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vijaylakshmi
अभी कुछ दिन पहले चौथ माता का व्रत किया। सुहागिनें बड़ी अभिलाषा और आस्था से ये व्रत और भी न जाने कितने व्रत पूजा आदि करती हैं।
मन में एक प्रश्न उठा कि, ये सात जन्मों के साथ वाली जो अवधारणा विवाह के साथ जुड़ी है, वह आज भले ही सत्य जान पड़े किंतु आने वाली पीढ़ियां क्या इन सबसे जुड़ी रह पाएंगी?,जबकि हमारी भावी पीढ़ी ‘लिव इन रिलेशनशिप’ जैसे जुमलों में विश्वास करने लगी है और विवाह के बंधन को जरूरी नहीं समझती है,क्योंकि इसके साथ आती है जिम्मेदारियां ओर अनेक सीमाएं।
पाश्चात्य संस्कृति के इस अदृश्य प्रहार को, जो हमारी सांस्कृतिक जड़ हिलाने के लिए काफी है,हम क्यों नहीं  समझ पा रहे हैं?
विवाह जैसी सामाजिक संस्था में आस्था का कम होना विवाहेत्तर सम्बन्धों का बढ़ना,घरेलू हिंसा और तलाक की घटनाएं अब आम हो गई हैं, जिसने यह साबित भी किया है कि आने वाला समय विवाह व दाम्पत्य के लिए हानिकारक हो सकता है। इन सबकी जड़ों में है अविश्वास या अलगाव, जो रोजमर्रा की जिंदगी में बढ़ती भागदौड़ से उपजे तनाव का ही बेहद खतरनाक परिणाम है। अधिकातम कामकाज और व्यस्तता के चलते आपसी विचार-विमर्श और स्वस्थ वार्तालाप का अभाव होता जा रहा है।
विवाह एक उत्सव है हमारे समाज में,जिसमें कौमार्य समाप्त होकर दाम्पत्य का प्रारम्भ होता है। इसकी आधारशिला है शारीरिक व मानसिक सुख और शांति, लेकिन भागदौड़ भरी जिंदगी में हम इसे ही हाशिए पर डालते जा रहे हैं। एक-दूसरे को पर्याप्त समय देना, साथ ही सामाजिक व पारिवारिक सम्बन्धों का निर्वहन और आपसी बातचीत ये सब भी उतने ही जरूरी हैं, जितनी अन्य आवश्यकताएं। दिखावटपूर्ण जीवन शैली के लिए अतिरिक्त कार्य और फिर समय की खींचतान से उपजा मानसिक तनाव न केवल घर की शांति भंग करता है,बल्कि पति-पत्नी के बीच अंतरंगता को भी कम करता है और इससे पूरा परिवार प्रभावित होता है।
विवाह जैसी सामाजिक संस्था का विघटन
विवाह का आधार ही दाम्पत्य सुख और दायित्व निर्वाह की भावना है,जो दो अजनबियों को जोड़े रखता है। शारीरिक संसर्ग इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भागदौड़ व तनाव भरी दिनचर्या में पति-पत्नी एक-दूसरे को पूरा समय नहीं दे पाते हैं,जिससे सम्बन्धो में भी खानापूर्ति भर रह जाती है। मनो वैज्ञानिकों का भी मानना है कि,संवेगों का दमन नहीं, बहिर्गमन जरूरी है।पूर्णरूप से सन्तुष्टि न मिल पाने से चिड़-चिड़ापन,छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव तथा कई बीमारियां भी होने लगती हैं।
एक-दूसरे से वैचारिक सामंजस्य का अभाव भी दिखाई देने लगता है। जिस प्रकार भूख,प्यास, नींद आदि दैहिक आवश्यकता है, उसी प्रकार दाम्पत्य जीवन में भी शारीरिक-मानसिक सुख व शांति जरूरी है, यह बात समझते हुए भी खुले तौर पर न तो चर्चा की जाती है न ही कभी ध्यान दिया जाता है,जबकि ये स्थिति अंदर-ही-अंदर हमारे व्यक्तित्व और व्यवहार को प्रभावित करने लगती है। इस सबका खतरनाक परिणाम तलाक,घरेलू हिंसा और अनैतिक सम्बन्धों के रूप में सामने आता है और फिर विवाह का विघटन और परिवार का टूटना शुरू होता है।
जहां पति तथा पत्नी दोनों कामकाजी होते हैं व १० से १२ घण्टे घर से बाहर या फिर अलग-अलग स्थानों पर रहते है, उनमें घनिष्ट अंतरंगता व लगाव कम ही हो पाता है। यह सत्य है कि,दाम्पत्य जीवन में शारीरिक लगाव ही आंतरिकता की भूमिका तैयार करता है।ऐसे में लंबे समय तक दूर रहना इस समस्या को और बढ़ा देता है और विवाह एक औपचारिकताभर रह जाता है।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार सम्बन्धों में विघटन-अलगाव के पीछे शारीरिक अतृप्ति एक बड़ा कारण हो सकती है।भले ही ये आवश्यक न हो,किंतु जरूरी न हो,ऐएसा भी नहीं माना जा सकता है,किंतु हमारी संस्कृति इस प्रकार के मुद्दों पर खुलकर चर्चा का अवसर नहीं देती है,इसलिए ये कारण सामने नहीं आ पाते हैं। समय रहते इसका निराकरण न हो पाया तो,हमारी सामाजिक व्यवस्था को बचाए रख पाना मुश्किल हो जाएगा।
बच्चों पर भी नकारात्मक प्रभाव
ये समस्या केवल स्त्री-पुरुष के जीवन और व्यक्तित्व को ही प्रभावित नहीं करती,बल्कि हमारे बच्चों पर भी प्रभाव डालती है। जिस घर में बच्चे अपने माता -पिता के बीच आपसी मतभेद व असभ्य व्यवहार देखते हैं,तो उनमें भी वही मानसिकता घर कर जाती है। उनका व्यक्तित्व अनजाने ही उग्र,आक्रामक और दब्बू किस्म का हो जाता है। वे अपने मन की बात कहने से डरने लगते हैं,भय और आत्मविश्वास की कमी उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व और भविष्य को प्रभावित करती है। फलस्वरूप बच्चे बाहरी आकर्षण में या तो नशे या गलत आदतों का शिकार बनते हैं या कई बार ये अपराध तक की ओर चल पड़ते हैं।
बच्चे रात-दिन इस प्रकार के माहौल में रहने से कुंठित हो जाते हैं, उनका अध्ययन बाधित होता है और जब समस्या बढ़ जाती है, तो वे आत्महत्या भी कर लेते हैं। बाप को अपनी ही उलझनों और मनमुटाव व व्यस्तताओं में उलझे देखकर ये अपनी समस्याओं का हल कहाँ पाएं व किससे कहें ? घर की अशान्ति व माता-पिता का आपसी अलगाव बालकों के मन में विवाह को लेकर नकारात्मक धारणा विकसित करता है,जिससे बच्चे जिम्मेदारियों ओर बन्धनों को अनावश्यक मानकर स्वतन्त्र सम्बन्धों में विश्वास करने लगते हैं। ये सब कुछ उन्हें पाश्चात्य संस्कृति की धारणाओं को मानने पर विवश करता है, जिसमें ‘लिव इन रिलेशनशिप’ भी एक है। जब जड़ें ही कमजोर हो जाएंगी तो हल्की-सी तेज हवा भी पेड़ को उखाड़ सकती है।
हमें अपने बच्चों में अपनी संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था के प्रति विश्वास बनाए रखने के लिए अपने सम्बन्धों को सुधारना ही होगा। समय रहते अगर सचेत नहीं हुए तो,भारतीय संस्कृति पर मंडराता यह खतरा विवाह जैसे पवित्र बंधन को लील लेगा,और हम दर्शक भर बने रह जाएंगे। दाम्पत्य को संभालकर ही हम ये कार्य कर सकते हैं। ये एक मजबूत कड़ी है, जो परिवारों,समाजों और राष्ट्र को बनाए रखती है। हमें समझना होगा कि, दाम्पत्य में शारीरिक संसर्ग की सम्मानजनक पूर्ति और स्थिति आवश्यक है,जो एक-दूसरे को वांछित समय देकर ही हो सकती है।
इस तरह हम न केवल समाज से कट रहे हैं, वरन परिवार व आपसी रिश्तों की जड़ें भी काट रहे हैं।
सार यही है कि,
‘वीणा के तार ज्यादा कसें नहीं, उन्हें पर्याप्त लोच के साथ सहेंजे, तभी मधुर स्वर और सुंदर संगीत सृजित होगा।’
दाम्पत्य जीवन की महत्ता को समझकर उसमें सन्तुलन लाना-रिश्तों को बचाना आवश्यक है,वरना स्वकेन्द्रन का आघात हमें नितांत अकेला कर देगा और हमें विनाश की कगार पर ला खड़ा करेगा।
                                                               #विजयलक्ष्मी जांगिड़

परिचय : विजयलक्ष्मी जांगिड़  जयपुर(राजस्थान)में रहती हैं और पेशे से हिन्दी भाषा की शिक्षिका हैं। कैनवास पर बिखरे रंग आपकी प्रकाशित पुस्तक है। राजस्थान के अनेक समाचार पत्रों में आपके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। गत ४ वर्ष से आपकी कहानियां भी प्रकाशित हो रही है। एक प्रकाशन की दो पुस्तकों में ४ कविताओं को सचित्र स्थान मिलना आपकी उपलब्धि है। आपकी यही अभिलाषा है कि,लेखनी से हिन्दी को और बढ़ावा मिले।

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