हिंदी के कुँवर, कुँवर नारायण !

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हिंदी के कुँवर, कुँवर नारायण !

Kunwar_Narayan

“हवा और दरवाज़ों में बहस होती रही,
दीवारें सुनती रहीं।
धूप चुपचाप एक कुरसी पर बैठी
किरणों के ऊन का स्वेटर बुनती रही।

सहसा किसी बात पर बिगड़ कर
हवा ने दरवाज़े को तड़ से
एक थप्पड़ जड़ दिया !”

शीर्षक ‘कमरे में धूप’ की इन पंक्तियों को जब पहली बार पढ़ा, तब नई कविता की बिंबात्मक क्षमता से चमत्कृत हुआ था।

19 सितंबर, 1927 को फैजाबाद में जन्मे हिंदी के कुँवर, कुँवर नारायण जी की इस कविता का मुझपर प्रभाव यह था कि जैसे नशेड़ी अपना नशा ढूंढता है, मैं इनकी दूसरी कविता ढूंढ रहा था।

फिर, हिंदी के किसी भी दूसरे विद्यार्थी की तरह ‘कोई दूसरा नहीं’ खरीद लाया जिसके लिए उन्हें 1995 में साहित्य अकादमी मिल चुका था। इसके बाद कुँवर नारायण का काव्य संसार मेरे सामने खुलता चला गया ।

बाद में जब इनकी बहुचर्चित कविता दीवारें पढ़ी तो ये पंक्तियाँ मेरे साथ हो लीं :

“अब मैं एक छोटे-से घर
और बहुत बड़ी दुनिया में रहता हूँ

कभी मैं एक बहुत बड़े घर
और छोटी-सी दुनिया में रहता था

कम दीवारों से
बड़ा फ़र्क पड़ता है”

बाद में मैंने भी एक कविता ‘दीवार’ लिखी -सर्वथा अलग संदर्भ में, लेकिन शीर्षक दिया ‘दीवार’ ! जब यह एक बड़ी साहित्यिक पत्रिका में यह प्रकाशित हुई तो मुझे लगा मैं दीवार को मनोवैज्ञानिक धरातल पर ले जाने में सफल रहा हूँ ।
तो, कविता की समझ रखने वाले पर कुँवर नारायण की कविताओं का प्रभाव न पड़े, ऐसा संभव ही नहीं है।

कुँवर नारायण का काव्य संसार बड़ा विपुल है। 15, नवंबर 2017 को लखनऊ में निधन से पूर्व वे साहित्य में इतनी थाती छोड़ गए हैं कि हिंदी के पाठक तीसरा सप्तक के इस कवि को सदा पढ़ते-गुणते रहेंगे !

नई कविता आंदोलन के इस सशक्त हस्ताक्षर ने दशकों माँ शारदा की सेवा की । अपनी कविताओं में मिथक, इतिहास, परंपरा और आधुनिकता का जैसा समन्वयन इन्होंने किया, वह अन्यत्र दुर्लभ है।

देखा जाए तो जिस बौद्धिक सघनता के साथ कुँवर नारायण ने प्रतिशोध को साधा वह आज के कलमकारों के लिए प्रकाश स्तंभ सदृश है। वे पूरब के थे और पश्चिम के भी।

अगर इनके विशाल साहित्यिक खजाने से मुझे नए साहित्यकारों के लिए कुछ चुनने कहा जाए तो वे हैं: इन दिनों, चक्रव्यूह, आज और आज से पहले , मेरे साक्षात्कार, आत्मजयी और कोई दूसरा नहीं ।

इनकी कविताएं अपने मिज़ाज में प्रयोगधर्मी हैं, उदाहरण के लिए- ‘सृजन के क्षण’, ‘कविता क्या है’, ‘कविता की जरूरत’ और ‘प्यार की भाषाएं’।

2005 का ज्ञानपीठ और 2009 का पदम् भूषण पुरुस्कार इस महान क़लमकार के साहित्यिक अवदान को रेखांकित करता है।

अवतरण दिवस पर मातृभाषा उन्नयन संस्थान की तरफ़ से विनीत स्मरण !

कमलेश कमल,
(साहित्य संपादक)

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।