*भारतीय हिंदी साहित्य के लिए वर्तमान की चुनौती व समाधान*

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vasundhara
हिंदी एक मात्र ऐसी भाषा है जिसे अन्य प्रांतीय लोग भी बड़ी सरलता से सहजता से बोलने व समझने का सामर्थ्य रखते हैं । हिंदी एक ऐसी भाषा जो सही अर्थों में जन जन को एक सूत्र में बांधकर रखकर माँ  स्वरूप अपनी अन्य भाषा बेटियों को एक साथ लेकर चलने का कर्तव्य निर्वहन कर रही है । अन्य प्रांतीय लेखक भी अपनी भाषा के साथ साथ हिंदी उत्थान को लेकर चिंतन मनन करके रचनात्मक कार्य कर रहें जिससे हमें आशा है कि हिंदी को वो स्थान अवश्य प्राप्त होगा जिसकी वह सही अर्थ में अधिकार रखती है ।
मूलरूप से यदि हिंदी को  समझना है , या हिंदी साहित्य को समझना है तो सर्वप्रथम हिंदी शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई और यह भाषा चलन में कैसे आई यह जानना आवश्यक होगा, सामान्य तौर पर हिंदी उस बड़े भू भाग की भाषा समझी जाती है , जिसकी सीमा पश्चिम  में जैसलमेर उत्तर – पश्चिम में ,अम्बाला उत्तर में शिमला पहाड़ी प्रदेश तक पूर्व में भागलपुर , दक्षिण –पूर्व में रायपुर तथा दक्षिण –पश्चिम में खंडवा तक पहुचती है . संसार का प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद माना जाता है , संभवतः प्राचीन भाषा ऋग्वेद की ही थी, जिसकी वैदिक भाषा संस्कृत थी . संस्कृत दीर्घकाल तक भारत जैसे महान देश की राष्ट्रभाषा रही ,काल अनुसार शनै: शनै: संस्कृत भाषा का चलन स्वत ही कम होते- होते प्राकृत भाषा जिसे हम आम बोलचाल की भाषा कहे सकते हैं , का चलन आरम्भ हुआ . बौध काल से ही प्राकृत भाषा का उदय हुआ, आज जिसे हम जन – जन की भाषा कहे सकते है. लोकमानस ने भाषा को जन-प्रचलित एवं सहेज रूपो को अपनाना आरम्भ कर दिया . इस नवीन भाषा का नामकरण अपभ्रंश हुआ . इसका निर्णय  असंभव सा है कि अपभ्रंश  भाषा का प्रचलन कब ख़तम हुआ और हिंदी शब्द का जन्म कब हुआ ? किसी भी भाषा के उत्थान  के लिए साहित्य का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान होता है इसी क्रम में हिंदी के  साहित्यकारों ने हिंदी को अपनी माँ  स्वरूप मानकर बड़ी लगन के साथ हिंदी भाषा की सेवा की । भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा १८८३ में लिखित “ नाटक” नामक कृति मानी जाती है . इसी दौर में आगे चलकर आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे रसवादी और समालोचक , आचार्य नंददुलारे वाजपेयी , डॉ रामविलास वर्मा ‘ अज्ञेय’ , डॉ राम स्वरुप चतुर्वेदी जी ने अपनी लेखनी से हिंदी को गौरवमयी किया . प्रमुख निबंधकार भारतेंदु हरिश्चन्द्र , बालकृष्ण भट्ट , महावीर प्रसाद दिवेदी  प्रतापनारायण मिश्र , बद्रीनाथ चौधरी ‘प्रेमधन’, महावीर प्रसाद मिश्र जैसे महान लेखकों ने हिंदी भाषा को और समर्द्ध कर दिया .
हमारा प्राचीन साहित्यक संसार किसी भी साहित्य की अपेक्षा कहीं अधिक समृद्ध उत्कृष्ट रहा है , इतिहास गवाह है कि भारत जगदगुरू था । हम विद्या -बुद्धि साहित्य में विश्व के सिरमौर रहे हैं । महान सूरदास ,कबीरदास,दादू रामानुज, तुलसीदास जी जैसी महान आत्माओं ने भारत को साहित्यिक जगत में सर्वश्रेष्ठ स्थान से गौरांवित किया । हेमचंद्र , दलपत विजय , नरपति नाल्ह , चंदबरदाई, जी की वीर रस की कविताओं को जिसने भी जिस काल में सुना वह अपने देश पर अपनी जान न्यौछाबर करने को तैयार हो गया । आज भी सीमाओं पर तैनात जवान  ऐसी रचनाओं को सुनकर  उत्साह और देशभक्ति में डूब जाते हैं । प्रेमचंद युग में प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद जी ने हिंदी साहित्य  जगत को शिखर के नये आयाम दिए जिसके लिए लिए हिंदी साहित्य सदैव  ऋणी रहेगा । वर्तमान में हिंदी भाषा को और सबल बनाने के लिए अन्य भाषाओं के सभी साहित्कारों को हिंदी भाषा के प्रति कर्मठ दृढ़ता से कार्यरत देख कर हिंदी मन आशांवित है कि आगे आने वाला समय हिंदी को ही समर्पित होगा ।
हिंदी भाषा से आज के यूवाओं को आकर्षित कैसे करें ? हिंदी को कर्मक्षेत्र बनाकर  उसमें रोज़गार उपलब्ध कराना वर्तमान में थोड़ा चौनौतिपूर्ण अवश्य पर असंभव नहीं !
कला संस्कृति को एक साथ जोड़ने का सामर्थ्य हिंदी भाषा को नमन ।
वर्तमान की चुनौती
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भारत को आज़ाद हुए सत्तर वर्ष  बीत चुके हैं लेकिन मानसिक गुलामी की बेड़ियां आज भी हमें कहीं ना कहीं जकड़े  हुए हैं , अपनी भाषा ,अपनी संस्कृति का सम्मान करना भूल सा गये हैं ,स्वर्णिम साहित्यिक अतीत , सांस्कृतिक पर हमें गर्व करना चाहिए लेकिन यह कहना अतिशोक्ति नही होगी कि आधुनिकता के भाव में इसका अभाव स्पष्ट देखा जा सकता है ।  अंग्रेजी भाषा का अनावयश्यक प्रयोग से वर्तमान हिंदी साहित्य डगमगाती हुई सी दिखती है । युवाओ को लिखने में तो रूचि है किंतु भाषा का ञान न होने के कारण हिंदी अंग्रेजी मिश्रित भाषा का प्रयोग कर रहे हैं । यूवा साहित्यकार विचलित है व कहीं कहीं भ्रमित है , इंटरनैट के युग में मात्राओं का उचित प्रयोग होते नहीं दिखता । आज का यूवा हिंदी के प्रति समर्पण भाव नहीं रखता , किस तरह से भारत की यूवा पीढ़ी को हिंदी , साहित्य अपनी संस्कृति से जोड़ कर रखा जाए वर्तमान में यह एक चुनौती है ।
समाधान
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यदि युवाओं को हिंदी भाषा , संस्कृति से जोड़े रखना है तो साहित्य के अलावा इसी क्षेत्र में रोज़गार भी उपलब्ध कराने होंगे । रूचि क्षेत्र में कार्य करते हुए यदि जीविका का भी प्रबंध किया जाए तो आज जिन यूवाओं को हिंदी भाषा , कविता कहानियों में रूचि है वे अवश्य टिके रहेंगे ।
समस्या है तो निश्चित समाधान भी ढूंढना होगा । छोटे से छोटा , बड़े से बड़ा व्यक्ति जब हिंदी में काम करेगा तो देश का स्वाभिमान बढ़ेगा और यूवाओं में भविष्य के प्रति आशाएं जाग्रत होगीं । अंग्रेजी भाषा का विरोध नहीं है किंतु अंग्रेजी के कारण हिंदी उपेक्षित न  हो यह विचार भी करना होगा । आज के यूवाओं के सामर्थ्य पर शंका नहीं की जा सकती लेकिन वह अपने सामर्थ्य को हल्के-फुल्के शब्दों से कोई भी भाव रच तो देता है किंतु प्रभाव छोड़ने में असफल हो जाता है , संघर्ष नहीं करना चाहते तथा शीघ्र से शीघ्र साकारात्मक परिणाम भी चाहते हैं कभी कभी अतिशिघ्रता वश परिणाम मनानुसार नहीं आने पर निराशा से घिर जाते हैं ऐसी स्थिति में विचार करना होगा कि समस्या विशालकाय ना हो जाए इसके लिए समय समय पर वरिष्ठ साहित्यकारों को यूवा लेखकों के लिए साहित्यिक प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन करते रहना चाहिए साथ ही साथ व्याकरण संबंधित उचित मार्गदर्शन करते रहना चाहिए । साहित्य के माध्यम से रूचि अनुसार जीविका का साधन कैसे जुटाएं , शिखर के मार्ग पर एक साहित्यकार में क्या क्या विशेषता होनी चाहिए तथा स्वयं को एक अच्छा साहित्यकार कैसे बनाएं समय समय पर अवश्य अवगत कराना चाहिए । भारत सरकार साहित्यिक क्षेत्र में क्या क्या कर रही है इन सबकी जानकारी भी देते रहना चाहिए ।
वरिषा साहित्यकारों को अपनी आने वाली पीढ़ी के साथ यह ईमानदारी रखनी पड़ेगी क्योंकि साहित्यकार अपने समय का प्रतिबिंब होता है ।
नोविल पुरुस्कार विजेता गुन्नार मिर्डल जैसे अर्थशास्त्री ने भारत भ्रमण के समय कहा था कि, भारत को गरीबी दूर करने में तब सफलता मिलेगी जब यहाँ देसी भाषा ,आम भाषा ,सबको अपननाने वाली भाषा सर्वाधिक बोले जानी भाषा में अर्थात हिंदी भाषा में कार्य होने लगेंगे ।
इस दृष्टिकोण पर भी अवश्य विचार करना होगा ।

#वसुंधरा राय

परिचय : वसुंधरा राय ने समाजशास्त्र  में एम.ए. और पत्रकारिता मास्टर डिप्लोमा (मुम्बई ) की शिक्षा हासिल की है l आपका बसेरा  महाराष्ट्र के नागपुर में क्लार्क टाऊन(कड़वी चौक के पास) में है l २००८ में राष्ट्रीय हिन्दी पत्रिका में रूपक लेखक का कार्य अनुभव है,और वर्तमान में अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लेखन जारी हैl आप छंदमुक्त कविता,लघुकथा,दोहा छंद,आध्यात्मिक, राजनीतिक,सामाजिक विषयों पर लेखने के साथ ही वर्तमान में सामाजिक सेवाओं में भी संलग्न हैं l विश्वनाथ राय बहुउद्देशीय संस्था `शब्द सुगंध` की संस्थापक व अध्यक्ष हैं तो,अॉल इंडिया रेडियो पर विषय वक्ता के साथ ही मंच संचालिका भी हैं l आपकी लघुकथाओं की दो पुस्तक २०१७ में प्रकाशित होने वाली हैं। आपको सम्मान के रूप में अर्णव काव्य रत्न अलंकार,व्रत प्रतिष्ठान सम्मान,हाइकु मंजूषा रत्न सम्मान सहित राज्य स्तरीय हाइकु सम्मान तथा साहित्यिक सृजन सम्मान भी मिला है l हाइकु विशेषांक,मेरी सांसें तेरा जीवन,हाइकु संग्रह आदि साझा प्रकाशित पुस्तकें हैंl मंच पर कविता पाठ और गायन भी आप करती हैं। 

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।