लिबास

Read Time4Seconds
rajeshwari
आज ठण्ड बहुत ज्यादा थी,कोहरा भी छाया हुआ था। सर्द मौसम में पड़ोस की गली सूनी पड़ी थी,जहां हर समय
छोटे-छोटे बच्चों का शोर बना रहता है,  पर सब आज अपने कच्चे-पक्के मकानों या कहें कि,झोपड़ियों में दुबके हुए थे।  जिनके तन पर गर्म कपड़ों की बात तो दूर,तन ढंकने को भी लिबास मयस्सर नहीं थे,वो इस ठण्ड में कैसे खेलते-कूदते ? सब बेबसी में दुबके हुए थे। उसका मन कसेला-सा हो गया। प्रभु की कैसी लीला  थी-एक तरफ तो धनवानों की बड़ी-बड़ी कोठियां और पिछवाड़े नंगे बदन मासूमियत…शरारती ठण्ड ने हंसी छीन ली थी उन मासूमों की। उससे रहा नहीं गया। वो रोज उस गली से गुजरती थी, जहाँ उन बच्चों की शैतानी,मासूम बदमाशियां और फिर हाथ जोड़कर ‘नमस्ते मेडम..’ होंठों पर मुस्कराहट  के साथ लाकर कहना और छुप जाना। वो उनकी भोली शरारत पर निहाल हो जाती थी। उसका मन करता कि,इनको खूब प्यार करुं,इनके लिए कुछ करुं। वह खुद भी लाचार थी,पर आज उसने ठान लिया कि कुछ तो करेगी,और उसने घर में जितने भी पुराने गर्म कपड़े जो उसके पोते-पोतियों को नहीं अाते थे तथा शाल-स्वेटर-कम्बल सब लेकर चल पड़ी। पड़ोसियों ने देखा तो कहने लगे-इतनी ठण्ड में कहां जा रही हो पोटला ले के!  जब उसने सारी बात बताई तो बोली-रुको,मैं भी चलती हूं। जब हम वहां पहुंचे तो दुबका बचपन खिलखिला पड़ा कि,  अब हमको ठण्ड से कुश्ती नहीं लड़नी पड़ेगी,और डरना नहीं पड़ेगा। गर्म कपड़े देखकर उनके माता-पिता हाथ जोड़कर कृतज्ञ नजरों से देख रहे थे,शायद उसके मन में भी अब संतुष्टि के भाव थे।

                                  #श्रीमती राजेश्वरी जोशी

परिचय : श्रीमती राजेश्वरी जोशी का निवास अजमेर (राजस्थान) में है। आप लेखन में मन के भावों को अधिक उकेरती हैं,और तनुश्री नाम से लिखती हैं।

0 0

matruadmin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

स्वतंत्रता बनाम पाश्चात्यता

Wed Dec 20 , 2017
अन्तर्जातीय विवाहों को समय पर रोक दिया होता, संस्कारों का हनन हमने यूं मूक सहा नहीं होता। तो स्वतंत्रता के नाम पर उच्छश्रंखलता नहीं बढ़ी होती, भव्यता के प्रदर्शन में अश्लीलता नहीं पनपी होती। वक्त रहते सम्भलना हमको यदि आ जाता, ‘लव जिहाद’ का दंश भारत में नहीं पनप पाता। […]

Founder and CEO

Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।