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नई दिल्ली |

न्यायपालिका के कार्यों में हिन्दी के प्रयोग का चलन शुरू करने की मांग एक बार फिर से उठने लगी है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि हमें हिन्दी को अपनी अदालतों में लाना चाहिए. उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में हिन्दी में कार्यवाही होना हर देशवासी के लिए गौरव की बात होगी. शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के सचिव और भारतीय भाषा अभियान के राष्ट्रीय संरक्षक अतुल कोठारी ने कहा कि भारत की भाषाओं में वे सभी क्षमताएं हैंजो न्यायिक क्षेत्र की किसी भी भाषा में होनी चाहिए. भारत की भाषाओं को न्यायालय  में कामकाज की भाषा बनाने से जुड़ी तकनीकी एवं व्यवहारिक बाधाओं के समाधान भी खोजे जा सकते हैं.

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की ओर से दिल्ली में आयोजित तीन दिवसीय ज्ञानोत्सव में महान्यायवादीपूर्व न्यायाधीश और उच्च न्यायालय  और उच्चतम न्यायालय  के वकीलों समेत विधि क्षेत्र के कई विशेषज्ञ शामिल हुए. इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत और केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा भी शामिल हुए. तीन दिन में पांच राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की उपस्थिति ईश्वर की कृपा एवं कार्यकर्ताओं के परिश्रम से संपन्न हुआ.

अतुल कोठारी ने कहा कि देश की बहुसंख्य आबादी अपनी भाषा में संवाद करती है. इसके बावजूद न्यायालयों की भाषा आज भी अंग्रेजी बनी हुई है. न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता के लिए यह जरूरी है कि लोगों को उनकी भाषा में न्याय मिले. अपनी भाषा में न्यायिक प्रक्रिया चलेगी तो पारदर्शिता अधिक होगी और लोग न्यायालय के निर्णयों को बेहतर ढंग से समझ एवं आत्मसात कर पाएंगे. 

उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य है कि आजादी के करीब आठ दशक बीत जाने के बावजूद देश के उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में हिंदी में कार्यवाही नहीं होती है. अतुल कोठारी ने कहा कि भारतीय भाषा अभियान की यह मांग है कि जिला सत्र न्यायालयों में लोगों को अपनी भाषा में न्याय मिलना चाहिए. इसके साथ ही उच्च न्यायालय में भी अंग्रेजी के साथ-साथ राज्य के लोगों की भाषा में न्याय मिलने की व्यवस्था होनी चाहिए.

संविधान के अनुच्छेद 348 के खंड (1) के उपखंड (क) के तहत उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही अंग्रेजी भाषा में किए जाने का प्रावधान है. हालांकिइसी अनुच्छेद के खंड (2) के तहत किसी राज्य का राज्यपाल उस राज्य के उच्च न्यायालय में हिंदी भाषा या उस राज्य की राजभाषा का प्रयोग राष्ट्रपति की अनुमति से प्राधिकृत कर सकता है.

कोठारी ने बताया कि उत्तर प्रदेशबिहारराजस्थान और मध्य प्रदेश समेत देश के चार राज्यों के उच्च न्यायालयों को हिंदी में कामकाज के लिए प्राधिकृत किया गया है. जबकिअन्य न्यायालयों में सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी में ही की जाती हैं. हालांकिमातृभाषा का कोई विकल्प नहीं हो सकता और यह एक वैज्ञानिक सत्य है. इसके बावजूद अपनी भाषा में न्याय पाने का अधिकार अभी तक लोगों को नहीं मिला है.

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