मजा-मस्ती

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आँखों से पिलाए न साकी,तो क्या रखा है पीने में,
ज़जबात न हों जिस दिल में कोई वो दिल भी क्या है सीने में।
किस्मत बुलन्द है क्या मेरी,पाया हमराज़ तेरे जैसा,
हमराही न हो तुम-सा गर,तो फिर क्या रखा है जीने में।
नीलम,पुख़राज,मणीं-माणिक सारे ही पहन कर देख लिया,
तकदीर का रुख न मोड़ सके, तो
क्या रखा है नगीने में।
बेखुद न हुए  न कदम बहके, बे ‘मज़ा’ हो
वापस घर आए,
लानत डालो मयखाने को, क्या रखा ऐसे पीने में।
जो श्रम से स्वेद नहीं निकला, वो स्वेद नहीं है पानी है,
जिसमें माटी की सुगन्ध नहीं, क्या रखा है उस पसीने में।
                                                                              #सन्तोष बाजपेई 
परिचय: सन्तोष बाजपेई का उपनाम-‘सन्तोष’ है। आप लखनऊ (उत्तर प्रदेश)के छोटा चाँद गंज में रहते हैं। १९४६ में १६ जुलाई को अवतरित हुए श्री बाजपेई अधिकतर काव्य ही रचते हैं।
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Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।