माँ की विदाई – गोद भराई के साथ

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priya yash
आज ‘वटवृक्ष’ में बहुत चहल-पहल थी। सभी आते-जाते मुस्कुराते हुए एक दूसरे को देख रहे थे।
रसोईघर से स्वादिष्ट भोजन की खुशबू आ रही थी I ज्योति जी एक सूटकेस में साड़ियाँ पैक कर रही थीं और बाकि लोग वही खड़े बात कर रहे थे I सभी के चेहरे पर रौनक थी I
तभी शांति देवी वहाँ आईं, सबकी तरफ़ देखा और हल्की सी मुस्कान लिए सिर पर पड़ा साड़ी का पल्ला ठीक किया । ज्योति जी ने उन्हें देखा तो सूटकेस बंद कर दिया और उनका हाथ पकड़कर उन्हें हाल में रखी कुर्सी पर बैठाया । बाकी लोग भी उनके इर्द-गिर्द आ गए ।
नरेश जी ने उन्हें एक शाल देते हुए कहा, “शांति जी आपके लिए एक सप्रेम भेंट !!
आपके जाने से यहाँ भी सब शांत हो जाएगा। आपके हाथों के वो बेसन के लड्डू बहुत याद आएँगे।
शांति देवी ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैंने लडडू बनाकर भंडार गृह में रख दिए हैं ।
नरेश जी के होठों पर हलकी सी मुस्कान आ गई I
“लेकिन शांति, हमारी हर रात की कहानी का क्या होगा?” सुधा जी ने पूछा
और वो मंगलवार की भजन संध्या का क्या? सामने से आती हुई अल्पना जी बोलीं ।
“आप सब तो हैं न, सब कुछ वैसे ही चलेगा जैसा चलता आया है”… शांति देवी बोलीं
तभी नरेश जी ने पूछा- वे लोग कब तक आएँगे ? तो अल्पना जी बोलीं- “दोपहर बाद का कहा है”….
नरेश जी धीमे स्वर में केवल ‘ह्म्म्म’ ही बोल पाए कि उनकी आँखे नम हो गईं ….
उन्हें भावुक देख ज्योति जी, अल्पना जी और बाकी लोगों की आँखें भी नम हो गईं I
सब किसी-न-किसी काम का बहाना बनाकर हॉल से चले गए I अब हॉल में केवल शांति देवी ही थीं …
आराम कुर्सी पर टेक लगाकर कर बैठते ही उनकी आँखें बंद हो गईं और आँखों की दोनों कोरों से कुछ बूंदे बढलक गईं I अतीत के पन्नों में से कुछ चुभता हुआ सा रिसने लगा I
पति के गुज़रने के बाद उनकी दुनिया जैसे थम सी गई थी I जवान विधवा का जीवन एक अभिशाप ही होता है, लेकिन नन्हें रोहित के लिए उन्होंने कमर कस ली थी I ज़िन्दगी को एक नई दिशा दी और अपने पंखो को फैला कर उडान भरी I पति की जमा पूंजी से नए जीवन की शुरुआत की I
रोहित की पढाई में कोई कमी नहीं आने दी I रोहित की अच्छी जगह नौकरी लगी तो शांति जी ने चैन की साँस ली और उसकी शादी के बारे में सोचने लगीं I शांति जी को ज्यादा नहीं सोचना पड़ा क्योंकि रोहित ने खुद ही अपनी पसंद बता दी थी I धूमधाम से शादी हुई I रोहित की शादी के बाद शांति देवी को लगा कि अब शायद जिम्मेदारियों से मुक्ति मिली I वह अब कुछ समय खुद के साथ बिताना चाहती थीं कि तभी परिवार में एक बड़ी खुशखबरी ने दस्तक दी I शांतिदेवी का ओहदा बढ़ने वाला था I “दादी” का संबोधन सुनना था उन्हें I
पोते को गले लगाते ही जैसे उनमे फिर से नया जीवन आ गया I बेटे के परिवार को सँभालते-सँभालते कब वो फिर से खुद को भूल गईं उन्हें भी पता नहीं चला….
वो तो एक दिन जब बेटा बहू बात कर रहे थे कि “उनका ‘बेटा’ अब बड़ा हो रहा है, उसे अलग कमरा चाहिए और उन्हें प्राइवेसी जिसमें शांतिदेवी अडचन हैं” …..तब उन्हें अहसास हुआ कि वो एक ‘दाई माँ’ से ज़्यादा कुछ नहीं …. कहाँ वो पोते की शादी और उसके बच्चे के सपने देख रही थीं और अब उनके सिर की छत ही खिसक रही थी I
एक दिन घूमते-घूमते उनकी नज़र इस वटवृक्ष “वृद्धाश्रम” पर पड़ी I शांति देवी ने सोचा बेटे का “बोझ” कुछ हल्का कर दें और वे यहाँ आ गई जहाँ उनकी तरह और भी वृद्ध थे जो उनकी तरह या तो खुद आए या बेटे द्वारा छोड़े गए थे I शांतिदेवी को यहाँ एक परिवार मिला था I
यहाँ किसी रिश्ते का कोई नाम नहीं था लेकिन सबका दुःख एक ही था ….
एक जैसा दुःख होने के कारण सभी एक दूसरे से खून के रिश्ते की तरह मज़बूती से जुड़े हुए थे ….
किसी का जन्मदिन हो या वर्षगाँठ सभी एक परिवार की तरह ही मनाते ….
इन चार सालों में इस वटवृक्ष में कई बुजुर्ग आए तो कई “हमेशा” के लिए चले भी गए I
बहुत कम लोग भाग्यशाली थे जिनके बेटा-बहू या कोई रिश्तेदार मिलने आ जाते थे I
कुछ के तो केवल प्रॉपर्टी या किसी सरकारी कागज़ पर साइन कराने ही आते I
‘शांति …. शांति …. कहाँ हो?  शांति देवी जैसे नींद से जागीं तो देखा अल्पना जी उनके सामने खड़ी हैं I
अल्पना जी ने शांति जी को गले लगाते हुए कहा – “शांति तुम खुशकिस्मत हो कि तुम्हें एक परिवार मिल गया। भगवान का शुक्र है कि उस परिवार ने तुम्हें चुना क्योंकि हम सब मे से तुम ही हो जिसे एक परिवार की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।“ ये सुन शांति देवी की आँखों मे आँसू आ गए I
तभी ज्योति जी आईं और उन्होंने भी शांति देवी को गले लगाया और कहा – “शांति वे लोग आ गए..”
सच ? आ गए मेरे बच्चे ? ‘हाँ, शांति’…. ज्योति जी बोलीं
अचानक दो कोमल हथेलियों ने शांति जी की पलकों को छुआ …
उन्होंने देखा तो सामने सुनयना और माधवन थे … “उनका नया परिवार, उनके बच्चे”
माधवन और सुनयना, दोनों के माता-पिता नहीं थे I दोनों की ज़िन्दगी की ये कमी उन्हें पल-पल सताती थी I उनके दो बच्चे थे- एक बेटी और एक बेटा…. वे चाहते थे कि उनके बच्चे अपने दादा-दादी और नाना-नानी के रिश्ते को पहचाने…. उनके सानिध्य में बड़े हों ….
अपनी ज़िन्दगी में माता-पिता की कमी को दूर करने के लिए उन्होंने शांति जी को “गोद लिया”
क्योंकि उनका मानना था कि …. “जिनके बच्चे नही होते वे अनाथ आश्रम से बच्चे गोद ले लेते हैं तो अगर किसी के माता-पिता नहीं हैं तो उन्हें भी वृद्धाश्रम से उन्हें गोद ले लेना चाहिए I”
इस प्रकार हमारे बुजुर्गों की बाकी की ज़िंदगी वृद्धाश्रम में नही एक परिवार में बीतेगी I
शांति देवी के चेहरे पर आज कई वर्षों बाद सच में शांति छाई थी….
जब शांति देवी आश्रम के सभी लोगों से मिलकर आई तब उनका एक हाथ सुनयना ने तो दूसरा हाथ  माधवन ने प्यार से पकड़ा और उन्हें लेकर बाहर की ओर चल पड़े I शांति देवी ने पीछे मुड़कर देखा तो आश्रम के लोग उन्हें अश्रुपूर्ण विदाई दे रहे थे I उनके जाने के बाद सबको एक आशा की किरण नज़र आई और सबने मन ही मन कामना की कि काश!! जल्द ही उन्हें भी “गोद” लेने कोई परिवार आए I  खासकर वृद्ध औरतें यही प्रार्थना कर रही थीं कि यहाँ रहने वाली हर माँ की गोद भराई हो I
#प्रिया यश
परिचय – 
प्रिया एस. प्रसाद (प्रिया यश)
शैक्षिक योग्यता-    एम.ए. (हिंदी)  बी. एड. 
अन्य उपलब्धि-      रचनात्मक लेखन कौशल के लिए ‘हिंदी विकास मंच’ द्वारा सम्मानित
पसंद और शौक-      संगीत सुनना, प्रकृति से बातें करना, लिखना व पढ़ना
व्यक्तित्व-
सरल, सौम्य, ज़िन्दगी के करीब, प्रकृति को ईश्वर का स्थान दिया है इसलिए प्रकृति से बहुत प्रेम है इसलिए प्रकृति की हर रचना से प्रेम है फिर वो चाहे सजीव हो या निर्जीव। जिंदगी का हर पल जीती हूँ और कुछ न कुछ सीखती हूँ I जिंदगी से बढ़कर कोई शिक्षक नहीं और सबसे बड़ी बात ये शिक्षक हमें पूरी आज़ादी देता है I
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matruadmin

One thought on “माँ की विदाई – गोद भराई के साथ

  1. बेहद ही मार्मिक स्टोरी का सुखदपूर्वक अंत।
    बेहतरीन कलम।।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।