shivanand chobe

बटे माँ बाप भी अब तो यहाँ दिन और महीने में
कभी जो एक ही आँचल में माँ सबको सुलाती थी
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सुबह और शाम की भी बट गयी है रोटियां नकहत
कभी जो रहके खुद भूखे माँ बच्चो को खिलाती थी
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तड़प उठती थी माँ बच्चो को गर तकलीफ होता था
हमारी वास्ते खुशियों के वो दर्दे छुपाती थी
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कई राते वो जागे जैसे हो बाते कुछ लम्हो की

छुपाके खुद के दर्दो को हमे हंसना सिखाती थी
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कभी सोचा नहीं क्या ख्वाइशे मेरी भी अपनी है
हमेशा वास्ते बच्चो के वो सपने सजाती थी
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सलामत गर रहे आँचल जो माँ का तो ही खुशिया है
शिवम् हंसकरके माँ अपनी सभी दर्दे छुपाती थी !

           #शिवानन्द चौबे

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