वुमन आवाज –2(समीक्षा)

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arati priydarshini
पुस्तक—– वुमन आवाज –2
संपादक —- शिखा जैन
समीक्षा — आरती प्रियदर्शिनी
 इंदौर के संस्मय प्रकाशन के अंतर्गत शिखा जैन के कुशल संपादन में प्रकाशित पुस्तक “वुमन आवाज-2” अनेकों महिलाओं की कृतियों से सुसज्जित एक बेहतरीन पुस्तक है। पुस्तक के हर पन्ने पर हिंदुस्तान की आधी आबादी का अक्स झलकता है। स्त्री का हर रूप ….माँ, पत्नी, प्रेमिका, बेटी, बहू ….सब की गाथा इस पुस्तक में स्पष्ट देखती हैं ।  अंजली वैद्य ने जहां नारी देह के निर्माण के लिए ईश्वर का आभार व्यक्त किया है वही डॉक्टर उपासना पांडेय और प्रतिभा श्रीवास्तव अंश में नारी को नव सृजन के दर्द से जीवन की परीक्षा मे जूझते हुए दर्शाया है। डॉ आरती कुमारी स्वयं से संवाद करते हुए नारी जाति को प्रकृति का दूसरा रूप कहती हैं, तो नवनीता कटाकवार भ्रूण हत्या पर शाब्दिक प्रहार करती हुई दिखी है। नारी की देशभक्ति एवं उसकी शारीरिक शक्ति की पराकाष्ठा डॉ अमृता शुक्ला तथा अनिता मंदिलवार के शब्दों में सशक्त रूप में दिखा है। मीरा विवेक जैन तथा शालिनी खेर ने स्त्री के मन में उफनते अथाह प्रेम सागर की कुछ बूंदों को अपनी लेखनी में भी भरा है शायद तभी तो उनकी कविताएं प्रेम रस से सराबोर हैं।
 “एक स्त्री मां के रूप में ईश्वर के समकक्ष हो जाती है” यह बात जयति जैन नूतन, अंजली खेर , निशा मेहता कमलीनी, माधुरी मिश्रा तथा कंचन पांडे भी अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रदर्शित कर रहीं हैं। सुमन चौधरी, सीमा गर्ग मंजरी तथा रश्मि लता मिश्रा ने नारी के पौराणिक रूप से लेकर आधुनिक रूपों में भी समाज द्वारा दी गई पीड़ा से ग्रसित उनकी मनोवृत्ति का चित्रण अपने भावुक शब्दों से कर के पाठकों को भी भावविह्वल कर दिया है।
 डॉक्टर रिचा त्रिपाठी आशा उपाध्याय तथा नेहा चाचरा ने नारी के फौलादी हौसले, प्रसव पीड़ा तथा महिलाओं के उपर दी जाने वाली अश्लील गालियों पर अपनी लेखनी चलाते हुए पुरुष प्रधान समाज पर तीखे वार करती हैं। कल्पना त्रिपाठी ने माहवारी जैसे टैबू विषय पर अपनी सूक्ष्म अनुभूति लिखी है। आरती प्रियदर्शिनी बेटी की विदाई जैसी सामाजिक रस्म को किसी वज्रपात से कम नहीं मानती हैं। पूनम झा, डॉक्टर मौसमी परिहार तथा तरुणा पुंडीर ने नारी के सशक्त रूप की व्याख्या मलाला, लक्ष्मी, मैरीकॉम ,कल्पना चावला का उदाहरण देते हुए किया है। डॉक्टर राज लक्ष्मी शिवहरे स्त्री की तुलना मातृभूमि से करती हैं। डॉ नीना छिब्बर, भावना शिवहरे तथा वर्षा अग्रवाल ने तो नारी के हर रूप को इंद्रधनुष बनाकर वुमन आवाज के कैनवास को सतरंगी बना दिया है। डॉ भारती शर्मा बौड़ाई आधी दुनिया को इंगित करते हुए कहती हैं–
” सारा आकाश तुम्हारा है, सारा आकाश हमारा है”
 मीनाक्षी सुकुमारन नारी को बार बार पुरुषों के लिए अपना अस्तित्व ना मिटाने की सलाह देती हैं, और सुकेशिनी दीक्षित कहती हैं कि–
” सृष्टि के सत्य में स्त्री का होना… पीड़ा को अपनी बस यूं ही ढाँप लेना..”
 डॉ अनीता राठौर मंजरी नारी के लिए सिर्फ कर्तव्य एवं अधिकार ही नहीं सम्मान की भी अपेक्षा रखती हैं। प्रीति दुबे ने वैदिक कालीन स्त्री शक्ति पर प्रकाश डाला है।  आरती तिवारी, स्नेह लता नीर एवं रागिनी स्वर्णकार ने नारी को सृजन एवं संहार की देवी के रूप में प्रस्तुत करते हुए उनके अवतारी रूप का सुंदर वर्णन लिखा है। किरण मिश्रा स्वयंसिद्धा, रजनी श्रीवास्तव तथा कविता वाणी भी कविताओं में भी नारी की व्यथा, निर्भया, अबला इत्यादि का मार्मिक चित्रण करती हैं। रमा प्रेम शांति, शकुंतला मित्तल तथा अर्चना कटारे ने नारी के सम्मान एवं स्वाभिमान के लिए अपनी आवाज को बुलंद किया है। जीवन के दोराहे पर खड़ी ,परिस्थितियों के मार सहती नारी का वर्णन करती हैं सीमा निगम और आकांक्षाओं के पंख पसारे नारी के स्वरूप का चित्र भारती जैन दिव्यांशी तथा नवनीता दूबे नूपुर करती है। उर्मिला मेहता तथा विनीता श्रीवास्तव ने नारी को वर्णित, पुष्पित, फलित एवं आर्या अदम्य, अखिला तथा आली की संज्ञा दी है। भावना दिक्षित हर स्त्री को अपनी रक्षा स्वयं करने का आह्वान करती हैं जबकि सुनीता श्रीवास्तव ने “कर्मभूमि का मर्म” कह कर हर स्त्री के मातृ रूप को नमन किया है।
 आस्था दीपाली कहती हैं –“स्त्री होती वसंत…” और डॉ नीना जोशी नारी को सम्मान दिलाने का संकल्प करती हैं । मनुस्मृति के एक बहुचर्चित श्लोक पर व्यंग्य करती कीर्ति प्रदीप वर्मा की कविता भी अद्भुत है। सुषमा श्रीवास्तव नारी को पुरुषों की जिज्ञासा लालसा एवं अभिलाषा मानती हैं तो नीता त्रिपाठी उसे कल्प वृक्ष की छाया कहती हैं राजकुमारी चौकसे की “बेटी” के बिना तो दुनिया अंधियारी है। कविताओं के अतिरिक्त अनामिका अनूप तिवारी, साधना छिरोल्या, अर्चना अनुप्रिया , सविता गुप्ता,  शुभ्रा झा तथा पूनम करतरियार ने अपने लघु कथाओं तथा छोटे-छोटे संस्मरण उसे इस पुस्तक की खूबसूरती में चार चांद लगा दिए हैं।
              वुमन आवाज संस्था एवं सन्मय प्रकाशन ने मिलकर डायरी के पन्नों में छुपे महिलाओं के सृजन को निखारा है तथा उसे दुनिया के सामने लाने का प्रयास किया है जो अत्यंत सराहनीय है। अंततः मैं तो यही कहना चाहूंगी कि….
” ना किस्सों में ना कहानी में ….
नारी की व्यथा तो हर खून की रवानी में…”
                       #आरती प्रियदर्शिनी
गोरखपुर(उत्तरप्रदेश)
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।