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संस्मरण

#डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

kashmir

जब भी प्रेम के गीतों का बखान होगा,ज़ाफरान की तासीर का तरन्नुम बनेगा, कश्यप की धरती का गुणगान होगा, शंकराचार्य की जुबानी कही जाएगी, लालचौक से क्रांतिसूत्र माँगा जाएगा, डल झील से टपकते पानी की बात होगी, शिकारों और तैरनेवाले घर (हॉउस बोट) की सर्द रातों को याद किया जाएगा, चश्मे शाही में पत्थरों से रिसते पानी की चाह होगी, मुग़ल गार्डन को जेहन में उतारा जाएगा, विश्वविद्धयालय से शिक्षा की अजान होगी, फूलों के महकने को जब जीवन में उतरता देखा जाएगा, तब बेशक वादी की बर्फ से कहवे की महक तक का जायका लेकर कश्मीर की क्यारियों को ही याद किया जाएगा |

हाँ, मैं अब तक उसी कहवे के स्वाद में खोया हूँ जिसने अनजान से शहर श्रीनगर(कश्मीर) में नए रिश्तों को बनाकर मुझे तन्हा नहीं होने दिया|  और हाँ, सबसे खास बात कभी न भूल पाने वाले पलों में एक वादी का वो प्यार भी है जो मुझे हमेशा कश्मीर की तरफ खींचने के लिए काफ़ी है|

बहुत कुछ सुना था, इंदौर से दिल्ली तक की यात्रा में कश्मीर के बारे में| पेशे से पत्रकार होने के कारण बहुत कुछ लिखा हुआ घाटी के सौन्दर्य के बारे में और हालातों का वही रोजमर्रा वाला हालचाल जो सियासत, दुनिया को दिखाना चाहती है वही पढ़ पाया था, पर दिल्ली से श्रीनगर की महज १ घंटा २५ मिनिट की उड़ान के बाद जो आँखों से कश्मीर को देखा और जाना वो कहीं अलग था| कमोबेश मैं विश्वास ही नहीं कर पा रहा था कि क्या मैं वाकई कश्मीर में ही उतरा हूँ या फिर कहीं और …| क्योंकि कश्मीर के बारे में जो सुना या पढ़ा वो सब कोरी हवा ही थी, क्योंकि वादी के निश्चल प्रेम और मिठास के साथ अपनेपन के भाव को शायद कोई नहीं लिख पाया हो|

बहरहाल, वादी में सिमटी हुई जाफरान की खुशबू अभी भी हिंदुस्तान के दिल तक नहीं पहुँच पाई इसका मलाल है मुझे,और उन तमाम बुद्धिजीवियों से अपेक्षाएं भी हैं कि कम से कम वादी को लगी सियासी नज़र का टोटका भी करवा दो ताकि, गुलजार हो जाए केशर की क्यारियां|

श्रीनगर का टीआरसी ( टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर ) जहाँ जम्मू जाने वाली टैक्सियों का मेला-सा लगा हुआ रहता है फिर चाहे समय रात के बारह क्यों ना हो| वहीं हमारा रुकना हुआ जहाँ से बमुश्किल २०० कदम पर डल गेट है| हममें शामिल है मेरा मातृभाषा परिवार जिनमें मेरे साथी डॉ. प्रीति सुराना जी|

हाँ! मैं से हम हो जाना ही जिंदगी का असली मजा है | वादी की वो ठण्डी शाम जो सूरज को विदा करके चांदनी के घर में हमें खींच लाती है,जहाँ सर्दी से बचने के लिए एक इलेक्ट्रिक कम्बल बिस्तर पर हमारा इंतजार कर रहा होता है और कमरे में लगा रूम हीटर हमें मुंह चिढ़ा रहा होता है| इन्हीं सबके बीच तापमान का अचानक से डिग्री ३ हो जाना भी बहुत याद आता है| खैर, शाम हुई और हमें शाकाहारी भोजन को ढूंढने की जहमत नहीं उठानी पड़ी क्योंकि मेजबान हर दिल अज़ीज जिनसे पहली मुलाक़ात के बाद से ही अपनापन लगने लगा, हाँ नसरीन अली जी ने हमें पहले ही सारे ठिकानों की जानकारी दे दी थी,जहाँ शाकाहारी भोजन मिलता है| डल गेट जाने के लिए हमने टैक्सी वाले को रोका और इन्दौरी आदतन हमने भाड़े को लेकर थोड़ा-सा मोल-भाव करना चाहा| तब उस बुजुर्ग टैक्सी ड्रायवर दद्दू की एक बात दिल में  इतनी गहरी उतर गई कि उसके बाद हम निशब्द ही हो गए| हाँ, उन्होंने कहा कि ‘आप तो मेहमान हैं और मैं आपसे वही दाम लूँगा जो आप दिल से देना चाहेंगे,क्योंकि मेहमान का दिल तोड़ने की कश्मीरी रवायत नहीं ….’|

इन्हीं सब जद्दोजहद के बाद रात का तीसरा प्रहर आ जाना जहाँ निंदिया रानी का दुबक कर कहना कि सो जाओ वरना सुबह टैगोर हाल में होने वाले आयोजन के लिए समय से नहीं पहुँच पाओगे| दिमाग अभी भी वही कसरत कर रहा था कि आखिर विमानतल से टीआरसी तक पहुंचने वाले पूरे रास्ते को हिन्दुस्तानी फ़ौज ने क्यों घेरे रखा है? क्या वाकई कश्मीर को जरुरत है इन फौजी लामबंदी की?

कश्मीर पर सियासत की इतनी गहरी मार है कि जिससे बर्फ के मानिंद पिघलने की उम्मीद भी करना स्वयं को पागलपन में डुबाना होगा|

खैर, सर्द रात ने ख्यालों की कम्बल ओढ़ाकर नींद के आगोश में ले ही लिया और फिर हम दुसरे दिन सीधे १० बजे सोकर उठे जबकि ११ बजे हमें टैगोर हाल पहुंचना था| जहाँ हमारी हिन्दी माँ अपनी बहन उर्दू के घर हमारा इंतजार कर रही थी, क्योंकि  बहन के बच्चों का सम्मान जो होना था| हम थोड़ा विलम्ब से पहुंचे लगभग आधा घंटा|

और इसी बीच मेरे अजीज मित्र या कहूँ भाई जिनसे मैं खुद भी पहली दफा ही मिला बस सोशल मीडिया के सहारे ही तीन सालों से सम्बन्ध और संवाद बना हुआ था, शाह ऐजाज भाई आ गए …. भाई ने कहा कि आप हमारी एक्टिवा पर चलिए, हम आपको कश्मीर दिखाते हैं| और मैं तो चल दिया एक्टिवा पर और मेरे साथी सब टैक्सी से पहुंचे टैगोर हाल|

टैगोर हाल में तमाम कश्मीरी फरिश्तों के बीच ही बैठी थी हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. ज़ोहरा अफज़ल जी और ख्यात लेखक डॉ.निदा नवाज जी भी| घाटी में हिन्दी के विकास व विस्तार के लिए कार्यरत संस्था ‘वादीज़ हिंदी शिक्षा समिति’ ने ‘मातृभाषा उन्नयन संस्थान’ (पंजी.) इंदौर व ‘आकाशवाणी केन्द्र श्रीनगर’ के साथ मिलकर बुधवार को टैगोर हॉल में हिंदी भाषासारथियों के सम्मान एवं हस्ताक्षर बदलो अभियान की शुरुआत की थी। बच्चों ने कश्मीरी गीतों पर थिरकते अरमानों के साथ हमारा भी स्वागत किया जिससे, है कश्मीर की महक आ रही थी| हाँ वही ‘बुमरो–बुमरो’|

सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ यह आयोजन प्रारंभ हुआ,जिसमें मुख्य अतिथि कश्मीर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्षा प्रो. ज़ोहरा अफज़ल,रेडियो कश्मीर श्रीनगर के कार्यक्रम प्रमुख सईद हूमायूँ कौसर (स्वागताध्यक्ष) एवं डॉ.निदा नवाज़ (राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित हिन्दी साहित्यकार) विशिष्ट अतिथि रहे। भारतीय जीवन बीमा निगम,जम्मू और कश्मीर बैंक एवं जम्मू कश्मीर पर्यटन विभाग ने इस कार्यक्रम की प्रस्तुति में सहयोग किया। शुरुआत में वादीज़ हिंदी शिक्षा समिति के निदेशक डॉ.अब्दुल अहद बंदरुं ने सभी अतिथियों का स्वागत-सम्मान किया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य बच्चों व आवाम में हिंदी में हस्ताक्षर करने की भावना को जागृत करना, साथ ही साथ उन लेखकों, कवियों एवं विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों के मनोबल को बढ़ाना था, जो हिंदी भाषा से जुड़े हैं और हिंदी साहित्य को लेकर अपने उज्जवल भविष्य के सपने देख रहे हैं।

इस मौके पर मातृभाषा उन्नयन संस्थान से मैंने हिन्दी की उपयोगिता और उसके कारण ही संस्कृति संरक्षण के महत्व को बताया। साथ ही हिंदी में हस्ताक्षर क्यों हो,इसकी उपयोगिता पर भी प्रकाश डाला |साथ ही संस्थान की उपाध्यक्ष डॉ.प्रीति सुराना ने विद्यालय स्तर से ही बच्चों को हिन्दी से जोड़ने और प्रेरणा को समझाया। कार्यक्रम में स्थानीय मीडिया सहित कई विद्यालयों के छात्र-छात्राएं, लेखक, शायर आदि शामिल हुए। शानदार संचालन की जिम्मेदारी अशफाक लोन जी ने निभाई। कार्यक्रम में वादीज़ हिंदी शिक्षा समिति की अध्यक्षा नसरीन अली ने सबका आभार व्यक्त किया। फिर हम सब पहुँच गए ‘कहवा’ पीने| वही कहवा जो अब तक कश्मीरी प्रेम के रूप में हमारे जेहन में जिन्दा है| प्रेम से कश्मीर का ताल्लुक तो बहुत ही गहरा है, इस बात को हमने भी मान लिया क्योंकि कश्मीरी संस्कृति जो मिठास बाँट रही थी उससे तो कभी नहीं लगता कि यहाँ भी रक्तरंजित होली खेली गई है?

खैर, इसके बाद हम डल झील होते हुए चश्मेशाही गए, जहाँ चिनार के पत्तों के अभूतपूर्व सौन्दर्य के बीच में पत्थरों से रिसता मीठा पानी भी आता है| जिसके बारे में कश्मीर कहता है कि यह पानी नेहरु जी और इंदिरा जी को रोज पीना होता था जिसके लिए वे अपने निजी विमान से यहाँ का पानी बुलवाते थे| इसके बाद हम पहुंचे मुग़ल गार्डन जहाँ वादी के अलहड़पन की झलक डल में बनी देवदार की परछाई की तरह खुद को डूबने पर मजबूर कर रही थी| इधर शाम ढलने लगी और हम वापस अपने ठिकाने की तरफ लौटने लगे, जैसे पक्षी दिनभर की मशक्कत के बाद घरोंदों की तरफ लौट आते हैं|

दिन का ढलना, मतलब कश्मीर में तापमान का गिरना ही होता है | यहाँ बस तापमान गिरता है इमान नहीं|  इस बात को हमने महसूस किया शाम को खरीददारी करने जब डल गेट पहुँचे,तब….|

सर्द रात और दिन की थकन अपना काम बखूबी कर रही थी, जिसने हमें दुबक कर कम्बल में घुसने को मजबूर कर दिया | नींद ने आगोश में लेने में भी बड़ी फुर्ती दिखाई| जैसे-जैसे रात चढ़ने लगी मौसम और सर्द होता जा रहा था| हम तो सो गए, क्योंकि सुबह फिर से नए सूरज के पास जाना था, और रेडियो कश्मीर भी| सुबह की थोड़ी-सी धूप ने जल्दी उठा दिया और हम तैयार होकर निकल पड़े डल गेट की तरफ… क्योंकि हम रात में ज़ाफरान और अखरोट खरीदना भूल गए थे, हम कहवा भी खरीद लाए पर वो मिठास नहीं जो केवल कश्मीर में थी….|

फ़ौज की चेकिंग के बाद नसरीन जी के साथ आकाशवाणी के दफ्तर पहुंचे जहाँ हम हिन्दी पूतों का साक्षात्कार होना था, हुआ भी… और फिर हम तैयार हुए अपने मकां की तरफ लौटने को| इन्हीं सबके बीच हमारे मेजबान की आँखों में थमी हुई बरसात का बूंदों के रूप में झलकना देख कर रुक-से गए| खैर, जो आया है वो जाएगा ये नियति ने तय कर दिया है पर विरह की वेदना से उर भर तो जाता हैं| झलकती आँखों की नमी इस बात की गवाही दे रही थी कि हम जरुर अपने वतन की खुशबू को समेट कर ले जा रहे हैं| इसके बाद पुन: विमानतल की ओर लौटना, जहाँ से अगली यात्रा दिल्ली की थी, इसी के बीच फिर फ़ौज का वो खौफ़ झलकने लगा जो कश्मीर के चेहरे पर साफ तौर पर देखा जा सकता था| कश्मीर को आदत-सी हो गई है सियासती दर्द की, पर एक बात से फिर इनकार नहीं किया जा सकता कि कश्मीरी वैसे भी नहीं हैं जो हमें रोज पढ़ाए या दिखाए जाते हैं| कश्मीर के कुछ लोगों के कारण आवाम को क्यों सजा? खैर, इन सबके बीच विमान ने भी दिल्ली के लिए उड़ान भर ली और हम समेट लाए वादी से रिसता प्रेम का कहवा… पर यक़ीनन यह कहवा नसरीन जी द्वारा बनवाए गए कहवे जैसा तो नहीं है |

#डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’

परिचय : डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर  साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।

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