेहनत के बाद सब सुस्ता रहे हों , लेकिन रात की रानी का सौंदर्य देखते ही बनता था । और इस बात को वो किशोरवय कलि जो फूल बनने ही वाली थी शायद जानती थी और इसी लिए इठलाती सी हवा की लहरों के साथ नाचती हुई सी प्रतीत हो रही थी ।
उसी बगिया वाले घर में 12वीं के पेपर ख़त्म होने के बाद चैन से अपने हाथों में फोन पकड़े निष्ठा न ही तो पूरी बैठी थी ना ही सोई थी बस अपने में ही मगन अपनी ही भावनाओं में बहती किसी से चैटिंग करती जा रही थी और मंद – मंद मुस्कुरा रही थी ।
यहाँ प्रश्न ये उठता है कि वो ‘किसी’ कौन है जिससे चैटिंग करती हुई निष्ठा इतनी खो चुकी है कि उसे ये ध्यान ही ना रहा कि उसके कमरे की खिड़की जो बगिया में खुलती है , से मच्छर आ कर उसे जगह जगह काट रहे हैं या शायद ध्यान में हो भी पर वो इस ‘किसी’ को रिप्लाई के लिए थोड़ा सा भी इंतज़ार नहीं करवाना चाहती इसलिए खिड़की बंद करने को उसने जरूरी नहीं समझा ।
समय बीतता गया , रात का दूसरा पहर – कलि एक सुन्दर श्वेत पुष्प में परिवर्तित हो चुकी थी । श्वेत पुष्प चांदनी की आभा पा कर मनमोहक आसमानी छटा धारण किये उतनी ही बेख़ुदी में हवाओं की ताल पर नाच रहा था और नाचे भी क्यों ना ? नाचना तो बनता है …. उस हवा के लिए जो इस बेचारे पुष्प के अकेलेपन का एकमात्र साथी था इस खूबसूरत रात में । इसलिए इतना करना तो बनता ही है हवा को उसकी अहमियत का एहसास करवाने के लिए । तो बस उस अकेलेपन के साथी को पुष्प इसलिए ही अपना नृत्य दिखा कर खुश कर रहा था कि कल फिर रात होगी और कहीं उसे अकेला ना रहना पड़े उस लंबी रात को क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो वो सारे विचार जो दिन भर उसके मन में आएंगे वो किसके साथ साझा करेगा फिर ? ये हमारी रात की रानी का पुष्प ! ये अकेलेपन से बहुत घबराता है इसलिए कोई भी जो इस से थोड़ा भी अपनत्व दिखाए ये अपनी खुशियां उसी पर आश्रित छोड़ देता है । उधर बगिया के पास वाली खिड़की से जो दृश्य दिखाई देता है है और जो आवाजें आती है वे हैं – निष्ठा ने चैटिंग बन्द कर दी है लेकिन बातें बन्द नहीं हुई है है । अब ‘किसी’ ने उसे कॉल कर लिया है । निष्ठा तकिया गोद में लेकर पालथी लगा कर बेड पर बैठी है और बोल रही है –
अब ?
अब कैसे बाबू ?
ना….
समझा करो ।
प्लीज़…
प्लीज़ प्लीज़ प्लीज़
नहीं ना
देखो ये बिलकुल सेफ नहीं है ।
मान भी जाओ
नहीं
ना
नो
अरे रुको रुको रुको
सुनो तो एक मिनट सुन तो लो….
अच्छा ऐसा करो आ जाओ 5 मिनट ।
हाँ !
कॉल कर लेना घर के बाहर ही ,
नहीं चुप चाप अंदर आ जाना ।
हां
ठीक
गार्डन वाली विंडो मेरे रूम की है ।
हां
ऊँची नहीं है इतनी
हाँ आराम से आ जाओगे ।
अब तो नाराज़ नहीं हो ना ?
खाओ मेरी कसम ….
ओके
लव यू
वेटिंग फॉर यू
ह्म्म्म
बाय
तीसरा पहर । हवा तेज़ हो गयी है । अब पुष्प को अपनी ही धुरी पर नाचना कष्टदायक लग रहा है , पर हवा उग्र होती ही जा रही है । वो पुष्प की नहीं सुनती । वैसे ही चलती रहती है । पुष्प हिलता रहता है बिना किसी उत्साह के । उसने बोल कर मना नहीं किया और न ही कर सकता वो क्योंकि आने वाली रात कहीं अकेला ना रह जाए यही चिंता है उसके दिमाग में फिर भी उसके हाव – भाव से पता चलता है कि वह इस से आगे नहीं नाचना चाहता पर हवा शायद अंधी है , वो नहीं देखती । अब वो अपनी ही धुन में है । बगिया में पदचाप होते हैं , लगता है निष्ठा का ‘किसी’ आ गया है । हां वही है निष्ठा खिड़की में खड़ी उसका इंतज़ार कर रही थी । वो उसे खिड़की से चढ़ा कर अपने कमरे में लेती है । निष्ठा के ‘किसी’ को शायद निष्ठा की फ़िक्र है इसीलिए उसने अंदर जाते ही निष्ठा को मच्छरों से बचाने के लिए खिड़की बंद कर ली।
तीसरा पहर शुरू हुआ । हवा ने आंधी का रूप धारण कर लिया । पुष्प का नृत्य अब देखने वाले को नृत्य नहीं लग सकता था , कोई नहीं कह पाता कि ये वही नृत्य है जो थोड़ी देर पहले उसने अपनी मर्ज़ी से करना शुरू किया था । अब तो आंधी से उसकी 2 – 4 पंखुड़ियाँ भी गिर गयी थी । तभी खिड़की खुली ! निष्ठा का ‘किसी’ खिड़की से गार्डन में कूदा , तेज़ क़दमों से बाहर निकला बिना स्टार्ट किये अपनी बाइक को मोड़ तक ले गया और वहां से उसे स्टार्ट कर गायब हो गया और इसी के साथ ही चौथा पहर आरम्भ हो गया ।
अब हवा रुक गयी थी ।
सब शांत !
सन्नाटा !
उमस !
 पुष्प थका हारा अब स्थिर था । निष्ठा का ‘किसी’ जल्दी में निष्ठा के कमरे की खिड़की बंद करना भूल गया बाहर निकलते वक़्त । शायद कोई जरूरी काम ही आ गया था तब ही ऐसा हुआ वरना फ़िक्र तो करता ही था वो निष्ठा की … चांदनी खिड़की में से पुनः निष्ठा के कमरे का दृश्य दिखा रही थी । वो भी सो गयी थी । आखिरकार सब सो चुके थे पर चाँद जो अब तक अकेला ये सब देख रहा था और जिसने मुझे ये सब बताया वो फिर भी कुछ देर और जागा । सुबह होने को थी । पूर्व में लालिमा देख कर निश्चिन्त हो कर कि आगे ये देख-भाल वाली ड्यूटी सूरज संभाल लेगा ; चाँद सोने चला गया ।
सूरज आया । उसकी पहली कुछ किरणें एक साथ ही पुष्प और निष्ठा पर पड़ी । लेकिन ये क्या ??
ना ही पुष्प में और ना ही निष्ठा में वो सौंदर्य वो श्वेत आभा वो स्वभाविक चंचलता वो आसमानी छटा कुछ भी नहीं था । चाँद अगर ये देख पाता तो अवश्य ही उसे बहुत ही आश्चर्य और दुःख होता । पुष्प की पंखुड़ियों पर जंग के से निशान से थे मतलब वो मुरझा रहा था । अब पुष्प को ग्लानि महसूस हो रही थी कि अगली रात अकेला ना रहे इसलिए उसने इतना सब बिना किसी शर्त के किया हवा के लिए परन्तु वो तो अगली रात देख ही नहीं पायेगा , फिर क्यों ? वो रुकना चाहता था आने वाली रात तक नयी कलियों को बताना चाहता था कि हवा की बातों में ना आये  , उसके लिए कुछ ना करे , वो दुष्ट है । परंतु ये हो ना सका । निष्ठा का  कुछ पता नहीं लग पाया क्योंकि धूप के कारण उसने खिड़की बन्द कर ली थी तो उसे ग्लानि थी या नहीं कोई जान नहीं पाया , हो भी सकती है ; शायद इसी लिए वो धूप का सामना नहीं कर पायी थी ।
अच्छा है चाँद सो गया था वरना जिसने ऐसे सौंदर्य को बनते देखा था उसे उजड़ते देखता तो दोबारा वहां आने से ही मना कर देता । आखिर कौन इस तरह पतन का प्रत्यक्षदर्शी होना चाहेगा बताइये ?
परिचय :
नाम – अभिजात चौधरी
जन्मतिथि – 29/03/1991
लूणकरणसर , जिला बीकानेर
राजस्थान
शिक्षा – B.A. B.ed.
विधा – कहानी

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