भ्रष्टाचार का एक आना…

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baldva
एक राजा को मलाई रबड़ी खाने का शौक था। उसे रात में सोने से पहले मलाई रबड़ी खाए बिना नीद नहीं आती थी। इसके लिए राजा ने सुनिश्चित किया कि खजांची नौकर को रोजाना चार आने दे मलाई लाने के लिए। यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा। कुछ समय बाद खजांची को शक हुआ कि कहीं नौकर चार आने की मलाई में गड़बड़ तो नहीं कर रहा । उसने चुपचाप नौकर पर नजर रखनी शुरू कर दी। खजांची ने पाया कि नौकर केवल तीन आने की मलाई लाता है और एक आना बचा लेता है। चोरी पकड़ी जाने पर नौकर ने खजांची को एक आने की रिश्वत देना शुरू कर दिया। अब राजा को दो आने की मलाई रबड़ी मिलती,जिसे वह चार आने की समझ कर खाता। कुछ दिन बाद राजा को शक हुआ कि मलाई की मात्रा में कमी हो रही है। राजा ने अपने खास मंत्री को अपनी शंका बतलाई और असलियत पता करने को कहा। मंत्री ने पूछताछ शुरू की। खजांची ने एक आने का प्रस्ताव मंत्री को दे दिया।अब हालात ये हुए कि नौकर को केवल दो आने मिलते जिसमें से एक आना नौकर रख लेता और केवल एक आने की मलाई रबड़ी राजा के लिए ले जाता। कुछ दिन बीते ।इधर हलवाई जिसकी दुकान से रोजाना मलाई रबड़ी जाती थी,उसे संदेह हुआ कि पहले चार आने की मलाई जाती थी अब घटते-घटते एक आने की रह गई। हलवाई ने नौकर को पूछना शुरू किया और राजा को बतलाने की धमकी दी। नौकर ने पूरी बात खजांची को बतलाई और खजांची ने मंत्री को। अंत में यह तय हुआ कि एक आना हलवाई को भी दे दिया जाए। अब समस्या यह हुई कि मलाई कहां से आएगी और राजा को क्या बताया जाएगा। इसकी जिम्मेदारी मंत्री ने ले ली। इस घटना के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि राजा को मलाई की प्रतीक्षा करते नींद आ गई। इसी समय मंत्री ने राजा की मूछों पर सफेद चाक(खड़िया)का घोल लगा दिया। अगले दिन राजा ने उठते ही नौकर को बुलाया तो मंत्री और खजांची भी दौड़े आए।
राजा ने पूछा-कल मलाई क्यों नही लाए?
नौकर ने खजांची और मंत्री की ओर देखा ।
मंत्री बोला-हुजर यह लाया था,आप सो गए थे इसलिए मैने आपको सोते में ही खिला दी। देखिए अभी तक आपकी मूँछों में भी लगी है।
यह कहकर उसने राजा को आईना दिखाया। मूँछों पर लगी सफेदी को देखकर राजा को विश्वास हो गया कि उसने मलाई खाई थी। अब यह रोज का क्रम हो गया,खजाने से चार आने निकलते और बंट जाते। राजा के मुंह पर सफेदी लग जाती। बचपन की सुनी यह कहानी आज के समय में भी सामयिक है।
आप कल्पना करें कि आम जनता राजा है,मंत्री हमारे नेता हैं और अधिकारी-ठेकेदार अब खजांची और हलवाई हैं। पैसा भले कामों के लिए निकल रहा है और आम आदमी को चूना दिखाकर संतुष्ट किया जा रहा है।
अभी प्रधानमंत्री सिचाई योजना कपिल धारा कुआँ व आवास योजना में सरपंच,ग्राम सेवक और ब्लाक सीईओ खुलेआम रिश्वत मांगते हैं। छोटी-छोटी नदी और नालों पर अगर छोटे-छोटे बिना फाटक वाले स्टाप डेम बनाए जाएं,जिनकी लागत बहुत कम है तो पानी इकठ्ठा होगा। यह ज़मीन में जाएगा और रिचार्ज होगा तो सबको पानी मिलेगा। बहने वाला पानी रिचार्ज नहीं हो पाता है,२-५ फुट रुका तो पानी जगह बनाकर रिचार्ज होगा और जल स्तर की समस्या ख़त्म हो जाएगी,मगर सब चोर हैं। अभी सही समय है स्टापडेम बनाने का,पर रिश्वतखोरों की नींद बाद में खुलेगी। कुछ साल पहले मध्यप्रदेश में एक चोर यंत्री ने तालाब खोदा,उसका तबादला हुआ। चोर का भाई महाचोर आया,उसने फ़ाइल में लिख दिया इस तालाब से बाढ़ का खतरा है। तालाब बंद (बूरना ) करना जरुरी है।यानि दोनों काम हुए,मगर कागज पर दोनों चोर अपने कार्यालय साथ पैसे खा गए। न तालाब खुदा, और न बंद हुआ।
अभी जितना बजट आता है(हर सही आदमी को बजट या जॉब कार्ड का बहाना बनाया जाता है,जबकि जॉब कार्ड भी इनके अधीन काम करने वालों द्वारा बनाया जाता है।),उसमें सिर्फ एक वर्ष में समस्या ख़त्म हो सकती है,पर समस्या ख़त्म होने से खाने(रिश्वत)का रास्ता बंद हो जाएगा,इसलिए समस्या रखी ही जाती है। क्या मंत्री,मुख्यमंत्री,सीईओ व अन्य अधिकारी इस और ध्यान देंगे या पैसे एक-एक आना बाँटते रहेंगे और जनता को ………,…??????

                                                                        #शिवरतन बल्दवा

परिचय : जैविक खेती कॊ अपनाकर सत्संग कॊ जीवन का आधार मानने वाले शिवरतन बल्दवा जैविक किसान हैं, तो पत्रकारिता भी इनका शौक है। मध्यप्रदेश की औधोगिक राजधानी इंदौर में ही रिंग रोड के करीब तीन इमली में आपका निवास है। आप कॉलेज टाइम से लेखन में अग्रणी हैं और कॉलेज में वाद-विवाद स्पर्धाओं में शामिल होकर नाट्य अभिनय में भी हाथ आजमाया है। सामाजिक स्तर पर भी नाट्य इत्यादि में सर्टिफिकेट व इनाम प्राप्त किए हैं। लेखन कार्य के साथ ही जैविक खेती में इनकी विशेष रूचि है। घूमने के विशेष शौकीन श्री बल्दवा अब तक पूरा भारत भ्रमण कर चुके हैं तो सारे धाम ज्योतिर्लिंगों के दर्शन भी कई बार कर चुके हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।