हिंदी साहित्य का इतिहास

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kumari pinki
*साहित्य*  :-
भारतीय साहित्य विश्व की प्राचीनतम साहित्य में से एक है। पहले साहित्य को गाकर सुनाया जाता था।
फिर धीरे-धीरे गायन से लिखित रूप में इस का उद्भव और विकास हुआ ।
साहित्य की प्रारंभिक कृतियां गीत एवं छंद के रूप में होती थी ।और यह धीरे-धीरे बदलता गया ।और साहित्य का शनै:शनै: विकास होता रहा।
*हिंदी* *साहित्य का इतिहास*
इतिहास दो शब्दों के योग से बना है।इति+हास जिसका अर्थ होता है ऐसा ही होता है। इतिहास लेखन की शुरुआत आधुनिक काल में 1900शताब्दी में हुई। घटनाक्रम के क्रमबद्ध अध्यन ही इतिहास है। लिपिबद्ध रूप का प्रारंभ  उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ।
जब संस्कृति का प्रारंभ हुआ है तभी से साहित्य अपने विविध रूपों कविता, कहानी गायन के अस्तित्व में आया। हिंदी साहित्य का आरंभ आठवीं शताब्दी से माना जाता है     ।
हिंदी साहित्य का प्रारंभ मध्यकालीन इतिहास में अवधी और ब्रज भाषाओं धार्मिक और दार्शनिक काव्य रचनाओं से सुसज्जित हुआ। मध्यकाल के सुप्रसिद्ध कवियों में तुलसीदास जी और कबीरदास जी प्रमुख थे। आधुनिक युग में खड़ी बोली अधिक लोकप्रिय है।
संस्कृत में भी साहित्य रचनाएं रची गई हैं।
*प्रभाव*     :-साहित्य का देश और समाज पर व्यापक रूप से प्रभाव पड़ता है। साहित्य के आधार पर देश बनते और बिगड़ते हैं। जहां सामयिक अवस्थाओं का आलंबन होता है। सामंजस्य रीति के अनुकूलन सुरक्षित रहता है। *साहित्य*पुष्पित- पल्लवित*और उन्नत* होता है।
*साहित्य का अर्थ*  आमतौर पर किसी भाषा के वाचिक और लिखित स्वरूप को साहित्य कहते हैं। विश्व में सबसे पुराना वाचिक साहित्य आदिवासी साहित्य है। *आदिवासी साहित्य सभी साहित्यों का मूल स्रोत हैं*।  :-       सबसे पुराना जीवित साहित्य ऋग्वेद है। ऋग्वेद संस्कृत में लिखित है।
भारतीय साहित्य आजादी के पूर्व सन् 1947से पहले भारतीय उपमहाद्वीप के रूप में उल्लेखित है। और तत्पश्चात् भारतीय गणराज्य में उल्लेखनीय वाचिक और लिखित साहित्य के नाम से विख्यात  है।
व्याकरण के दृष्टि से साहित्य व्यापक शब्द है   भारत में लगभग 30सेभीज्यादा मुख्य भाषाएं हैं और 💯 क्षेत्रीय भाषाएं हैं। भारत की भाषाओं का परिवार अलग-अलग है। लेकिन साहित्यिक आधारभूमि एक ही है।
जैसे प्रत्येक ग्रंथ के ओट में उसके रचयिता का और प्रत्येक राष्ट्रीय साहित्य के ओट में उसको उत्पन्न करने वाली जातियों की व्यक्तित्व निहित रहता है।
उसी तरह साहित्य के ओट में उस काल की व्यक्तिमूलक और अव्- क्तिमूलक शक्तियां निहित होती है।
*साहित्य की उत्पत्ति*।     :-     *साहित्य व्यापक शब्द है। *सर्वोत्तम विचार की उत्तामोत्ताम लिपिबद्ध अभिव्यक्ति व विभिन्न व्यक्तिगत प्रकृति ही साहित्य है।
*सहित शब्दों से साहित्य की उत्पत्ति हुई है।                        साहित्य का शाब्दिक अर्थ है:-सबका कल्याण।
स:हित: जिसका अर्थ है ऐसी युक्ति, ऐसा नियोजन, ऐसा माध्यम, एसी संप्रेरणा जिससे वर्ग,जाति, धर्म, समाज, समूह, संप्रेरणा, संप्रदाय देश सहित विश्व के कल्याण की भावना संन्निहित हो।
मिलन का भाव साहित्य *संन्निहित है*:-
*भाव के साथ भाव का*मिलन *भाषा के साथ भाषा का*मिलन *एकता के साथ-अखंडता का  ग्रंथ मिलन ही साहित्य है।
मनुष्य के साथ मनुष्य का अतीत के साथ वर्तमान का दूर के साथ निकट का संबंध ही साहित्य है।
भारत अनेकता में एकता का देश है।
सा*
हितस्य भाव:साहित्यम। संस्कृत में लिखित है जिसमें सहित भाव निहित है साहित्य है।
अनेक तरह के भाषाओं के अनेक धर्मों, विचार धाराओं और जीवन प्रणालियों के रहते हुए भारतीय संस्कृति की एकता असंदिग्ध और अमिट है।इसी प्रकार अनेक भाषाओं और अभिव्यंजनाओं    साहित्य एक है।
भाषा के माध्यम से अपने अंतरंग की अनुभूति, अभिव्यक्ति करने वाली ललित कला काव्य संग्रह या कृति साहित्य        कहलाती है।
साहित्य की परिभाषा:-अरस्तु के अनुसार:-साहित्य जीवन और जगत का कलात्मक और भावात्मक पुनः सृजन है।
आचार्य श्यामसुंदर दास जी के अनुसार:-काव्य वह है जो ह्रदय में आलौकिक आंनद या चमत्कारी अनुभूति की सृष्टि अन्नतह: में उत्पन्न करें।
साहित्य कहते हैं।
**साहित्य के विषेषताएं**:-।
★साहित्य विचार धाराओं, विचार परंपराओं और विचारशीलता की  अटुट *शिला*स्वरूप है।
★साहित्य वो धारणा है जो धारणी में सजीव जीवन का आधार है।
★साहित्य वह प्रतिभा है जो आलौकिक दिव्यमान है। अलौकिकता प्रतिभासित रुप धारण कर पतियों  आगे उठाती है।
★जीवन का मकसद साहित्य  बताती है।
★साहित्य लोचन हीन को लोचन देती है।निरालंम्ब का अवलम्बन होती है।
★साहित्य कल्पनाओं की कामद कल्प लतिका है जो सुधा फल समान है ।रूचिर रूचि सहचरी धव्नि है ,जो देश को धव्नित कर साहित्य सम्बल और विभुतियों की जनक स्वरूप है।
★साहित्य सजीवता में निर्जीवता रूपी संजीवनी बूटी समान है।
★साहित्य ऐसी साधना है जो समस्त सिद्धियों का साधन है, चतुर्थवर्गीय जननी है, चेतना और चेतावनी की परिचारिका है।
★साहित्य ही वह कसौटी है जिसमें में किसी जाति विशेष के सभ्यता संस्कृति को सुरक्षित और संरक्षित किया जा सकता है।
*हिंदी साहित्य* सभ्यता ,संस्कृति और विरासत की घोतक है। हिंदी साहित्य जयवंतीब्दी” की ओर है। जब सम्राट् हर्ष की मृत्यु के बाद देश में अनेक छोटे-छोटे शासन केंद्र स्थापित हो गए थे जो परस्पर  आपस में संघर्षरत रहा करते थे। विदेशी मुसलमानों से भी इनकी टक्कर होती रहती थी।  शनै: शनै: साहित्य का विकास हो रहा था।
हिंदी साहित्य के विकास को  कर्मानुसार अध्यनसुविधा के लिये पाँच ऐतिहासिक चरणों में विभाजित किया गया है , जो क्रमवार निम्नलिखित हैं:-
★आदिकाल (1050ई.से1374 ईसवी  पहले)
★भक्तिकाल-( 1375-1700)
★रीति काल- (1700-1900)
★आधुनिक काल 1850 ईस्वी के पश्चात)
★नव्योत्तर काल (1980 ईस्वी के पश्चात)
आज तक।
★हिन्दी साहित्य आदिकाल को आलोचक(1400)ईसवी से पूर्व का काल मानते हैं। जब हिन्दी का उद्भव हो ही रहा था। हिन्दी अपनी विकास यात्रा के ओर कदम बढ़ा चुकी थी। हिन्दी की विकास-यात्रा दिल्ली, कन्नौज और अजमेर क्षेत्रों में शुरुआत हुई मानी जाती है। पृथ्वीराज चौहान का उस समय दिल्ली में शासन था ।और चंदबरदाई नामक उसका एक दरबारी कवि हुआ करता था। *चंदबरदाई की रचना ‘पृथ्वीराजरासो’ है,जिसमें उन्होंने अपने मित्र पृथ्वीराज की जीवन गाथा का वर्णन किया है।’पृथ्वीराज रासो’हिंदी साहित्य में सबसे बृहत् रचना मानी गई है।कन्नौज का अंतिम राठौड़ शासक जयचंद संस्कृत    के  विद्वान थे।    साहित्य का प्रारंभ हो गया था।
*साहित्यकार सर्व भूत हितेन रत: के आधार पर सृजन के आनंदोल्लास के साथ आनंदोत्सव में साहित्य रचता है।वसुधैव कुटुंबकम् की भावनाओं को संजोकर समस्त वसुधावासी हित साहित्य सृजित करता है। साहित्यकार कल्पनाशीलता, विश्वदृष्टि और अभिव्यक्तियों के माध्यम से संपूर्ण चराचर जगत हित सद्कामना कर रचना रचता है। मात्र पृथ्वी पर जीवन है। यदि अन्य ग्रहों पर जीवन का भनक तक लगें तो साहित्यकार प्रार्थना संशोधन कर संबोधन में ब्रांम्हांड कुटुंबकम् भावनाओं सहित रचना करने में लगेगा।
*साहित्य के प्रकार*:-हिंदी में तीन प्रकार के साहित्य का उल्लेख है:-★गघ,
★पघ और
★चम्पू का उल्लेख है।
हिंदी की पहली रजना देवकीनंदन खत्री का विश्वप्रसिद्ध उपन्यास चंद्रकांता है।
साहित्य शैलियों कि अनन्त राशि होती है। कविता,नाटक और गघ के रूप में विघालयों में पढ़ाई-लिखाई का माध्यम है।
*साहित्य की विधाएं*    :-
साधारणतया विधा को एकवर्ग कारक के रूप में किया जाता है।
विधाएं अस्पष्ट श्रेणियां हैं। रचनात्मक गुणधर्म के आधार पर किसलय,वर्ग और श्रेणी रूपांतरण विधा है। संस्कृत साहित्य आचार्यों ने समस्त साहित्य को क्रमशः
★दृश्य काव्य और
★श्रव्य काव्य दो भागों में विभाजित किया है।
दृश्य काव्य संग्रह में नाटक है जो:-रुपक और उपरुपक है। श्रव्य काव्य में गघ और पघ दो साहित्य के प्रकार हैं।
*प्रमुख साहित्यिक-सांस्कृतिक* विधाएं:-कविता , लघुकथा, कहानी, उपन्यास, एकांकी संग्रह,नाटक,प्रहसन ( काॅमेडी) *, निबंध, आलोचना,,रिपोतार्ज* , डायरी लेखन, जीवनी, अंतर्मन आत्म कथा, संस्मरणगल्प, व्यंग्य, रेखाचित्र, पुस्तक समीक्षा,पर्यालोचन, साक्षात्कार,।
*साहित्यिक**विभुतियां*:-
भारतीय प्रत्येक भाषाओं के साहित्य का अपना प्रखर एवं स्वतंत्र वैशिष्ट्य है।
विभिन्न विभूति:-तमिल-संगम साहित्य,
मलयालम:-काव्य एवं कीर-गीत,
गुजराती:-आख्यान और फागु,
बंगाल:-मंगल काव्य असमिया:-बड़गीत और बुरजी साहित्य,
पंजाबी:-रम्याख्यान और वीर गति,
उर्दू की ग़ज़ल,
हिंदी में रीतिकाव्य तथा छायावाद सभी साहित्य अपने आप में वैशिष्ट्य के उज्ज्वल भविष्य  प्रमाण है।*
*साहित्य रचनाएं*:-भारतीय साहित्य के इतिहास में साहित्यकार के अमर रचना के आधार पर साहित्य का स्वर्ण युग निर्माण हुआ।
महाकवि कालिदास के द्वारा मेघदूत, अभिज्ञान शाकुन्तल,
शुद्रक साहित्यकार की मृच्छकटिकम,
भास की स्वप्न वासवदत्ता और हर्ष द्वारा रचित रत्नावली है।
चाणक्य के द्वारा रचित अर्थशास्त्र और वात्स्यायन के कामसूत्र प्रमुख कृतियां हैं।     उत्तरी भारत में राम और कृष्ण के अनुयायियों द्वारा स्थानिय बोलियों में रचित साहित्य अति प्रसिद्ध कृतियों में से एक है। जयदेव जी की गीतगोविंद है।
मैथिली कवि विघापति के पदावली,अवह्ट,किर्तिलता प्रमुख रचनाएं हैं।
तुलसी दास जी ने रामचरितमानस की रचना की।
सूरदास जी के    भक्ति रचनाएं विश्व विख्यात हैं।                       सूरदास कृष्ण भक्ति की अजस्त्र धारा प्रवाहित करने वाले कवियों में से एक थे।वे कृष्ण के अन्नय उपासक और ब्रज भाषा के कवि थे।          सिक्खधर्म के गुरु नानकदेव जी और गुरू अर्जुन देव जी के रचनाएं विश्व प्रसिद्ध है। संस्कृत की सर्वाधिक प्रसिद्ध हिंदू कृतियां वेद, उपनिषद और मनुस्मृति है।
तमिल साहित्य विश्व  प्रसिद्ध है ।जो2000वर्ष पुराना है।               आधुनिक भारत साहित्य में विगत 150वर्षों   में अनेक साहित्यिक रचनाएं कई क्षेत्रीय भाषाओं और अंग्रेजी में रची गई है।
*राष्ट्रीय गीत एवं राष्ट्रीय गान इतिहास में दो* *अजर अमर साहित्यिक रचनाओं का संग्रह है।* *आज़ादी के पूर्व* *उत्साहवर्धक शक्ति का* *निर्माण इन कालजयी अमर साहित्यिक रचनाओं के* *माध्यम से होता था।*
*दुनिया के इतिहास में साहित्य देशों एवं राज्यों* की संस्कृति, परंपरा, राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि  को सदैव ही तत्परता से आधारभूत ढांचा  सभी क्षेत्रों में प्रदान करता रहा है।
*साहित्य के क्षेत्र में पुरस्कार*     :-   यूं तो साहित्य निर्माण के लिए कई प्रकार पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। वर्तमान समय में भारत गणराज्य में *दो मुख्य *साहित्यिक पुरस्कार का विवरण है*:-
★*साहित्य* *अकादमी पुरस्कार तथा
*★ज्ञानपीठ पुरस्कार*।
*गुरूदेव्रनाथ टैगोर के साहित्य रचना गीतांजलि के लिए* *नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।वे पहले भारतीय थे नोबेल पुरस्कार विजेता के रूप* में *पुरस्कार प्राप्त हुआ था।*
                                   *भारतीय संस्कृति एवं साहित्यिक क्षेत्रों में* *महिलाओं का अपूर्व योगदान रहा है*।
*अनेक वीर प्रतिभाशाली महिला हैं* *जिन्होंने साहित्य जगत में आशातीत कालजयी रचनाएं लिखी हैं।*
*महादेवी वर्मा सहित अनेक वीरांगनाओं ने काव्य संग्रह का* *इतिहास रचा है।
महिलाओं का योगदान* *भी कालजयी है साहित्य  इतिहास में*।
*अरूंधति रॉय को गाॅड आॅफ स्माल थिंग्स* *के *लिए बुकर पुरस्कार दिया गया*।
*झुम्पा लहरी को भी वर्ष 2000में पूलि त्झर पुरस्कार से सम्मानित* किया गया।
देश और* *समाज पर साहित्य का व्यापक प्रभाव पड़ता है। साहित्य के आधार पर* *ही बनते और बिगड़ते हैं। विकसित और उन्नति की ओर अग्रसर होते हैं। अवनति* *का कारण साहित्य ही होता है। सामयिक अवस्थाओं में अवलंम्बित होकर* *राष्ट्रीय हित पुष्पित, पल्लवित और उन्नयन की ओर आकृष्ट होती है।* *संस्कारों का निर्माण साहित्य के सानिध्य में होता है*।
*देश में कालानुसार परंपरा एवं संस्कृति की संरक्षण होती है। यदि* *किसी जाति विशेष के साहित्य में विलासितापूर्ण धारा चिर काल तक बहे तो* *कर्मशीलता के अभाव में विरागधारा प्रबलतर गति से बहेगी* *तो उस जातियों के साहित्य लोप होता रहेगा।*साहित्य और *सांस्कृतिक विरासत* *का संरक्षण* *आवश्यक* है।
*समूचे देश वासियों को* *दृढ़ संकल्पशक्ति के आधार पर संकल्पित* *होकर प्रतिज्ञा लेना होगा ताकि इतिहास को *साक्षी रखकर सभ्यता, संस्कृति और साहित्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सुरक्षित हस्तांतरित कर सकें*।
*फलस्वरूप भावी पीढ़ियों में प्रेरणा जागृत होगी जो उल्लेखनीय  जनहित कार्य होगा*।
*साहित्य विश्व एवं देशों की आंतरिक अंतर्मन के अंतःकरण की अनुभूति, मेंअनुपम अभिप्रेरित अद्भूत ज्ञान स्त्रोत भंडार है। *जिसे संजोकर रखने का समस्त वसुधावासी को    संकल्प लेना होगा*।
*वासुधैव कुटुंबकम् भावनाओं से ओत-प्रोत होकर विश्र्व *कल्याणकारी सपना पूरा करना होगा।
प्रमुख कालजयी साहित्यकारों, विश्व विख्यात कवि महान, साहित्य *महाप्राण,कालजई साहित्यकारों को शत् शत् कोटि  नमन*।
*जिनके कृपा पुंज से *साहित्य पुष्पित पल्लवित *होकर उन्नयन की ओर अग्रसर होता रहेगा।*
#कुमारी पिंकी
,दरभंगा बिहार 
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।