वाह मोदी जी… वाह! क्या खूब तमाशा किया…

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वाह मोदी जीवाह! क्या खूब तमाशा किया

जनता से मांगे 50 दिन और 20वें दिन ही काले कुबेरों की खोल दी लॉटरी

देश को लूटोऔर 50-50 प्रतिशत में भागीदार बन जाओ

 

-राजेश ज्वेल

(वरिष्ठ पत्रकार, 09827020830)

यह लेख स्वतंत्र लेखन श्रेणी का लेख है। इस लेख में प्रयुक्त सामग्री, जैसे कि तथ्य, आँकड़े, विचार, चित्र आदि का, संपूर्ण उत्तरदायित्व इस लेख के लेखक/लेखकों का है, मातृभाषा.कॉम का नहीं।

मोदीजी देश की जनता के साथ मैंने भी आपको सलाम ठोंका था… 8 नवम्बर को आपने देश की जनता को संबोधित करते हुए यह दृढ़ घोषणा की थी कि रात 12 बजे के बाद काले कुबेरों का कालाधन कागज यानि रद्दी हो जाएगा। आपने देश की ईमानदार जनता को कहा कि वे घबराएँ नहीं और अपना सफेद धन जो हजार और पांच सौ के नोट में है उसे 30 दिसम्बर तक बैंकों में जमा कर दें। आजाद भारत में नोटबंदी का यह अब तक का सबसे कठोर कदम आपने उठाया, जिसका जनता ने तमाम परेशानियों के बावजूद स्वागत ही किया और इस मामले में विपक्ष भी एक्सपोज हो गया। इसके अगले ही दिन गाजीपुर की सभा में आपने भावुक होते हुए नोटबंदी से परेशान हो रहे आम आदमी की पीड़ा को जाहिर करते हुए 50 दिन मांगे और उसके बाद एक साफ-सुथरा देश देने का वायदा भी किया, मगर ये अब आपने क्या किया और 20वें दिन ही काले कुबेरों की लॉटरी खोल डाली… जिस कालेधन को आपने कागज की रद्दी बताया और उसे नदियों में बहाने की बात भी चिल्ला-चिल्लाकर कही, उसी कालेधन में 50-50 प्रतिशत की भागीदारी कर ली। जब आपने आय घोषणा योजना में ही कालेधन वालों को मौका दे दिया था कि वे 45 प्रतिशत टैक्स जमा कर अपना चाहे जितना भी कालाधन हो उसे घोषित कर दें। 1 जून से शुरू हुई यह योजना 30 सितम्बर को समाप्त हो गई, जिसमें 65 हजार करोड़ का कालाधन उजागर हुआ। बावजूद इसके कई गुना अधिक कालाधन मौजूद रहा, जिसके चलते आपने नोटबंदी का ऐतिहासिक कदम उठाया और उसकी घोषणा में भी आपने स्पष्ट कहा कि पहले मौके दे दिए गए और उसमें भी काले कुबेर नहीं सुधरे तो अब उन्हें छोड़ूंगा नहीं और उनका पूरा कालाधन मिट्टी हो जाएगा और आजादी के बाद से जरूरत पड़ी तो खातों की जांच कराऊँगा, मगर आपने तो 20वें दिन में ही पलटी मार दी और मिट्टी हो रहे कालेधन को फिर सोना बना डाला।  20 दिनों से आम आदमी अपने सफेद धन को पाने के लिए कतार में लगा है और शादी-ब्याह से लेकर तमाम परेशानियों को इसीलिए भोग रहा है, ताकि काले कुबेरों को सबक मिल सके, लेकिन आपने तो काले कुबेरों की लॉटरी निकालकर उस आम जनता के साथ विश्वासघात किया, जो आप पर भरोसा कर अपना काम-धंधा दाँव पर लगाकर कतार में खड़ी रही। अभी आपके कई भक्त नई दलील देने लगे कि इससे सरकार को 50 प्रतिशत राशि मिलेगी, जो गरीबों के कल्याण पर खर्च होगी, लेकिन अगर आप ये 50 प्रतिशत कालाधन भी सफेद नहीं करते तो सरकार को 100 प्रतिशत ही फायदा हो जाता, क्योंकि रिजर्व बैंक को उतने कालेधन की देनदारी नहीं चुकाना पड़ती। जितने कालेधन के नोट 30 दिसम्बर तक जमा नहीं होते, उतना शत-प्रतिशत मुनाफा आपकी सरकार को ही होता, जिसका पूरा उपयोग गरीबों के हित में हो सकता था, मगर अब तो इस राशि में से आधा पैसा फिर काले कुबेरों के पास पहुंच गया। भले ही यह पैसा 25-25 प्रतिशत की दो किश्तों में पहुंचे, मगर कागज होने, नदियों में बहने या जलने से तो बच ही गया। यानि देश को लूटते रहो और बार-बार माफी योजना का लाभ लेते रहो… काले कुबेरों के साथ 50-50 प्रतिशत की भागीदारी कर मोदी सरकार ने अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारी है, क्योंकि विपक्ष इस मुद्दे को उठाएगा जरूर। हालांकि, यह भी सच है कि कालेधन के इस कारोबार में सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष भी शामिल रहा है, क्योंकि चुनाव में तमाम राजनीतिक दल जो करोड़ों-अरबों खर्च करते आए हैं वह कालाधन ही रहता है। लिहाजा नेताओं के साथ-साथ तमाम कारोबारी, ठेकेदार और मीडिया मुगल भी मोदी जी के इस फैसले के साथ रहेंगे, क्योंकि सभी को अपना कालाधन 30 दिसम्बर तक बचाना है और इसकी जुगाड़ में वे लगे रहे और अब तो सरकार ने ही उन्हें आधा कालाधन सफेद करने की योजना दे दी। दरअसल नोटबंदी का पूरा फैसला ही गलत साबित हो गया। इसकी न तो तैयारी की गई और न ही इसे रोकने के पुख्ता उपाय किए गए। मोदी जी भले ही सभाओं में चिल्ला-चिल्लाकर ये कहें कि मैंने कालाधन रखने वालों को 72 घंटे भी नहीं दिए, जबकि हकीकत यह रही कि उन्होंने पहले 51 दिन दिए और उसके बाद 20वें दिन में ही आयकर कानूनों में संशोधन ले आए, जिसके चलते कालाधन उजागर करने वालों को 50 प्रतिशत टैक्स लेकर उसका बचा 50 प्रतिशत कालाधन दो किश्तों में सफेद कर दिया जाएगा। अभी कई बीजेपी समर्थक और साथ-साथ चार्टर्ड अकाउंटेंट ये दलील दे रहे हैं कि इसमें 25 प्रतिशत राशि ही अभी सफेद होगी और शेष 25 प्रतिशत राशि 4 साल के बाद मिलेगी। लिहाजा ब्याज-बट्टे का नुकसान चार साल तक उठाना पड़ेगा, लेकिन यह दलील इसलिए बोगस है, क्योंकि भले ही चार साल बाद 25 प्रतिशत राशि मिले, कम से कम उतनी मूल पूंजी तो सुरक्षित रहेगी। अभी तो शत-प्रतिशत यानि 100 फीसदी कालाधन ही कागज होने जा रहा था। रहा सवाल ब्याज-बट्टे का तो बोरों में भरा कालाधन, घरों, दफ्तरों, गोदामों या लॉकरों में छुपाया कालाधन जो कि कैश के रूप में है उसे ही सरकार ने 500 और 1000 रुपए के नोट के रूप में बंद किया है। यह कालाधन बैंकिंग सिस्टम से बाहर है इसलिए इस पर वैसे भी ब्याज नहीं मिलता और इस कालेधन का उपयोग लोगों ने हुंडी-चिट्ठी पर कर रखा था और बदले में ढाई-तीन सैकड़े का ब्याज कमाते रहे, लेकिन यह ब्याज भी कालेधन के रूप में ही ऊपर से मिलता है। इतना ही नहीं, अभी कालेधन पर रोक की घोषणा के साथ ही ताबड़तोड़ लोगों ने सोना लगभग दो गुने मूल्य पर खरीद लिया। सोने की खरीदी भी इसीलिए की गई कि कागज होने से बेहतर है कि सोना ले लिया जाए, जो भविष्य में काम ही आएगा। प्रॉपर्टी के साथ-साथ सोने या अन्य कारोबार में निवेश ही कालाधन इसीलिए किया जाता है ताकि भविष्य में काम आ सके। ऐसे में 25 प्रतिशत राशि अगर 4 साल बाद मिलती है तो भी कोई नुकसान नहीं है। कालेधन पर रोक के साथ यह दलील भी दी गई थी कि इससे जाली नोट के अवैध धंधे पर चोंट पहुंचेगी और नक्सलवादियों से लेकर आतंकवादियों के जाली नोट जहां खत्म होंगे, वहीं उनके पास जमा कालाधन भी कागज हो जाएगा, लेकिन अब 50 प्रतिशत टैक्स देकर नक्सलवादियों और आतंकवादियों का भी कालाधन आधा तो सफेद हो ही जाएगा, क्योंकि उन्हें जिस नेटवर्क के जरिए ये धन मिलता है वह नेटवर्क बड़ी आसानी से इस योजना का लाभ लेकर अपना आधा कालाधन सफेद करवा लेगा। जब नोटबंदी लागू की गई थी तब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने यह बताया था कि देश में लगभग साढ़े 14 लाख करोड़ मूल्य के 500 और 1000 रुपए के नोट हैं, जिन्हें चलन से बाहर किया गया है। मोदी सरकार को ये अनुमान था कि इसमें से कम से कम 5 लाख करोड़ रुपए ऐसे होंगे जो वापस बैंकों में जमा नहीं होंगे। यानि यह कालाधन पूरी तरह से नष्ट हो जाता, मगर अब इसमें से आधा धन फिर सफेद किया जा रहा है। अभी 20 दिनों में ही बैंकों में साढ़े 8 लाख करोड़ रुपए मूल्य के पुराने नोट जमा हो चुके हैं। दरअसल, यह राशि लोगों ने कई तरह की जुगाड़ आजमाकर बैंकों में जमा कर दी है। इनमें बचत खातों के अलावा करोड़ों जन धन खातों का भी इस्तेमाल किया गया। मोदी सरकार ने गरीबों के लिए देशभर में जन धन खाते बैंकों से जीरो बैलेंस पर खुलवाए थे। ऐसे 25 करोड़ खाते खोले गए ताकि आधार कार्ड से इन खातों को जोड़कर सरकारी सब्सिडी और अन्य योजनाओं का लाभ गरीबों को दिया जा सके, लेकिन नोटबंदी के चलते 8 करोड़ से अधिक जन धन खातों में 21 हजार करोड़ से ज्यादा का कालाधन जमा हो गया। इससे सरकार के होश उड़ गए, क्योंकि इतने खातों की जांच कराना संभव नहीं है और अगर नोटिस भी जारी होते हैं तो बचत खाताधारकों से लेकर जन-धन खातों के गरीब परिवार भड़क जाएंगे, क्योंकि इन खातों के एवज में उन्हें भी 20 से 25 प्रतिशत पैसा कालाधन जमा कराने वाला दे रहा है। ऐसे में इन खातों की जांच मोदी सरकार के लिए बूमरेंग साबित होगी और तमाम गरीब भड़क जाएंगे। कुल मिलाकर नोटबंदी की यह योजना पूरी तरह से फ्लॉप साबित हुई है। बदले में जनता को कतारों में लगना पड़ा और देशभर का कारोबार अलग ठप पड़ गया और दूसरी तरफ मोदी सरकार काले कुबेरों को फायदा पहुंचाने में जुट गई।

लेखक परिचय: राजेश ज्वेल जी, इंदौर से प्रकाशित सांध्य दैनिक अग्निबाण में बतौर वरिष्ठ पत्रकार कार्यरत हैं| स्वतंत्र लेखन और टिप्पणीकार के रूप में स्थापित नाम हैं|

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।