भाषा ’ पत्रिका का विश्व हिंदी सम्मलेन पर आधारित विशिष्टांक

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समीक्षा

मॉरिशस में आयोजित होने वाले 11 वें विश्व हिंदी सम्मलेन के अवसर पर केंद्रीय हिंदी निदेशालय,मानव संसाधन विकार मंत्रालय, भारत सरकार ने ‘भाषा’ पत्रिका का मॉरिशस के हिंदी साहित्य पर केंद्रित विशिष्टांक प्रकाशित किया. यह विशिष्टांक अपने आप में विशेष है, इसमें वैश्विक स्तर पर हिंदी के विकास को विशेष रूप से मॉरिशस में हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है.

वैश्विक पटल पर भारत से बाहर मॉरिशस एकमात्र देश है जहाँ हिंदी साहित्य का विपुल सृजन हो रहा है. मॉरिशस के हिंदी रचनाकार साहित्य की सभी विधाओं में रचनाशील हैं और हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में योगदान कर रहे हैं. आज अभिमन्यु अनत ,पंडित विष्णुदयाल ,राष्ट्रकवि ब्रजेन्द्र मधुकर, प्रहलाद रामशरण, डॉ मुनीश्वर चिंतामणि ,सोमदत्त बखोरी,रामदेव धुरंधर , राज हीरामन तथा अन्य हिंदी सेवी हिंदी साहित्य में विशेष स्थान रखते हैं .मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से कह सकता हूँ कि मॉरिशस में आपको यह अनुभव नहीं होता कि आप किसी अन्य देश में हैं, मॉरिशस में भारतीयता चहुंओर विखरी नजर आती है .विश्व हिंदी सचिवालय, महात्मा गाँधी संस्थान , आर्य समाज,नागरी प्रचारणी सभा, हिंदू महासभा आदि संस्थाएं हिंदी के प्रचार-प्रसार में निरंतर कार्य कर रही हैं और इसके लिए भारत और मॉरिशस देशों की सरकारों का पर्याप्त सहयोग मिल रहा है ।

इस विशिष्टांक के प्रारंभ में मॉरिशस के ‘प्रेमचंद’ कहे जाने वाले सर्जनात्मक प्रतिभा संपन्न हिंदी साहित्यकार अभिमन्यु अनत के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित किए गए हैं और अनत जी की कविता ‘वह अनजान आप्रवासी’ दी है –

आज अचानक हवा के झोंकों से

झरझरा कर झरते देखा

गुलमोहर को पंखुड़ियों को

उन्हें ख़ामोशी में झुलसते छटपटाते देखा

वह पहला गिरमिटिया इस माती का बेटा
जो मेरा भी अपना था तेरा भी अपना.

प्रेमचंद और मॉरिशस हिंदी साहित्य के विद्वान डॉ.कमल किशोर गोयनका का आलेख ‘मॉरिशस की हिंदी कहानी: उद्भव और विकास’ मॉरिशस में हिंदी भाषा के अस्तित्व का विकासात्मक परिचय देते हुए मॉरिशस हिंदी कहानी के विकास का अनुसंधानात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है. इस लेख में जानकारी है कि मॉरिशस में हिंदी कहानी के प्रकाशन का प्रारंभ ‘सनातन धर्मांक’, ‘दुर्गा’,’वर्तमान’, ‘मजदूर’ तथा ‘जागृति’ पत्रिकाओं से होता है . डॉ.गोयनका ने इस लेख में ‘तारा’ नामक कहानी को मॉरिशस की प्रथम मौलिक कहानी मानने पर सहमति जताई है .मॉरिशस के हिंदी कहानीकारों की रचनाएँ भारत एवं विदेश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं और हो रही हैं. मॉरिशस के हिंदी कहानी साहित्य को समृद्ध करने में अभिमन्यु अनत,भानुमती नागदान,पूजनं नेमा,रामदेव धुरंधर,डॉ.वीरसेन जागासिंह,इंद्रनाथ भोला,धनराज शंभु आदि का विशेष योगदान है .गोयनका जी ने लिखा है –“मॉरिशस की हिंदी कहानी ने अपनी परम्परा ही स्थापित नहीं की है,बल्कि अपनी विशिष्ट पहचान बनाते हुए हिंदी कहानी के विकास में भी अपना योगदान दिया है .मॉरिशस में हिंदी के अस्तितिवा तथा उसके विकास की जो यात्रा है तथा कहानीकारों को अपनी रचनाधर्मिता को बनाए रखने में जिन घातक एवं विध्वंशक परिस्थितिओं का सामना करना पड़ा है, उन्हें देखकर मॉरिशस हे हिंदी कहानीकारों के दम ख़म ,निष्ठा,समर्पण तथा सर्जनात्मकता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की प्रसंशा की जानी चाहिए.” इस विशेष अंक में डॉ.गोयनका द्वारा मॉरिशस के हिंदी राष्ट्रकवि ब्रजेन्द्र कुमार भगत मधुकर से 2003-04 में लिए गए रोचक साक्षात्कार को शामिल किया है, इसमें कवि ने मॉरिशस में हिंदी कविता के विकास की विभिन्न परते खोली हैं जिससे गोयनका जी की राय सिद्ध होती है कि मधुकर जी ने मॉरिशस और भारत के बीच साहित्यिक और सांस्कृतिक सेतु का काम किया. डॉ.गोयनका ने राष्ट्रकवि ब्रजेन्द्र कुमार भगत मधुकर की सभी कविताओं को रचनावली में संकलित कर स्तुत्य कार्य किया है.

‘सांस्कृतिक संवेदना और भारत-मॉरिशस संबंध’ आलेख में प्रो.पूरनचंद टंडन ने भारत-मॉरिशस के आत्मिक संबंधों की आधारभूमि भारतीय संस्कृति को बताया है.शर्तबंदी श्रमजीवियों ने विपरीत परिस्थियों को अपने संघर्ष से अनुकूल बनाया और अनजान देश में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई. आप्रवासियों ने अपने दादा-परदादा से मिले संस्कारों को संरक्षित रखा और अगली पीढी को हस्तांतरित किए जिसके बल पर मॉरिशस में भारतीयता जीवंत है.मॉरिशस के लेखक श्री प्रहलाद रामशरण ने मॉरिशस हिंदी साहित्य की विबिन्न गद्य विधाओं की विकास यात्रा को ‘मॉरिशस के हिंदी गद्य साहित्य का स्वरूप और विकास’ आलेख में शामिल किया है और इस दिशा में मॉरिशस हिंदी गद्य साहित्यकारों के सृजन पक्ष से अवगत कराया है.इन प्रमुख गद्य रचनाकारों में पंडित आत्माराम, पंडित विश्वनाथ ,पंडित विष्णुदयाल,उदयनारायण राय,अभिमन्यु अनत,प्रहलाद रामशरण,डॉ.मुनीश्वर चिंतामणि, रामदेव धुरंधर के साहित्य साधना का स्सार्गार्भित विवेचन किया है.

डॉ.इंद्रदेव भोला ने मॉरिशस की दो प्रतिष्ठित संस्थाओं आर्य सभा एवं नागरी प्रचारिणी सभा का परिचय देते हुए हिंदी के प्रचार-प्रसार में इनके योगदान को रेखांकित किया है. डॉ.विदुषी शर्मा का लेख ‘वैश्वीकरण की चुनौतियाँ एवं प्रवासी हिंदी साहित्य’ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के बढ़ते प्रभाव और उपलब्धता की ओर ध्यान दिलाते हुए हिंदी प्रेमियों से एकजुटता से हिंदी के लिए समेकित प्रयास का आह्वान किया है.

डायरी विधा में प्रो. देवेन्द्र चौबे की रचना ‘यह,वह, इतिहास तो नहीं’ में धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले देश मॉरिशस की यात्रा का रोचक विवरण दिया है. प्राकृतिक सौंदर्य एवं वैभव का आस्वादन कराते हुए लेखक ने हिंदी के लिए समर्पित स्थानीय महानुभावों के साथ हुए संवाद का जिक्र किया है और इस बात को स्वीकार करते हैं कि ‘मॉरिशस के हिंदी लेखक तो आप्रवास की पीड़ा भोगते हुए भावनात्मक अलगाव का इतिहास रच रहे हैं.’

‘भाषा’ पत्रिका के इस विशेष अंक के लेख ‘सूरीनाम में हिंदी: सृजन और अनुसन्धान का संदर्भ’ में डॉ.विमलेश कांति वर्मा ने सूरीनाम में हिंदी भाषा के रचनात्मक पक्ष का विस्तृत विवरण दिया है. सुनंदा शर्मा द्वारा ने दक्षिण अफ्रीका के हिंदी प्रेमी और अध्यापक श्री विरजानंद बदलू गरीब से हिंदी अध्ययन-अध्यापन पर केंद्रित साक्षात्कार के माध्यम से दक्षिण अफ्रीका में हिंदी के प्रचार-प्रसार से से सभी को परिचित कराया है.

मॉरिशस एवं अन्य देशों के हिंदी रचनाकारों की कहानी/ कविता/ पुस्तकों की समीक्षाएं/ निदेशालय की योजनाओं का परिचय एवं प्रकाशन सूची इस विशिष्ठ अंक को सूचनाप्रद एवं संग्रहणीय बनाते हैं. इस अंक के लिए भारत के राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विदेशमंत्री,मानव संसाधन विकास मंत्री एवं अन्य गणमान्य महानुभावों के शुभकामना संदेश प्राप्त करने के लिए केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निदेशक प्रो.अवनीश कुमार एवं भाषा संपादकीय टीम को हार्दिक बधाई.

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डॉ.दीपक पाण्डेय, केंद्रीय हिंदी निदेशालय

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।