लोकसभा चुनाव 2019 और भारतीय भाषाएँ

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यदि भारतीय भाषाओं के नजरिए से लोकसभा चुनाव 2019 को देखा जाए तो इसमें दो बातें महत्वपूर्ण हैं, एक तो यह है कि भारतीय भाषाओं के जरिए लोकसभा चुनाव के दौरान किसने क्या पाया ? और दूसरा यह कि इस चुनाव में भारतीय भाषाओं ने क्या पाया ? या यूं कहें कि जिन्होंने भारतीय भाषाओं से बहुत कुछ पाया उन्होंने भारतीय भाषाओं को क्या कुछ दिया ?

पहले प्रश्न का उत्तर तो बड़ा ही स्पष्ट है कि हिंदी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं के कई स्थानीय, राज्य स्तर के और राष्ट्रीय स्तर के कई नए समाचार चैनल पैदा हो गए। जहाँ भारतीय भाषाओं के पुराने चैनलों ने मोटी की कमाई वहीं नए चैनलों ने भी अपनी अच्छी पैठ बनाई। जहाँ राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के चैनलों ने चांदी काटी, वहीं राज्य स्तरों पर अन्य भारतीय भाषाओं के चैनलों ने भी खासे विज्ञापन बटोरे। भारतीय भाषाओं के अखबारों की आम जनता में खासी पैठ के चलते उऩ्होंने भी वारे-न्यारे किए ।

देखना यह भी है कि भारतीय भाषाओं के चैनल और अखबार, विशेषकर हिंदी भाषा के, जिन्होंने भारतीय भाषाओं के जरिए मोटी कमाई की, वे अपनी भाषा के प्रति अपनी वफादारी निभाएँगे या अंग्रेजीदां हो कर भारतीय भाषाओं के चलते-फिरते जीवित शब्दों को चुन-चुन कर हटाते रहेंगे और उनके स्थान पर अंग्रेजी शब्द बैठाते रहेंगे।

मैं तो यह पाता हूँ कि मार्केटिंग की दृष्टि से भारतीय भाषाओं और बोलियों के इस्तेमाल को विज्ञापन जगत से भी कहीं अधिक राजनीतिक दल और राजनेता समझते हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि कुछ अपवाद छोड़ कर ज्यादातर नेता जनता और जमीन से जुड़े होते हैं। जबकि विज्ञापन जगत के ज्यादातर सिपहसालार अंग्रेजी माध्यम से पनपते हैं। वे भले ही भारतीय हों लेकिन ज्यादातर का चश्मा विलायती होता है। इसलिए उनके अनेक विज्ञापन तो जनता को समझ तक नहीं आते। इसलिए ज्यादातर नेताओं ने राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी, क्षेत्रीय स्तर पर विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के साथ-साथ क्षेत्र विशेष की बोलियों और उपबोलियों तक का बखूबी इस्तेमाल कर मतदाताओं के दिलो – दिमाग को प्रभावित करने की बहुत ही अच्छी कोशिशें की। वे राष्ट्रीय नेता जो जो किसी राज्य की भाषा-बोली नहीं जानते उन्होंने भी उन राज्यों में जाकर अपने भाषण में यथासंभव क्षेत्रीय भाषा में नमस्कार करके अथवा उसमें भाषण का प्रारंभ करके मतदाताओं से जुड़ने की और उनके दिलों को जीतने की कोशिश की।

भले ही कई राज्यों में कई राजनेता राजनीति के चलते कभी हिंदी का विरोध करते रहे हों, लेकिन वे इस तथ्य को अच्छी तरह जानते हैं कि आज राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं राज्यों के स्तर पर भी हिंदी मार्केटिंग का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए देश के विभिन्न हिंदीतर-भाषी राज्यों में, यहाँ तक कि तमिलनाडु के कई क्षेत्रों में भी चुनाव-प्रचार के लिए हिंदी का खासा इस्तेमाल हुआ । अनेक राज्यों में वे क्षेत्र जहाँ स्थानीय भाषाओं के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं के बोलने वालों की भी खासी संख्या है वहाँ सभी मतदाताओं तक पहुंचने का एक ही जरिया था, वह थी हिंदी। क्योंकि केवल इसी के माध्यम से विभिन्न भाषा भाषियों को परस्पर जोड़ा जा सकता है और उन तक अपनी बात पहुंचाई जा सकती है, इसलिए वहाँ हिंदी का भी खासा प्रयोग हुआ। वोट बैंक के लालच के चलते समाज को भाषा के आधार पर बांटने वाले नेताओं को भी इसमें कुछ गलत नहीं लगा। इससे स्पष्ट हो जाता है कि महात्मा गांधी सहित सभी स्वतंत्रता सेनानियों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा क्यों दिया था।

इस प्रकार जहाँ हिंदी का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ वहीं और हिंदी में क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों व शैलियों का प्रभाव भी बढ़ा। इस प्रकार भारतीय भाषाएँ एक-दूसरे के निकट आईँ। निश्चय ही यह राष्ट्रीयता की दृष्टि से शुभ है।

राष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात रखने के लिए हिंदीतर – भाषी नेताओं ने खासी मेहनत की। ममता बैनर्जी सहित कई नेताओं की हिंदी में भी खासा सुधार देखा गया। भले ही नेताओं की भाषा लगातार मर्यादाओं को तोड़ती रही हो लेकिन उन्होंने भी देश भर में अपनी आवाज पहुंचाने के लिए गाली से ले कर ताली तक हिंदी का सहारा बखूबी लिया। दूसरी ओर विवादास्पद बयान देने और उससे फंसने पर ठीकरा भी हिंदी के सिर पर ही फोड़ा गया। दिन रात हिंदी में बयानबाजी करने के बाद ‘हुआ तो हुआ’ के बयान पर फंसने पर सेम पित्रोदा जी ने कहा, ‘मैं तो अंग्रेजीदां हूं, अंग्रेजी में सोचता हूं, हिंदी न आने के कारण कुछ गलत हुआ तो हुआ। मेरा इरादा तो ऐसा न था।‘

उधर अच्छी खासी हिंदी बोलने वाले एक माननीय नेता शशि थुरूर जी ने चुनावों के बीचों-बीच उत्तर-दक्षिण की राजनीति करते हुए फिर एक बार हिंदी को बलि का बकरा बनाते हुई दक्षिणवासियों पर हिंदी थोपने की बात कह डाली। हालांकि एक-आध चैनल को छोड़ इसकी कहिं चर्चा तक नहीं हुई। अनका अपना दल तक इस पर खामोश रहा। शायद यह डर रहा होगा कि उन्हें फायदा हो या न हो नुकसान जरूर हो जाएगा। राजनीति तो मतों की गिनती का खेल है।

एक महत्वपूर्ण बात यह भी रही कि जहाँ ‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ ने सभी राजनीतिक दलों को भारतीय भाषाओं का चुनावी मांग पत्र भेजा। वहीं भारतीय भाषाओं के समर्थकों के नियमित प्रयासों के प्रभाव के चलते भाजपा व कांग्रेस जैसे बड़े दलों ने भारतीय भाषाओं की बात को अपने चुनावी घोषणा पत्र में जगह दी। हालांकि भारतीय भाषाओं को ले कर चुनावी घोषणा पत्र में की गई बातों में कहीं कोई गंभीरता तो नहीं दिखी लेकिन इतना अवश्य हुआ कि जनता में भारतीय भाषाओं की उपेक्षा के दर्द पर नेताओं का ध्यान गया। इसे उपलब्धि मानना चाहें तो मान सकते हैं।

पर हर बार की तरह यक्ष प्रश्न वही है कि भारतीय भाषाओं के रथ पर सवार हो कर संसद व सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने वाले नेतागण हिंदी सहित तमाम भारतीय भाषाओं को कितना महत्व देते हैं। या फिर पहले की तरह आगे भी इसी प्रकार भारतीय भाषाओं की उपेक्षा होती रहेगी।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।